चेष्टाओंसे स्वभावज्ञान

प्रिय महोदय! सादर सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। यह सत्य है कि मनुष्यकी आकृतिसे और उसकी चेष्टाओंसे उसके स्वभावका बहुत अंशमें पता लग सकता है; परंतु इस प्रयासमें सभी लोग सफल नहीं हो सकते। आकृतिविज्ञान एक प्रकारका शास्त्र ही है, पर उसकी मुझको जानकारी नहीं है, इसलिये इस विषयमें कुछ भी नहीं लिख सकता। हाँ, चेष्टाओंके सम्बन्धमें कुछ बातें सोची जा सकती हैं। जैसे—

(१) जिस मनुष्यको भोजन-पदार्थोंकी चर्चा बहुत अच्छी लगती हो, जो भोजनके किसी अमुक पदार्थकी चर्चा आनेपर हर्षित हो उठता हो और कहता हो कि ‘वह तो बहुत ही स्वादिष्ट—बहुत ही उत्तम है।’ वह आदमी प्राय: जीभका गुलाम या पेटू होता है। ऐसे लोग जब पंक्तिमें भोजन करने बैठते हैं, तब बगलके लोगोंकी पत्तलोंकी ओर टेढ़ी नजरसे ताका करते हैं।

(२) जिस मनुष्यको स्त्री-सम्बन्धी चर्चा बहुत अच्छी लगती हो, जो स्त्रियोंके अंगोंसे वस्तुओंकी तुलना करते हों, जिनकी स्त्री-साहित्यमें बड़ी रुचि हो, ऐसे लोग प्राय: ‘कामी’ स्वभावके होते हैं, यद्यपि वे बातोंमें या आचरणमें कोई लम्पटता नहीं दिखाते।

(३) जो लोग वेष-भूषा आदिसे शरीरको सजानेमें बहुत रुचि रखते हैं, वे स्त्री हों या पुरुष, प्राय: लम्पटताके दोषसे युक्त होते हैं। लोग मुझे सुन्दर देखें, इस भावसे शरीरको सजानेवालोंके मनमें ‘काम’ छिपा रहता है।

(४) जो लोग प्राकृतिक सौन्दर्यमें विशेष रुचि रखते हैं, प्रात:कालके और सन्ध्याके विविध रंगरंजित आकाशको बड़े चावसे देखते हैं, पक्षियोंके गानमें बड़ा सुख पाते हैं, दिनमें गम्भीर रहते हैं और रात्रिमें विशुद्ध आमोद-प्रेमी होते हैं, उनमें कलाकार या कविका भाव होता है। उनकी आमोदप्रियता मर्यादित होती है।

(५) जो लोग अपनी ही कहते रहते हैं, दूसरेकी सुनना चाहते ही नहीं, कोई कुछ बोलना चाहता है तो उसे तुरंत रोक देते हैं और सत्यका प्रकट होना पसंद नहीं करते, ऐसे वाचाल लोग उदार तो होते ही नहीं, सत्यसे डरनेवाले होते हैं।

(६) जो मनुष्य अपनी बड़ाई सुनकर, उसका विरोध करते हुए भी, मन-ही-मन प्रसन्न होते हैं, वे ‘मूर्ख’ होते हैं और प्राय: दूसरोंके द्वारा ठगे जाते हैं।

(७) जो लोग बात-बातमें शपथ खाते हैं, उनका स्वभाव बहुत ओछा होता है। वे किसी गम्भीर विषयमें चित्तका संयोग प्राय: नहीं कर सकते।

(८) जो लोग हाँ-में-हाँ मिलाते हैं और अपना कोई सिद्धान्त नहीं रखते, वे ‘चाटुकार’ माने गये हैं और उनके लिये सत्यका सन्धान पाना बहुत कठिन होता है।

(९) जिन लोगोंको परनिन्दा बहुत प्यारी लगती है और परनिन्दा सुनानेवालोंसे जो बड़ा प्रेम रखते हैं, उनके हृदयमें द्वेष भरा है। द्वेष न हो तो निन्दा सुननेका मन ही न हो।

(१०) जिन लोगोंको गहरी रात्रिके समय सन-सन करनेवाली लम्बी हवा अच्छी लगती है, वे प्राय: ही भावुक हृदयके या दार्शनिक भावोंके मनुष्य होते हैं।

(११) जो लोग एकान्तमें भजन, ध्यान, सद्विचार, सच्चिन्तन करते हैं, वे सच्चे साधक होते हैं।

(१२) जो लोग बात-बातमें कभी किसीको, कभी किसीको बुला-बुलाकर कानोंमें मुँह लगाकर बातें करते हैं, वे प्राय: अविश्वासी और सन्दिग्धमना होते हैं। ऐसे लोगोंपर दूसरोंको भी विश्वास नहीं करना चाहिये।

(१३) जो लोग रास्ता चलते हुए भी इधर-उधर ताकते रहते हैं, वे प्राय: मन्दबुद्धि या चोरस्वभावके होते हैं।

(१४) जो स्त्री पुरुषोंमें अधिक जाना-आना और पुरुषोंसे ही अधिक बातचीत करना पसंद करती है, उसके स्वभावमें प्राय: पुरुषाकर्षणप्रवृत्तिका दोष रहता है।

(१५) जो स्त्री बात-बातमें मुसकराती है और आँखें नीची करके लज्जाका भाव दिखलाती है, उसका हृदय प्राय: कुटिल होता है।

वास्तवमें मनुष्यके स्वभावका पता अकेलेमें लगता है। इसलिये एकान्तमें वह क्या करता है, रातको अकेलेमें उसकी क्या चेष्टा होती है—यह देखना चाहिये। परंतु जो साधक है, अपना हित चाहता है, वह दूसरेका एकान्त क्यों देखे। उसे तो नित्य-निरन्तर अपना एकान्त देखना चाहिये, जिसका देखना अत्यन्त आवश्यक है और जिसको वह आसानीसे बिना भूलके देख भी सकता है। हम स्वयं अपने मनके अंदर—मनके एकान्त कोनेमें—किस कोनेमें कब क्या हो रहा है, इसे भलीभाँति जान सकते हैं। अतएव उसीको देखे और उसमें दोष हो तो उसीके सुधारमें तत्परतासे लग जाय। तभी हमारा कल्याण होगा। शेष भगवत्कृपा।