दुर्गामाताकी कृपा
प्रिय बहिन! सादर हरिस्मरण। पत्र मिला। यह जानकर प्रसन्नता हुई कि आप भगवतीजीका प्रत्यक्ष दर्शन करनेके लिये उत्सुक हैं और इसके लिये यथासम्भव साधन भी करती हैं। अबतक दर्शन नहीं हुआ, तो इसके लिये घबरानेकी आवश्यकता नहीं है।
देवी दुर्गा सम्पूर्ण जगत्की माता हैं, आपकी भी माँ हैं; माताका प्यार अपने संतानोंपर स्वाभाविक ही होता है। आपपर भी उनका प्यार है, कृपा है। दर्शन देना उन्हींके हाथकी बात है। वे सबकी अधीश्वरी और पूर्ण स्वतन्त्र हैं। किसी भी साधनमें या मन्त्र-यन्त्रमें ऐसी शक्ति नहीं है, जो उन्हें अपने प्रभावसे दर्शन देने अथवा अन्य कोई कार्य करनेके लिये बाध्य कर सके। माता दुर्गा स्वयं ही कृपा करके दर्शन देती हैं। आप दर्शनकी चिन्ता छोड़कर उनको अन्तर्भावसे पुकारें, उनका नाम जपें। सोते-जागते, चलते-फिरते हर समय उनका ही स्मरण करें। अपने-आपको उनकी शरणमें डाल दें, जो कुछ करें उन्हींकी प्रसन्नताके लिये करें। तन, मन, प्राण सब भगवतीकी सेवामें लगा दें। सबमें भगवती दुर्गा विराजमान हैं, ऐसा समझकर किसी भी व्यक्तिपर क्रोध न करें। सबको सुख पहुँचानेकी चेष्टा करें। माता दुर्गामें इतना प्रेम बढ़ा लें कि उनके दर्शन बिना एक क्षण भी रहना असम्भव हो जाय। ऐसी अवस्था आनेपर दयामयी माता स्वयं ही आपसे मिलनेको आकुल हो उठेंगी। वे दौड़ी आयेंगी और आपको छातीसे लगाकर निहाल कर देंगी!
वे जबतक समझती हैं कि दर्शन दिये बिना काम चल सकता है, इस मेरी पुत्रीकी माताके दर्शनकी इतनी तीव्र उत्कण्ठा नहीं है, जिससे इसका क्षणभर भी स्वस्थ रहना कठिन हो जाय, तबतक ही वे दर्शन देनेमें विलम्ब करती हैं।
कहनेका तात्पर्य यह कि दर्शन न होनेमें हमारी अपनी लालसाकी कमी ही कारण है। हमें अपनेको दर्शनके योग्य बनाना चाहिये। अधिकारी होनेपर माता स्वयं ही दर्शन देंगी। माताका नाम जपना, निरन्तर उनका स्मरण-ध्यान करना, उनमें प्रेम बढ़ाना और आर्तभावसे ‘माँ! माँ!’ कहकर उन्हें पुकारना—यही उनको पानेका अमोघ साधन है। यही आपके लिये सुगम भी पड़ेगा। मन्त्र-यन्त्रोंकी विधिका पूरा-पूरा पालन आपसे असम्भव है। संस्कृत नहीं जाननेसे भी पूर्वोक्त साधन चल सकता है। आशा है, आप इसपर मनन करेंगी।