भावका भगवान‍्में अर्पण

आपका पत्र मिला। उसमें प्रेम और आपके हृदयकी भावुकता भरी है।......मेरा इतना ही निवेदन है कि इस भावुकता और अनुरक्तिके प्रवाहका मुख श्रीनन्दनन्दनकी ओर मोड़ दीजिये। आप धन्य हो जायँगे। मैं तो क्षुद्रतम प्राणी हूँ, मुझमें जो आपको इतनी महत्ता दीखती है, यह आपकी सरल भावना है।......मैं तो यह समझता हूँ—जिस प्रकारका भाव आप मुझ कमजोरियोंके पुतले तुच्छ प्राणीके प्रति दिखलाते हैं, ऐसा उस प्रेमके समुद्र, दयाके झरने, सुख, शान्ति और आनन्दके खजाने श्रीश्यामसुन्दरके प्रति रखें तो निश्चय ही आप उनके प्रियपात्र हो जायँ। आपकी सारी अयोग्यताएँ, सारी त्रुटियाँ उनकी पलकके इशारेमात्रसे महान् दिव्यगुणोंके रूपमें पलट जायँ। वे योग्यता नहीं देखते, त्रुटियाँ तो अपने हाथों दूर कर देते हैं—पापोंका बोझा अपने सिरपर उठाकर उसे समुद्रमें बहा आते हैं; वे तो चाहते हैं सिर्फ हृदयका सच्चा भाव। उनको सच्चे भावसे अपनी बाँह गहा दीजिये। भाव देखते ही वे स्वयं आकर बाँह पकड़कर अपने हृदयसे लगा लेंगे। उनका एक स्वभाव है—वे जिसे ग्रहण कर लेते हैं, उसे छोड़ना नहीं जानते। चाहे वह कोई—कैसा ही क्यों न हो। उसमें अगर कोई पाप-ताप रहता है तो स्वयं उसे दूर करके उसको निर्मल बना लेते हैं। भाव निर्मल हों, भावोंके प्रवाहका मुख भगवान‍्की ओर मुड़े—इसके लिये उनके नामका जप कीजिये। आपने दो बातें पूछी थीं। दोनों ये हैं—भावको भगवान‍्में अर्पण करना और करनेके लिये उपाय है नाम-जप।