छ: दोष और छ: गुण

सप्रेम हरिस्मरण! आपका कृपापत्र मिला। आपने जो कुछ पूछा, उसका उत्तर महात्मा श्रीविदुरजीके शब्दोंमें आपको लिख रहा हूँ। इनपर ध्यान देकर ऐसी चेष्टा करनेसे सफलता सहज ही हो सकती है।

षड्दोषा: पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता।

निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता॥

षडेव तु गुणा: पुंसा न हातव्या कदाचन।

सत्यं दानमनालस्यमनसूया क्षमा धृति:॥

(महा० उद्योग० ३३। ७८—८१)

‘ऐश्वर्यकी इच्छा करनेवाले पुरुषको निद्रा (अधिक सोना), तन्द्रा (जाग्रदवस्थामें ही ऊँघते रहना, मूढ़भाव), भय, क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता (जल्दीके काममें देर लगानेकी आदत)—ये छ: दोष छोड़ देने चाहिये। सत्य, दान, आलस्यका त्याग, अनसूया (किसीके गुणमें दोष न लगाना), क्षमा (अपराध करनेवालेपर भी क्षमा करना) और धैर्य (ऊबकर या घबराकर धीरज न छोड़ना, श्रद्धा-विश्वासके साथ सफलताके लिये धीरज रखकर प्रयत्नमें लगे रहना)—इन छ: गुणोंको कभी नहीं छोड़ना चाहिये।