ईश्वरका बोध ईश्वर-कृपासे ही होता है

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। धन्यवाद। आप ईश्वरपर विश्वास नहीं करते, किंतु ईश्वरविषयक जिज्ञासा आपकी प्रबल है; यह शुभ लक्षण है। ईश्वरका बोध तर्क और युक्तिसे नहीं होता। ईश्वरकी कृपासे ही होता है।’ ‘यमेवैष वृणुते तेन लभ्य:।’ जिसको वे स्वयं अंगीकार करते हैं, वही ईश्वरको पा सकता है अथवा जान सकता है। तर्क और युक्तिसे भी ईश्वरको समझनेमें कुछ सहायता मिलती है, परंतु वही पर्याप्त नहीं है।

आपको किसी सज्जनने यह युक्ति बतायी कि ‘प्रत्येकको किसीने उत्पन्न किया है। इसपर आप यह पूछ बैठे कि ईश्वरको किसने उत्पन्न किया है? वह यदि अपने-आप उत्पन्न हुआ है तो सब कुछ अपने-आप उत्पन्न हो सकता है।’ आपका कथन भी ठीक ही है; परंतु उस सज्जनने युक्तिके प्रतिपादनमें ही कुछ भूल कर दी। वास्तवमें प्रत्येक कार्यका कोई-न-कोई कर्ता होता है। जो उत्पन्न होता है और नष्ट होता है, वही कार्य है। कर्ता कार्यके पहले मौजूद रहता है। संसारके साधारण मनुष्य शरीररूपसे कार्य हैं और जीवात्मारूपसे कर्ता। जो कार्य अंश है, वह पूर्ववर्ती कर्ताकी अपेक्षा रखता है। समस्त विश्व तथा विशाल ब्रह्माण्ड उत्पत्ति-विनाशशील होनेके कारण कार्य है, अत: इसका भी कोई कर्ता होना चाहिये। वह कर्ता हमलोगोंमेंसे कोई हो नहीं सकता; क्योंकि अखिल ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिके पूर्व हम इस रूपमें नहीं थे। होते तो अवश्य इसकी उत्पत्ति देखते। अत: जो इस अखिल ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिसे पूर्व मौजूद रहकर इसका उत्पादन करता है, वही स्वतन्त्र कर्ता ईश्वर है। संहारका भी कोई-न-कोई कर्ता होता है; क्योंकि वह भी कार्य है। अत: प्रलयकालमें भी जो वर्तमान रहकर इसके संहारका कर्ता और साक्षी है, वह ईश्वर है। इस प्रकार ईश्वरकी सनातन सत्ता सिद्ध होती है। पांचभौतिक वस्तुओंसे होनेवाले कार्य ही कर्ताकी अपेक्षा रखते हैं। कर्ताकी शक्तिके बिना वे संगठित नहीं हो सकते। ईश्वर कर्ता है, कार्य नहीं है, अत: वह पांचभौतिक तत्त्वोंसे परे है, पृथक् है। वह साकार भी है और निराकार भी। जगत‍्में दो ही तत्त्व हैं, जड और चेतन। जड पांचभौतिक विकारोंका नाम है और चेतन निर्विकार है। ईश्वर केवल चैतन्यघन है; अत: वह उत्पन्न और विनष्ट नहीं होता। जीव भी ईश्वरके ही अंश हैं, अत: वे भी जन्म-मृत्युसे परे हैं। जैसे समुद्रकी तरंग समुद्रसे भिन्न नहीं होती, उसी प्रकार ईश्वरके अंश ईश्वरसे भिन्न नहीं हैं। जैसे समुद्रमें एक घड़ा हो और उस घड़ेमें समुद्रका जल भर जाय तो घड़ेके बाहर और भीतर एक ही समुद्रकी सत्ता है; तथापि जैसे घड़ेमें पड़ा हुआ समुद्रका जल अपनेको समुद्रसे पृथक् माने, उसी प्रकार जीव अपनेको ईश्वरसे पृथक् मानता है। पृथक्ताका अभिमान करनेवाले चेतनको ही ‘जीव’ कहते हैं।

आप ईश्वरको अपने अंदर ही ढूँढ़िये। यह शरीर, ये हाथ-पैर, ये नेत्र आदि किसकी प्रेरणासे काम करते हैं। मनकी प्रेरणासे। यह आप प्रत्यक्ष देखते और समझते हैं। मन कभी संकल्प-विकल्पमें पड़ता है, उसे भी आप देखते हैं; उस संकल्प-विकल्पकी स्थितिमें बुद्धिद्वारा कोई निर्णय होता है, यह भी आप समझते हैं। इस प्रकार शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि सबको आप पृथक् होकर देखते हैं। जाग्रत् में जो कुछ होता है, वह भी आप देखते हैं। स्वप्नमें जब केवल मन रहता है, उस अवस्थाका भी आपको स्मरण रहता है; उसे भी आप एक दर्शककी भाँति देखते हैं। सुषुप्तिकी प्रगाढ़ निद्रामें जो एक सुख-सा प्रतीत होता है, उसका अनुभव भी आप साथ रखते हैं। अत: आप इन सबसे परे हैं, साक्षी हैं। ये दृश्य हैं, आप द्रष्टा हैं। बुद्धिसे भी परे जो तत्त्व है, वह आप हैं। ऐसा आपको अनुभव होता है। अपने-आपसे परेकी कोई वस्तु आपके ध्यानमें नहीं आती। यह जो बुद्धिके परेकी चिद्वस्तु है, वही आत्मा है। यह आत्मा और ईश्वर अभिन्न है। इस प्रकार ईश्वरकी सत्ता आप देख सकते हैं। आप दूसरोंके अस्तित्वमें सन्देह कर सकते हैं, परंतु अपने अस्तित्वमें तो आपको कोई सन्देह नहीं है न? ‘मैं हूँ’ यह सभी प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं; इसके लिये कोई प्रमाण देनेकी आवश्यकता नहीं। अत: आत्मदर्शन प्रत्यक्ष है। यह आत्मा बुद्धिसे भी परेका तत्त्व है। यह भी विचारसे सिद्ध है; अत: चेतन है। चेतन ही जडका साक्षी होता है। चेतन कभी दो नहीं हो सकते, अत: आत्मा ही ईश्वर है। मन-बुद्धि अलग-अलग होनेसे पृथक्-पृथक् आत्माकी प्रतीति होती है। वस्तुत: समुद्रमें स्थित अनन्त घटोंकी भाँति अनन्त मन-बुद्धिमें एक ही चैतन्यघन ज्ञान-सिन्धु बाहर-भीतरसे परिपूर्ण है।

ईश्वरकी सत्ताको इस तरहसे भी समझ सकते हैं। प्रत्येक अपूर्ण वस्तु पूर्णताकी ओर जाती है, वह कहीं-न-कहीं पूर्णरूपसे स्थित है। जैसे जलकी पूर्णता समुद्रमें है, तैजसकी पूर्णता सूर्यमें है, स्पर्शकी पूर्णता वायुमें और अवकाशकी पूर्णता आकाशमें है। ये जड वस्तुएँ सर्वथा परिपूर्ण और विभु नहीं हैं तथापि उदाहरणके लिये इनका नाम ले लिया जाता है। इसी प्रकार ज्ञानकी भी कहीं पूर्णता होनी चाहिये। जहाँ अज्ञ और अल्पज्ञ हैं, वहाँ कोई सर्वज्ञ भी होगा। वह सर्वज्ञ तत्त्व ही ईश्वर है। जहाँ सम्पूर्ण ऐश्वर्य, सम्पूर्ण धर्म, सम्पूर्ण यश, सम्पूर्ण श्री, सम्पूर्ण ज्ञान और सम्पूर्ण वैराग्यकी प्रतिष्ठा है, वहीं ईश्वर है।

ये सब थोड़े-से विचार सामने रखे गये। आपको सद‍्ग्रन्थोंका स्वाध्याय और सत्पुरुषोंका संग करना चाहिये। जड वस्तुओंकी खोजमें तो लोग सारा जीवन बिता देते हैं; क्या कभी ईश्वरकी खोजमें भी दो-चार वर्ष आपने खपाये हैं, फिर ईश्वर नहीं है, ऐसा निर्णय कैसे कर लिया? ईश्वरका भजन कीजिये। ईश्वरभक्त महापुरुषोंका संग कीजिये तथा उनके बताये हुए मार्गपर कुछ कालतक चलते हुए साधन कीजिये। इतनेपर भी ईश्वरकी सत्ताका अनुभव न हो तो जो चाहिये सो बने रहिये। पहले कुछ कीजिये तो सही। शेष भगवत्कृपा।