दस प्रकारके मनुष्य

सादर हरिस्मरण। पहला पत्र मिल गया, आपको उससे राह पहचाननेमें बहुत सुविधा हुई—यह जानकर प्रसन्नता हुई। आपके प्रश्नके उत्तरमें दस प्रकारके मनुष्योंका विवरण लिख रहा हूँ—इनमें पहले चार उत्तम हैं, दूसरे दो मध्यम और तीसरे चार नीच।

पहले चारोंमें चौथेसे तीसरा, तीसरेसे दूसरा और दूसरेसे पहला अधिक उत्तम है। दूसरे दोमें दूसरेसे पहला उत्तम है और तीसरे चारोंमें पहलेकी अपेक्षा दूसरा, दूसरेकी अपेक्षा तीसरा और तीसरेकी अपेक्षा चौथा अधिक नीच है।

उत्तम—

(१) जो अपना नुकसान करके भी दूसरेको लाभ पहुँचावे। (यद्यपि इसमें इसका परिणाममें नुकसान होता नहीं, क्योंकि भगवान‍्के न्यायमें शुभका फल कभी अशुभ हो नहीं सकता।)

(२) जो अपना नुकसान तो न करे, परंतु अपने लाभकी परवा न करके दूसरेको लाभ पहुँचावे।

(३) जो अपने लाभके लिये ही दूसरेको लाभ पहुँचावे।

(४) जो अपना लाभ न होता हो तो दूसरेको भी लाभ न पहुँचावे।

मध्यम—

(१) जो अपना लाभ सोचे, परंतु दूसरेका नुकसान होता हो, ऐसा कोई काम अपने लाभके लिये न करे।

(२) जो अपना लाभ ही देखे—दूसरेके हानि-लाभकी उपेक्षा करे।

नीच—

(१) जो अपना लाभ न होता हो तो दूसरेका नुकसान न करे।

(२) जो अपने लाभके लिये दूसरेको जानकर नुकसान पहुँचावे।

(३) जो अपना नुकसान तो न करे, परंतु अपने लाभकी परवा न करके दूसरेको नुकसान पहुँचावे।

(४) जो अपना नुकसान करके भी दूसरेको नुकसान पहुँचावे।

इनमें उत्तम श्रेणीका प्रथम पुरुष सर्वोत्तम मानव है और नीच श्रेणीका चतुर्थ मनुष्य नीचतम प्राणी है। इस विवरणसे सम्भवत: आपको राह देखनेमें कुछ सुविधा हो सकती है।