दिन-रात भगवद्भजन कैसे हो?
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। आपको दिनभर काममें लगे रहना पड़ता है, अवकाश बहुत कम मिलता है, इसलिये तीव्र इच्छा होनेपर भी आप अलग बैठकर भजन-ध्यानके लिये समय नहीं निकाल सकते। काम करते हुए ही भजनका कोई तरीका जानना चाहते हैं—सो बहुत अच्छी बात है। मेरी समझसे ऐसी बात तो नहीं होनी चाहिये कि आपको समय मिलता ही न हो। शौच, स्नान, भोजन, शयन आदिके लिये समय किसी तरह आप निकालते ही होंगे। वैसे ही आप चाहें तो भजनके लिये भी कुछ समय निकाल सकते हैं। जो कार्य अत्यन्त आवश्यक होता है, जिस कार्यके प्रति मनमें आकर्षण होता है तथा जिसके लिये तीव्र इच्छा होती है, उसके लिये समय मिल ही जाता है। आप प्रयत्न करके देखें। आपकी लगन, रुचि तथा मनमें आवश्यकताकी भावना होगी तो आसानीसे समय मिल जायगा। फिर श्रीमद्भगवद्गीतामें श्रीभगवान्ने एक ऐसा तरीका बतलाया है कि जिससे यदि मनुष्य चाहे तो प्रतिक्षण भगवान्का भजन-पूजन बड़ी सुगमताके साथ कर सकता है। भगवान् कहते हैं—
यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:॥
(गीता १८।४६)
‘जिन परमात्मासे समस्त भूतोंकी उत्पत्ति हुई है और जिनके द्वारा यह सर्व जगत् व्याप्त है, उन परमात्माको अपने सहज कर्मोंके द्वारा पूजकर मनुष्य सिद्धिको (मानव-जीवनकी परम और चरम सफलताको) प्राप्त हो जाता है।’
भगवान्के इस आदेशके अनुसार मनुष्य चाहे जहाँ, चाहे जब, अपने ही द्वारा किये जानेवाले उसी समयके कर्मोंके द्वारा भगवान्का भजन-पूजन कर सकता है।
इसमें किसी स्थान-विशेष, समय-विशेष, स्थिति-विशेष और उपचार-विशेषकी आवश्यकता नहीं है। किसी भी वर्णाश्रमका मनुष्य, किसी भी स्थानमें, किसी भी स्थितिमें सर्वत्र स्थित भगवान्का पूजन कर सकता है। इस पूजनमें गन्ध-पुष्प, धूप-दीप आदिकी भी आवश्यकता नहीं है। जिस मनुष्यके लिये जो शास्त्रीय कर्म विहित है, उसीके द्वारा वह भगवान्की पूजा कर सकता है। बस, मनका भाव यह होना चाहिये कि ‘मैं जो कुछ कर रहा हूँ, सर्वव्यापी और सर्वाधार भगवान्की पूजा ही कर रहा हूँ।’ फिर सोना-जागना, खाना-पीना, जाना-आना, व्यापार-व्यवसाय करना, यहाँतक कि शरीर-शुद्धितकके सभी कर्म भगवान्की पूजाके उपकरण बन जायँगे। आप इस प्रकारसे हर समय भगवान्की पूजा कर सकते हैं। जिसको भी देखें, जिससे भी बात करें, मन-ही-मन यह निश्चय कर लें कि इस रूपमें भगवान् ही आपके सामने स्थित हैं। तदनन्तर उन्हें मन-ही-मन प्रणाम करके उस समयके लिये उसके साथ जिस प्रकारका व्यवहार-बर्ताव करना शास्त्रदृष्टिसे विहित हो, उसी प्रकारके व्यवहार-बर्तावद्वारा उनकी पूजा करें। फिर, आप अलग समय निकालकर भजन-पूजन न भी कर सकेंगे तो भी कोई हानि नहीं है। इस प्रकारसे भगवान्का भजन-पूजन करने लगनेपर आपके समस्त कर्म स्वाभाविक ही भगवदर्पण हो जायँगे और आपके चित्तमें सदा सहज ही भगवान्की स्मृति भी बनी रहेगी। भगवदर्पण कर्मोंका और भगवान्की नित्य स्मृतिका फल तो भगवत् -प्राप्ति है ही। भगवान् कहते हैं—
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनै:।
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥
(गीता ९।२७-२८)
‘अर्जुन! तुम जो कुछ भी कर्म करते हो—खाते हो, हवन करते हो, दान करते हो और तप करते हो सब मेरे अर्पण कर दो। इस प्रकार, जिसमें समस्त (लौकिक, पारलौकिक, पारमार्थिक आदि) कर्म मुझ भगवान्के अर्पण होते हैं, ऐसे संन्यासयोगसे युक्त चित्तवाले तुम शुभाशुभ फलरूप कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाओगे और उनसे मुक्त होकर मुझको ही प्राप्त होओगे।’
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥
(गीता ८। ७)
‘अतएव तुम सब समय निरन्तर मेरा स्मरण करो और युद्ध भी करो। इस प्रकार मुझमें अर्पित मन-बुद्धिसे युक्त होकर तुम नि:सन्देह मुझको ही प्राप्त होओगे।’
इस प्रकार मनुष्य भगवत्-स्मरण तथा भगवदर्पण-बुद्धिसे किये जानेवाले विहित कर्मोंके द्वारा भगवान्की पूजा करता हुआ अनायास ही भगवान्को प्राप्त कर सकता है और इस प्रकार सभी लोग कर सकते हैं। पर इसके साथ ही, कुछ समय प्रतिदिन अलग भी भगवान्का भजन-पूजन किया जाय तो उससे जल्दी लाभ होता है और वह सहज भी है। यह सत्य है कि पूरा भजन तो वही है, जो आठों पहर बिना विरामके और प्रत्येक कर्मके द्वारा ही होता रहता है। पर ऐसे भजनमें प्रवृत्ति हो, इसके लिये भी नित्य नियमपूर्वक कुछ समयतक अलग बैठकर भजन करनेकी आवश्यकता है। मेरी समझसे आप यदि थोड़ी भी चेष्टा करेंगे तो आपको समय मिल ही जायगा।
यह याद रखना चाहिये कि मानव-जीवनका एकमात्र लक्ष्य भगवत्प्राप्ति है और एकमात्र कर्तव्य भगवद्भजन है। चाहे जैसे भी हो, अपनी-अपनी रुचि तथा अधिकारके अनुसार यह अवश्य करना ही चाहिये। शेष भगवत्कृपा।