ईश्वरकी आज्ञाके बिना पत्ता भी नहीं हिलता
सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। धन्यवाद। आपका प्रश्न है कि जब ईश्वरकी आज्ञाके बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता, तब पाप-पुण्यके लिये स्थान क्यों?
प्रश्न विचारणीय है। इसमें कुछ भी सन्देह नहीं कि विश्व-ब्रह्माण्डमें जो कुछ हो रहा है, उसमें ईश्वरकी ही प्रेरणा है—
भीषास्माद्वात: पवते। भीषोदेति सूर्य:। भीषास्मादग्निश्चेन्द्रश्च। मृत्युर्धावति पञ्चम:।
(तै०उ०२। ८। १)
‘परमात्माके भयसे ही पवन चलता है, सूर्य उगता है। अग्नि, इन्द्र और पाँचवाँ मृत्यु—सब अपना-अपना कार्य करते हैं।’ इन श्रुतियोंसे यही बात सिद्ध होती है। तब फिर पाप-पुण्यमें भी क्या ईश्वरका ही हाथ समझा जाय? यदि हाँ, तो फिर जीवोंको पापका दण्ड और पुण्यका पुरस्कार क्यों मिलना चाहिये?
इस विषयपर गहराईसे विचार करनेकी आवश्यकता है। श्रुति धर्म एवं सत्यके आचरणका आदेश देती है ‘सत्यं वद, धर्मं चर’ इत्यादि। हिंसा आदि पापोंका निषेध करती है—‘मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि’ इत्यादि। क्या करना चाहिये और क्या नहीं, इस विषयमें गीता वेदादि शास्त्रोंको ही प्रमाण मानती है—
‘तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।’
वेदादि शास्त्र ईश्वरकी ही आज्ञा हैं—‘श्रुतिस्मृती ममैवाज्ञे।’ अत: ईश्वरका यही आदेश जान पड़ता है कि ‘मनुष्य शुभकर्म करे और पापकर्मोंसे दूर रहे।’ इतना ही नहीं, श्रुतियोंमें पापके लिये दण्डकी स्पष्ट घोषणा है—
‘अथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन्......।’
अर्थात् ‘जिसका आचरण मलिन है—जो पाप करनेवाले हैं, वे निश्चय ही पापयोनियोंमें पड़ेंगे।’ इससे सिद्ध होता है कि पाप-पुण्यका उत्तरदायित्व उसके कर्तापर ही है। धर्मके उल्लंघनमें और पापके आचरणमें ईश्वरकी कोई प्रेरणा नहीं है। अपितु ईश्वरीय विधानमें इसका स्पष्ट निषेध ही पाया जाता है। दण्डविधान तभी सम्भव और न्यायसंगत है, जब मनुष्य पाप या अपराध करनेमें पूर्ण स्वतन्त्र हो। इससे स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य शुभाशुभ कर्म करनेमें स्वतन्त्र है।
जब ऐसी बात है, तब तो ‘ईश्वरकी इच्छाके बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता’ इस सिद्धान्तसे विरोध आता है। नहीं, सूक्ष्म विचारसे इस विरोधके लिये कोई स्थान नहीं है। सामान्यत: हलन-चलन, श्रवण-दर्शन, मनन-चिन्तन आदि जो मन और इन्द्रियोंके तथा जड जगत्के व्यापार हैं, जिन्हें हम केवल ‘चेष्टा’ कह सकते हैं, वह चेष्टा ईश्वरकी प्रेरणासे होती है। जिस शक्तिसे प्रेरित होकर प्रकृति अथवा प्राकृत जगत् कार्यक्षम होता है, वह ईश्वरकी ही शक्ति है। इसीलिये ईश्वरकी प्रेरणासे ही सब कुछ होता है, ऐसा कहा जाता है। केनोपनिषद्में एक इतिहास आता है—किसी समय देवताओंके मनमें यह अभिमान आ गया कि हमने अपने बलसे असुरोंपर विजय प्राप्त की है। उसी समय उनके सामने एक तेजस्वी महाकाय यक्ष प्रकट हुआ, उसका परिचय न पा सकनेपर अग्नि और वायु क्रमश: उसके समीप गये और अपनी शक्तिका बखान करने लगे। यक्षने उनके सामने एक तिनका रख दिया और कहा, ‘इसे जला दो या उड़ा दो।’ सारी शक्ति लगा देनेपर भी अग्निदेवता और वायुदेवता कृतकार्य नहीं हो सके, अन्तमें भगवती उमाके द्वारा सर्वप्रथम इन्द्रको यह ज्ञान हुआ कि ‘वह यक्ष साक्षात् ब्रह्म ही थे और देवताओंने उन परमात्माके ही बलसे असुरोंपर विजय पायी है।’ अत: ‘ईश्वरीय प्रेरणाके बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता।’ यह कथन सत्य ही है। ब्रह्मका निरूपण करते हुए श्रुति कहती है कि ‘वह नेत्रका भी नेत्र, कानका भी कान और मनका भी मन है। यह स्वरूप नेत्रसे नहीं देखता, नेत्र ही उससे—उसकी शक्तिसे देखते हैं।’ इसी प्रकार कान, मन आदि भी उसीकी शक्तिसे कार्यक्षम होते हैं। ईश्वरकी शक्ति और प्रेरणाके बिना कोई कुछ भी नहीं कर सकता। गायत्रीमन्त्रमें उसी प्रेरक शक्तिका चिन्तन किया जाता है। जैसे मशीनको चालू कर देना बिजलीका काम है, उसी प्रकार सम्पूर्ण भौतिक या प्राकृत जगत्को संचालित कर देना ईश्वरका कार्य है; परंतु बिजलीकी शक्तिसे चलनेवाली मशीनका उपयोग करनेवाला मनुष्य ही उसके सदुपयोग या दुरुपयोगके लिये उत्तरदायी होता है, न कि मशीन या बिजली। यदि छपाई ठीक नहीं हुई तो मशीनमैन ही उसका उत्तरदायी होगा। बिजलीको कोई दण्ड नहीं दिया जा सकता, यद्यपि उसके बिना मशीन कुछ भी नहीं कर सकती। इसी प्रकार मनुष्यके मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ अन्तर्यामी प्रभुकी प्रेरणासे ही कार्य करनेमें समर्थ होते हैं; परंतु इनसे शुभ या अशुभ कार्य करनेका उत्तरदायी स्वयं वह मनुष्य ही है, न कि उसके हाथ, पैर या उनमें शक्ति देनेवाला ईश्वर।
गीतामें प्रत्येक शुभाशुभ कर्मके लिये पाँच हेतु माने गये हैं—अधिष्ठान (स्थान), कर्ता, करण, चेष्टा और प्रारब्ध। इनमें स्थान, करण और चेष्टा जड होनेके कारण उत्तरदायी नहीं हैं। प्रारब्ध अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितिकी सृष्टिमात्र करता है। अत: उसपर भी कर्मका उत्तरदायित्व नहीं लादा जा सकता। अब केवल एक कर्ता पुरुष बच रहता है और वही कर्मोंके लिये उत्तरदायी है। इन पाँचों हेतुओंमें ईश्वरका नाम नहीं है। ईश्वरकी प्रेरणासे चेष्टामात्र होती है। जैसे बिजलीके चूल्हेपर भगवान्के भोगके लिये पवित्र हविष्यान्न भी सिद्ध किया जा सकता है और मांस भी पकाया जा सकता है, उसी प्रकार क्रियाशील इन्द्रियादिके व्यापारसे मनुष्य शुभ और अशुभ कर्म करता है। जैसे बिजलीसे जलनेवाले चूल्हेपर हविष्यान्न पकाने या मांस पकानेमें मनुष्य स्वतन्त्र है, उसी प्रकार ईश्वरीय प्रेरणासे मन-इन्द्रियोंके कार्यक्षम होनेपर भी मनुष्य कर्म करनेमें, न करनेमें या विपरीत करनेमें सर्वथा स्वतन्त्र है। इसीसे मनुष्यको कर्मयोनि कहा गया है और इसीलिये वह उत्तरदायी भी है।
अब यह प्रश्न होता है कि मनुष्य इच्छा न रहनेपर भी, पापको बुरा समझनेपर भी पापमें कैसे प्रवृत्त होता है? अर्जुनके इसी प्रश्नका उत्तर भगवान्ने गीताके तीसरे अध्यायमें दिया है। वहाँ उन्होंने स्पष्ट शब्दोंमें पापकर्ममें काम और क्रोधको ही प्रेरक बतलाया है। ये काम-क्रोध रहते हैं इन्द्रिय, मन और बुद्धिमें। इन सबपर आत्माका स्वामित्व है, अत: वहाँ काम-क्रोधको स्थान देकर पाप करनेका उत्तरदायित्व मनुष्यपर ही है; क्योंकि वह इच्छा करनेपर काम-क्रोधका नाश करके पापकर्मसे बिलकुल बच सकता है। इसीसे भगवान्ने अन्तिम श्लोकमें कामरूपी शत्रुको मारनेकी आज्ञा दी है।
आशा है, उपर्युक्त पंक्तियोंसे उक्त विरोध मिट जायगा। शेष भगवत्कृपा।