भाईसे प्रेम करें
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपकी लिखी हुई बात आपकी दृष्टिसे ठीक ही है; परंतु आपकी दृष्टि ही बदली हुई है। द्वेषदृष्टि होनेपर सब दोषरूप हो जाता है। वरं द्वेष्य वस्तुके गुणोंमें भी दोष दीखता है और भेद तथा परायापन तो आ ही जाता है। यही कारण है कि आपलोग सगे भाई होते हुए भी पराये हो गये हैं। प्रेमका स्वभाव है अनेकको एक करना और द्वेषका स्वभाव है एकको अनेक करना। जहाँ प्रेम होगा वहाँ त्याग होगा ही। प्रेमकी भित्ति त्याग ही है। हम जिससे प्रेम करते हैं, वे हमारे ही हो जाते हैं। उनका सुख ही अपना सुख होता है। अतएव उनके सुखके लिये सहज ही त्याग होता है। वहाँ छीना-झपटीका सवाल ही नहीं है। हमारा जिससे प्रेम होगा, उसके लिये हम त्याग करेंगे ही और जहाँ स्वार्थ है वहीं त्यागका अभाव है, वहीं चोरी है, छिपावट है और छीना-झपटी है। वहीं द्वेष है और जहाँ द्वेष है वहीं दु:ख है।
कलकत्तेके समीप एक वकील रहते थे। उनके घरमें एक उनकी पत्नी थी और एक छोटा भाई। छोटे भाईपर वकील साहेबका बड़ा स्नेह था; वह पढ़ता था। भाभीका भी देवरपर स्नेह था; परंतु ज्यों-ज्यों दिन बीतने लगे, त्यों-ही-त्यों भाभीका प्रेम घटने लगा—वह देवरके प्रति द्वेष करने लगी। द्वेष होनेपर दोष दीखते ही हैं, उसे बात-बातमें दोष दीखने लगे और वह अपने पतिसे शिकायत करने लगी। पतिने बहुत समझाया-बुझाया; परंतु उसकी समझमें बात आयी ही नहीं। अन्तमें उसने पतिसे स्पष्ट कह दिया कि ‘मेरे साथ आपके भाईका निर्वाह नहीं होगा, इन्हें अलग कर दीजिये।’ वकील साहेबने दूसरा उपाय न देखकर दो दस्तावेज बनाये और एक दिन पत्नीको तथा छोटे भाईको पास बैठाकर छोटे भाईसे कहा—‘देखो भैया! तुम्हारी भाभीको तुम्हारे व्यवहार-बर्तावसे संतोष नहीं है। यह बँटवारा चाहती है। मैंने भी निश्चय कर लिया है कि बँटवारा कर दिया जाय; क्योंकि रोज-रोजके कलहकी अपेक्षा एक बार निपटारा हो जाना उत्तम है। मेरे पास दो चीजें हैं—एक मैं और एक मेरी जमीन-जायदाद तथा अर्थसम्पत्ति। दोनोंके दस्तावेज तैयार हैं। तुम्हारी भाभी बड़ी हैं, अत: उसका पहला अधिकार है। इन दोनों चीजोंमेंसे जिस एकको वह पसंद करे, नि:संकोच प्रसन्नतासे ले ले। उसके ले लेनेपर जो चीज बचेगी, वह तुम्हारे हिस्सेमें आ जायगी।’ वकील साहेबकी बात सुनकर उनकी पत्नी बड़े सोचमें पड़ गयी। कुछ देर चुप रही। फिर सोच-साचकर उसने कहा—‘मुझे तो जमीन-जायदाद और अर्थसम्पत्ति चाहिये।’ वकील साहेबने बड़ी प्रसन्नतासे दस्तावेज निकाला। पढ़कर सुनाया, स्वयं हस्ताक्षर किये, छोटे भाईसे कराये और पत्नीसे कराये। फिर उसकी एक-एक प्रति दोनोंको दे दी। तदनन्तर भाईसे कहा—‘चलो, हमलोग अन्यत्र रहेंगे। दोनों भाई जो एक-एक धोती-कुर्ता पहने थे, वैसे-के-वैसे ही उठकर वहाँसे चल दिये। वकील साहेबकी पत्नी कुछ भी बोल नहीं सकी, बोलती भी कैसे। देवरने जरूर भाभीकी चरणधूलि लेनेकी चेष्टा की, पर उसने पैर हटा लिया। पति-वियोगका तो उसे दु:ख हुआ, पर देवरके हट जानेसे उसने मानो सुखकी साँस ली। अब वह कुछ कर्मचारियोंको रखकर जमीन-जायदादकी सँभाल कराने लगी। कुछ दिन तो काम चला तथा देवरको हटा देनेका संतोष भी मनमें रहा। पर धीरे-धीरे काम बिगड़ने लगा। कर्मचारियोंने मनमानी आरम्भ की। खर्च बढ़ गया। आय प्राय: बंद हो गयी। मामले-मुकदमें भी लग गये। सालभर भी नहीं बीता कि वह सर्वथा ऊब गयी और पतिके पास जाकर उसने घर लौटनेकी प्रार्थना की।
वकील साहेब नामी वकील थे, उन्होंने घरसे निकलकर दूसरी जगह मकान भाड़े ले लिया। रसोइया-नौकर रख लिया। काम तो उनका चल ही रहा था। छोटा भाई सुयोग्य तो था ही। उसके हृदयपर भाईके बर्तावकी अमिट छाप पड़ गयी थी। वह भी घरकी सँभाल और काम-काजमें पूरी सहायता करने लगा था। दोनों सुखसे रहने लगे थे।
जब पत्नीने आकर प्रार्थना की और कहा कि ‘मेरा अपराध क्षमा करें। देवरको मैं पुत्रकी भाँति पालूँगी। मेरी बुद्धि मारी गयी थी, जिससे मैंने उस निरपराधको सताया और यहाँतक काण्ड किया। अब मैं अपनी भूल समझ गयी। आप तथा देवरजी मुझे क्षमा करें। यों कहते-कहते उसकी आँखोंमें आँसू आ गये और वह फुफकार मारकर रोने लगी। भाभीको रोते देखकर देवरने उसके चरण पकड़ लिये और भाईसे घर चलनेका अनुरोध किया। वकील साहेबके मनमें द्वेष तो था ही नहीं। वे हँसने लगे और पत्नीके साथ घर लौट आये। तबसे उनका परिवार सुखी हो गया।
इस घटनाके लिखनेसे मेरा तात्पर्य इतना ही है कि आप भी अपने छोटे भाईके साथ प्रेमका बर्ताव करें। उसका दोष भी है तो उसे ठीक करनेका उपाय प्रेम तथा स्नेह ही है न कि तिरस्कार और यदि आप ईमान बिगाड़कर उसका हक रख लेंगे और उसे निकाल देंगे, तब तो बड़ा पाप करेंगे। भगवान् श्रीरामचन्द्र और परम भाग्यवान् भरतजीके आदर्शको सामने रखिये। यहाँकी कोई वस्तु साथ नहीं जाती, सब कुछ यहीं रह जायगा। मनुष्य जो बुरी नीयतसे कुछ बुरा काम कर बैठेगा वही उसके साथ जायगा और उसका दुष्परिणाम भी उसे अवश्य भोगना पड़ेगा। आप प्रेम कीजिये, आपका अपना ही भाई है। उसके अपराधोंको क्षमा कीजिये और उसे हृदयसे लगाइये। आपका बर्ताव निष्कपट, प्रेमपूर्ण और सुन्दर होगा तो उसका हृदय अवश्य पलटेगा, वह आपके अनुकूल होजायगा और यदि न भी हुआ तो भी आपकी तो इसमें कोई हानि होगी ही नहीं। भगवान्के दरबारमें आप आदरके पात्र होंगे, जो जीवके लिये सबसे बड़ा लाभ है। शेष भगवत्कृपा।