एक दीर्घजीवी महात्मा

सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र समयपर मिल गया था। भारतवर्ष रत्नोंकी खानि है। पता नहीं, यहाँ कितने वयोवृद्ध महात्मा होंगे। मुझे एक परम भक्त वैष्णव महापुरुषके दर्शनका सौभाग्य कई बार हुआ था। उनका शुभ नाम था पण्डित रसिकमोहन विद्याभूषण। शुभ्र गौर शरीर, साक्षात् शान्त शंकरकी-सी मूर्ति, विशाल उन्नत ललाट, लम्बी स्वर्ण-प्रतिम जटा, अपूर्व ज्योतिसे चमकते हुए प्रेमाश्रुपूर्ण नेत्र, स्नेह और वात्सल्यसे पूरित मधुर वाणी, वैष्णवशास्त्रका विशाल पाण्डित्य, अधिक क्या, उनके एक-एक गुणके सामने भक्ति-प्रणत होकर मस्तक झुक जाता था। पहले-पहल झूसीमें ब्रह्मचारी श्रीप्रभुदत्तजी महाराजके अखण्ड-कीर्तनमें उनके दर्शन हुए थे। पं०श्रीचिम्मनलालजी गोस्वामी मेरे साथ थे। गोस्वामीजी कीर्तन कराने लगे, इतनेमें ही आसनपर विराजित विद्याभूषण महाशय उठे और गोस्वामीजीका हाथ पकड़कर नाचने लगे। उस समय भी उनकी अवस्था सौ वर्षसे ऊपर थी। कलकत्तेमें रहते थे। उसके बाद भी मैंने कई बार उनके दर्शन किये। वे ‘कल्याण’ में लिखते भी थे। वे प्राच्य और पाश्चात्य दर्शनशास्त्रके पण्डित थे। संस्कृत, बंगला और अंग्रेजी तथा उड़िया भाषापर आपका पूर्ण अधिकार था। गतवर्ष* मार्गशीर्षमें वे गोलोकवासी हुए।

उस समय उनकी अवस्था एक सौ नौ वर्षकी थी। उन्होंने अपने सुदीर्घ भजनमय जीवनमें वैष्णव-जगत‍्को बंगलाभाषामें जो बीसों ग्रन्थरत्नोंका दान किया है, वह सचमुच अपूर्व है। वे इधर प्राय: बीस सालसे सोये नहीं थे। रातों जगकर नाम-जप किया करते थे। कहते हैं क अन्तकालमें उन्होंने कहा—‘देखो-देखो! कैसे सुन्दर दो बालक नाच रहे हैं। कितनी सुन्दर खोल बज रही है, अहा! इतना सुन्दर खोलका बजना तो मैंने कभी नहीं सुना, बालकोंका ऐसा नृत्य तो मैंने कभी नहीं देखा। ये मुझे बुला रहे हैं, जल्दी मेरी नाम-जपकी माला दो।’ किसी भक्तने नाम-जपकी माला दी। उन्होंने उसे तुरंत हृदयसे लगा लिया और महान् योगिराजकी भाँति परमधाममें चले गये।

इनके-जैसे, अन्य कोई महात्मा इतनी उम्रके इस समय कहीं हैं या नहीं मुझे पता नहीं। बरहजमें भक्तराज परमहंस श्रीअनन्तप्रभुजी भी बहुत बड़ी अवस्थामें साकेत पधारे थे और कहते हैं, उनके रोम-रोमसे भगवन्नामकी ध्वनि निकला करती थी। प्रसिद्ध राजनीतिक नेता बाबा राघवदासजी इन्हींके शिष्य हैं।

आजकल प्रकटमें ऐसे महात्माओंका अभाव-सा हो गया है। शायद इस प्रकारके लोगोंके निर्वाणका युग ही चला गया है!