भगवत्पूजामें भावकी प्रधानता

सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला, समाचार विदित हुए। आपको ‘भगवान‍्की पूजासे प्रेम था, पूजामें बड़ा आनन्द आता था और एक दिन भी पूजा छूटनेपर बड़ा कष्ट होता था।’ यह स्थिति बहुत ही सराहनीय है। अब आपको पहले-जैसा प्रेम नहीं प्रतीत होता, इसलिये आप चिन्तित हैं। यह भी शुभ लक्षण है। प्रेमका अभाव न प्रतीत होना प्रेमका अभाव सिद्ध करता है। प्रेम तो प्रतिक्षण बढ़नेवाला है। उसमें नित्य कमीका बोध होना चाहिये, तभी वह बढ़ता है। जो लोग प्रेमकी पूर्णता मान लेते हैं, वे प्रेममार्गसे च्युत हो जाते हैं, नहीं तो कम-से-कम उनका मार्ग रुक तो जाता ही है। भगवान‍्में नित्य-निरन्तर प्रेम बढ़ता रहे, इससे बढ़कर सौभाग्य और क्या हो सकता है। जो मनुष्य भगवत्प्रेमकी कमीसे व्यथित रहते हैं, उनपर भगवान‍्की बड़ी कृपा है और वे भगवत्कृपासे प्रेमको प्राप्त भी कर सकते हैं। साधनके क्षेत्रमें किसी भी प्रगतिपर रुकना बहुत बड़ा विघ्न है। वहाँ तो चलते ही जाना है—आगे-से-आगे। किसी भी स्थितिमें संतोष नहीं करना चाहिये। भजनमें संतोष कैसा। वह तो जितना बने, उतना ही थोड़ा और इस थोड़ेकी भावना साधकको सदा अहंकारशून्य एवं साधनसम्पन्न बनाये रखती है, जिससे उसकी प्रगति कभी रुकती नहीं।

आपने रजोधर्मकी अवस्थामें भी भगवान‍्का पूजन नहीं छोड़ा, यह जैसे एक ओर प्रेमका निदर्शन है, वैसे ही दूसरी ओर शास्त्रमर्यादाका उल्लंघनजनित दुष्कृत भी है। जहाँ प्रेमकी इतनी प्रगाढ़ता हो कि बाह्य-ज्ञान सर्वथा न रहे, वहाँ तो कोई विधि-निषेध नहीं है; पर जहाँ शरीरकी सुधि है, वहाँ शास्त्र-मर्यादाका पालन परम आवश्यक है। शास्त्र भगवान‍्की ही आज्ञा है। अतएव उसका पालन ही करना चाहिये। रजस्वलाकी स्थितिमें दूरसे भगवान‍्का दर्शन और प्रणाम किया जा सकता है और मानस ध्यान-पूजन-चिन्तन तो आप सभी अवस्थामें कर सकती हैं। मानस पूजन कर लेनेपर पूजा भी नहीं छूटती, मानस पूजनका महत्त्व भी अधिक है और शास्त्रनिषिद्ध आचरण भी नहीं होता। अतएव रजस्वला-अवस्थामें बाह्य पूजा किन्हीं शुद्ध ब्राह्मण या घरके अन्य श्रद्धालु व्यक्तिके द्वारा करा देनी चाहिये।

रजस्वला-अवस्थामें पूजन-स्पर्शादि किया, इसके लिये आपने प्रायश्चित्त पूछा सो भक्तिके क्षेत्रमें यह बहुत बड़ा अपराध तो नहीं है। यहाँ विधिकी अपेक्षा भावका मूल्य अधिक है। तथापि जब शास्त्र-निषिद्ध आचरणके लिये मनमें विचार है, तब उसका प्रायश्चित्त भी अवश्य कर लेना चाहिये। इसके लिये भगवान‍्के सर्वपापनाशक मंगलमय नामकी (हरे रामके १६ नामके मन्त्रकी) एक माला कम-से-कम एक वर्षतक प्रतिदिन जप लिया कीजिये। भगवान‍्का नाम-जप, पूजन, ध्यान आदि साधन बड़े उत्साहके साथ करने चाहिये, साथ ही घरके काममें भी सावधान रहना चाहिये। घरको भगवान‍्का मन्दिर, पतिको परमेश्वर, घरके अन्य लोगोंको भगवान‍्के पार्षद एवं बालकोंको भगवान‍्के सखा मानकर जो भगवान‍्का स्मरण करते हुए ही अनासक्तभावसे घरका काम किया जाता है, वह भगवान‍्का पूजन ही होता है। पतिकी सर्वविध तथा गुरुजनोंकी मर्यादित सेवा, बालकोंका लालन-पालन और घरकी सार-सँभार करना स्त्रीका धर्म है। इस कर्मको यदि वह भगवान‍्के पूजनके भावसे करे तो और कुछ भी बिना किये वह भगवान‍्की प्रीतिपात्र हो सकती है एवं भगवान‍्की कृपासे भगवान‍्का दुर्लभ प्रेम प्राप्त कर सकती है।