भगवान्की आवश्यकता
भैया! सप्रेम राम राम। तुम्हारा पत्र मिला। तुमने लिखा कि मेरे हृदयमें एक बेचैनी बनी रहती है और संसारके सारे सुख मनोऽनुकूल प्राप्त रहनेपर भी, पता नहीं लगता कि वह बेचैनी किस बातकी है। इसका उत्तर यह है कि मनुष्य भगवान्का सनातन अंश है, उनका अपना ही—अभिन्न है (ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:)। परंतु वह भगवान्से बिछुड़-सा गया है। चाहे उसे पता न हो या वह किसी भाषाके द्वारा उसे व्यक्त न कर सके, परंतु उसकी स्वाभाविक आवश्यकता है भगवान्से मिलनेकी, उन्हें बिना किसी व्यवधानके आलिंगन करके उनमें घुल-मिल जानेकी। इसीलिये वह नित्य आनन्द, नित्य ऐश्वर्य, नित्य माधुर्य, नित्य स्वातन्त्र्य, नित्य स्वामित्व और नित्य जीवनको सम्पूर्णरूपसे चाहता है। यही कारण है कि उसे संसारकी किसी भी स्थितिमें चाहे, वह देखनेमें कितनी ही ऊँची हो और उसमें कितना ही रस आता हो, चैन नहीं पड़ता। एक बेचैनी बनी ही रहती है। पर अज्ञानवश उसे जो भोगोंमें रसकी प्रतीति होने लगी, उसीसे उसमें भोग-वासनाएँ दीखने लगीं और इन भोग-वासनाओंके आवरणसे उसकी अपने भगवान्से मिलनेकी स्वाभाविक आवश्यकता रुक गयी। इसलिये न तो वह अपनी आवश्यकताको बना ही पाता है और न उसकी पूर्ति हुए बिना उसे चैन ही पड़ता है और भगवान्से उसकी ऐसी सजातीयता और आत्मीयता है कि भगवान् उससे मिलनेके लिये बाध्य हैं। यही तुम्हारी और स्त्रीकी बेचैनीका मूल कारण है। आवश्यकता है उनसे मिलनेकी, आवश्यकताको जाग्रत् करनेकी और उनको पाये बिना वैसे ही छटपटानेकी—जैसे दीर्घकालका प्यासा आदमी पानीके लिये छटपटाता है। ऐसी आवश्यकता जब भगवान्से मिलनेकी तीव्रतम आकांक्षा उत्पन्न कर देगी, तब अन्य सारी इच्छाएँ, कामनाएँ और वासनाएँ स्वयमेव वैसे ही नष्ट हो जायँगी जैसे सूर्यके प्रकाशसे अन्धकार मिट जाता है। इस आवश्यकताकी जागृति होती है भोगोंको अनिष्ट और दु:खमय जाननेसे, उनका यथार्थ ज्ञान होनेसे। भोगोंका स्वरूप जान लेनेपर उनमें रस आना बंद हो जायगा। फिर अपने-आप ही उनमें अरुचि हो जायगी, वे खारे लगने लगेंगे। ज्यों-ज्यों उनसे अरुचि होगी, उनकी इच्छाका नाश होगा, त्यों-ही-त्यों भगवत्प्राप्तिकी—नित्य सुन्दर और अनन्तको पानेकी तीव्र आकांक्षा जाग उठेगी। फिर एक क्षण भी उसके बिना रहा नहीं जायगा और ऐसी तीव्रतम आकांक्षा तत्काल ही उस परम प्रियतमको मिला देगी। अतएव भोगोंके यथार्थ रूपको जाननेकी और अपनेको भगवान्का बनानेकी चेष्टा करो और यह निश्चय समझो—इस सत्यको धारण करो कि भगवान् न पराये हैं न तुमसे दूर हैं और न दुर्लभ ही हैं। तुम उनके ही बनकर, आतुर होकर, जैसे ही उन्हें चाहोगे वैसे ही वे भी आतुर होकर दौड़ेंगे और तुम्हें अपने बाहुपाशमें बाँधकर, अपनेमें मिलाकर कृतार्थ कर देंगे।