धर्म क्या है?

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। ................

१—धर्मका अर्थ है धारण करनेवाला। लोकरक्षाके लिये किये जानेवाले सभी साधन धर्म हैं। जिससे अभ्युदय और नि:श्रेयसकी सिद्धि हो, वह धर्म है—‘यतोऽभ्युदयनि:श्रेयससिद्धि: स धर्म:।’ लौकिक उन्नतिका नाम अभ्युदय है एवं मोक्ष या भगवत्प्राप्तिका नाम नि:श्रेयस है। सत्य, शम, दम, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, क्षमा, दया आदि सभी भाव सामान्य धर्म हैं! वर्णधर्म, आश्रमधर्म, पुत्रधर्म, पत्नीधर्म आदि धर्म विशेष धर्मकी कोटिमें आते हैं। अपने अधिकारके अनुरूप शास्त्रीय कर्मोंका पालन भी धर्म है। इस प्रकार संक्षेपसे धर्मका स्वरूप बताया गया। अधिक जाननेके लिये ‘मानवधर्म’ नामक पुस्तक पढ़ें।

२—ईश्वर हैं—इस विषयपर कल्याणमें बहुत कुछ लिखा गया है। आपको यदि वहाँ कहीं कल्याणका ‘ईश्वरांक’ मिल सके तो पढ़ें। महामना मालवीयजीद्वारा लिखित ‘ईश्वर’ नामक पुस्तक गीताप्रेससे मँगाकर पढ़ें। रामचरितमानस और गीतासे भी आपको ईश्वरकी सत्ता समझनेमें बहुत अधिक सहायता मिल सकती है। आप हैं, यह जगत् है और सब कुछ किसी अज्ञात अदृष्ट शक्तिके अनुशासनसे यन्त्रवत् चालित हो रहा है। वही शक्ति ईश्वर है। घड़ा है तो उसको बनानेवाला कुम्हार भी है ही। जगत् है तो उसका स्रष्टा क्यों नहीं? ईश्वरकी कृपासे ही ईश्वरतत्त्व जाना जा सकता है।