दो प्रकारके पापी

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। पापी दो प्रकारके होते हैं—एक वह, जिसकी पापमें पापबुद्धि है। उसके द्वारा पापकर्म बनता है, पर वह उसके हृदयमें सदा काँटा-सा चुभता है। आदत, व्यसन, परिस्थिति और कुसंग आदिके कारण समयपर वह अनियन्त्रित-सा हो जाता है और न करनेयोग्य कार्य कर बैठता है; परंतु पीछे उसे अपने उस दुष्कर्मके लिये बड़ी आत्मग्लानि होती है, बड़ा पश्चात्ताप होता है। ऐसी स्थितिमें वह पुन: वैसा दुष्कर्म न करनेका मन-ही-मन निश्चय करता है; परंतु अवसर आनेपर पुन: विचलित हो जाता है। अन्तमें रो-रोकर सर्वशक्तिमान् सदा सर्वत्र वर्तमान दीनैकशरण्य भगवान‍्को ही अपना एकमात्र त्राणकर्ता मानकर उनसे प्रार्थना करता है। ऐसे ही पापीके सम्बन्धमें श्रीमद्भगवद‍्गीतामें स्वयं भगवान‍्ने घोषणा की है—

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।

साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स:॥

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।

कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति॥

(९। ३०-३१)

‘महान् दुष्ट आचरण करनेवाला पुरुष भी यदि मुझको अनन्यभाक् होकर (अर्थात् भगवान‍्के सिवा किसी भी साधन, कर्म, योग, ज्ञान, देवता या इष्टको शरण्य और त्राणकर्ता न मानकर—केवल भगवान‍्को ही अपना एकमात्र रक्षक और आश्रयदाता जानकर) भजता है, उसे साधु ही मानना चाहिये; क्योंकि उसका निश्चय सर्वथा यथार्थ है। वह बहुत शीघ्र धर्मात्मा (सारे पापोंसे सर्वथा छूटकर धर्ममय) बन जाता है और शाश्वत शान्तिको प्राप्त होता है। अर्जुन! तुम निश्चय सत्य मानो कि मेरे भक्तका (इस प्रकार एकमात्र भगवान‍्को ही परम आश्रय माननेवाले पुरुषका) पतन नहीं होता।’

दूसरे प्रकारका पापी वह है, जिसकी पापमें उपेक्षाबुद्धि है अथवा पापासक्ति अधिक होनेके कारण जो पाप करके गौरव और गर्वका अनुभव करता है। ऐसे पापीका त्राण नहीं होता। उसका पतन अवश्यम्भावी है। इस प्रकारके पापीके लिये भगवान‍्ने कहा है—

न मां दुष्कृतिनो मूढा: प्रपद्यन्ते नराधमा:।

माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिता:॥

(गीता ७।१५)

‘जिनकी बुद्धि सर्वथा सम्मोहित हो गयी है, जिनका ज्ञान मायाके द्वारा सर्वथा हरा जा चुका है, जो आसुरभावका आश्रय किये हुए हैं, वे नराधम पापी मनुष्य मेरा भजन नहीं करते।’

आपके मनमें यदि पापसे घृणा है, पापके लिये घोर पश्चात्ताप है तो आप पहले प्रकारमें ही आते हैं और पहले प्रकारके पापीके लिये निराशाकी कोई बात नहीं है। आप करुणावरुणालय अशरणशरण पतितपावन दीनबन्धु भगवान‍्की सहज करुणाका भरोसा करके उनका समाश्रयण कीजिये। उनकी कृपाशक्तिका ऐसा विलक्षण स्वभाव है कि जो कोई विश्वास करके एक बार उसकी ओर कातर दृष्टिसे ताक लेता है, वह तुरंत ही उसकी सब प्रकारकी सारी पाप-कालिमाओंको सदाके लिये नष्ट कर देनेका संकल्प कर लेती है और जहाँ कृपाशक्ति किसी आर्त प्राणीके आर्तिनाशका निश्चय करती है, वहाँ भगवान‍्की अन्यान्य समस्त शक्तियाँ उसका सहयोग देने लगती हैं। भगवान‍्की कृपाशक्ति ऐसी अमित महिमामयी है कि समस्त शक्तियाँ सहज ही उसका अनुसरण करनेमें अपनेको धन्य मानती हैं और जब भगवान‍्की ये उदार शक्तियाँ किसीके उद्धारका मनोरथ और प्रयत्न करती हैं, तब उसके उद्धारमें कौन देर लगती है?—

जापर दीनानाथ ढरै,

सोइ सुकृती उदार सो अनुपम

सोइ सुकर्म करै।

राम कृपा करि चितवहिं जबही।

सकल दोष दुख नासहिं तबही॥

जापर कृपा राम कर होई।

तापर कृपा करइ सब कोई॥

भगवान् तो यह घोषणा ही कर चुके हैं कि वह पापात्मासे बदलकर ‘क्षिप्रम्’(तुरंत—चुटकी मारते-मारते) धर्मात्मा हो जाता है। उसका पतन तो हो ही नहीं सकता।

ऐसी अवस्थामें आपको न तो पापोंके लिये चिन्तित होना चाहिये और न पापकी प्रबल शक्तिसे डरना ही चाहिये। पापमें शक्ति ही कितनी है जो समस्त भगवत्-शक्ति-चूडामणि महान् उदार कृपाशक्तिके सामने क्षणभर भी ठहर सके। जैसे सूर्योदयकी अरुणिमाका उदय होते ही अमावस्याका घोर अन्धकार नाश होने लगता है और सूर्योदय होनेपर सूर्यके सामने तो उसका कहीं पता ही नहीं लगता—क्षणमात्रमें ही उसका क्षय हो जाता है। इसी प्रकार भगवान‍्की कृपाशक्तिका प्रकाश होते ही पापान्धकारका समूल नाश हो जाता है। बस, शर्त यही है कि मनुष्य अनन्य विश्वासके साथ कृपापारावार भगवान‍्की कृपाशक्तिका आश्रय ग्रहण कर ले।

अतएव आप श्रीभगवान‍्की कृपाका भरोसा करके उनकी शरण हो जाइये और मनमें यह निश्चय कीजिये कि उनकी कृपाशक्तिके सामने मनमें पापकी स्फुरणाका भी उदय नहीं हो सकता। फिर पाप तो होंगे ही कहाँसे। शेष भगवत्कृपा।