बुद्धिमानी किसमें है?

सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। आपके सभी सम्बन्धी क्रमश: चले गये, यह बहुत दु:खकी बात है; परंतु दु:ख करनेसे कोई भी लाभ नहीं। जो कुछ पीछे बचा है, उसीको सँभालना आपका कर्तव्य है। घरमें केवल आप तथा आपकी पत्नी—दो ही बचे हैं तो अब आप दोनोंको सावधानीके साथ अपने जीवनका एक-एक क्षण भगवत्-सेवामें लगाना चाहिये। जैसे घरके अन्य सभी लोग चले गये, वैसे ही पता नहीं, किस क्षण आपलोगोंको भी जाना पड़े। ऐसी स्थिति आनेसे पूर्व ही यदि आप भगवान‍्के शरण होकर अपने जीवनको सार्थक कर सकें तो आपकी बुद्धिमानी है और मानव-जीवनकी सफलता है। नहीं तो जैसे अन्य विषयी पुरुष विषय-भोगोंकी चिन्ता करते हुए सियार-कुत्तोंकी मौत मर जाते हैं, वैसी ही दशा आपकी भी होगी।

तुलसिदास हरिनाम सुधा तजि

सठ हठि पियत बिषय-बिष माँगी।

सूकर-स्वान-सृगाल सरिस जन

जनमत जगत जननि-दुख लागी॥

अतएव आपलोगोंको इस महाप्रयाणके लिये पहलेसे ही तैयार हो जाना चाहिये। भगवान‍्के स्वरूपका ध्यान तथा उनके पवित्र नामोंका जप-कीर्तन करते रहिये। मृत्यु जब कभी भी आवे, उसे आप भगवान‍्का स्मरण करते हुए ही मिलें। फिर कोई डरकी बात नहीं है; आपको भगवत्प्राप्ति ही होगी। जो सर्वकालमें भगवान‍्का स्मरण करता हुआ ही अन्य सांसारिक कार्य करता है, उसे अन्तमें भगवान‍्के ही सुर-मुनि-सेवित अभय चरणारविन्दोंकी प्राप्ति होती है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। ऐसी ही मृत्यु वांछनीय होनी चाहिये। एकमात्र यही मृत्यु ऐसी है, जो बार-बार होनेवाली मृत्युको मार देती है। जो जन्मा है, उसे मरना तो होगा ही। सभी संयोग निश्चय ही एक दिन वियोगके रूपमें परिणत होंगे। इस संयोग-वियोगरूप संसारमें बुद्धिमान् वही है, जो सदाके लिये अपना संयोग भगवान‍्के साथ कर लेता है। भगवान‍्के साथ संयोग हो जानेपर फिर कभी वियोग नहीं होता। वास्तवमें वे लोग बड़े अभागे हैं, जो जीवनभर विषय-भोगोंमें ही लगे रहते हैं, भगवान‍्से विमुख होकर उनके अभय चरणोंका सतत चिन्तन नहीं कर पाते।

सुनहु उमा ते लोग अभागी।

हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी॥

आप संतान-प्राप्तिका उपाय पूछ रहे हैं, सो मेरी समझसे यह भी आपका मोह ही है। इस बुढ़ौतीमें संतान पाकर आप क्या करेंगे। मनमें मोहका बन्धन और भी दृढ़ हो जायगा। फँसावट और भी गाढ़ी हो जायगी। पुत्र होते ही वह आपको तार देगा, ऐसी आशा रखना मूर्खता है। रही वंश चलनेकी बात, सो पता नहीं, कितनी मानव और मानवेतर योनियोंमें आपके वंश चल रहे होंगे। अबतक आप पता नहीं कितनी योनियोंमें कहाँ-कहाँ जन्मे हैं, उनमेंसे अधिकांश जगह वंशपरम्परा चलती होगी। एक जन्ममें वंश नहीं चला तो कौन-सी बड़ी हानि हो जायगी। इस मोहको मनसे दूर कीजिये और भगवान‍्के भजनमें लगिये। पासमें जो पूँजी है, उसे जीवन-निर्वाहमें खर्च करनेके साथ-ही-साथ कुछ-कुछ सत्कार्यमें भी लगाते रहिये। जिससे आपलोगोंके बाद उसका दुरुपयोग न हो। दान वही यथार्थ है, जो अपने हाथों कर लिया जाता है। आजकल तो बने हुए ट्रस्टोंके भी तोड़नेकी बात सोची जा रही है!

परंतु यदि संतानकी एकान्त ही इच्छा हो तो उसके लिये भी भगवान‍्का आराधन ही प्रधान उपाय है। भगवान‍्की आराधनासे अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष—चारों ही पुरुषार्थोंकी सिद्धि होती है। शास्त्रोंमें कहा है कि श्रीहरिवंशपुराणके विधिपूर्वक पठन तथा श्रवणसे संतानकी प्राप्ति होती है। गोदान और पितृगणोंकी संतुष्टि भी संतान-प्राप्तिमें सहायक होती है। एक संतान-गोपालमन्त्र भी है। कहा गया है कि सच्ची श्रद्धा तथा विधिपूर्वक उसका ग्यारह लाख जप स्वयं करनेसे पुत्रोत्पत्ति होती है। वह मन्त्र यह है—

देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत:॥

इन साधनोंमें एक या सभी आप कर सकते हैं; परंतु निश्चयपूर्वक यह नहीं कहा जा सकता कि इतनेसे पुत्र हो ही जायगा। पता नहीं आपका प्रतिबन्धक कैसा है। प्रतिबन्धक प्रबल होगा तो इन्हीं साधनोंको श्रद्धा और धैर्यपूर्वक कई बार भी करना पड़ेगा। विशेष भगवत्कृपा!