गया-श्राद्धसे पितरोंकी तृप्ति
प्रिय महोदय! सादर सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। ‘कल्याण’ में मृत पितरोंके श्राद्धके सम्बन्धमें कई बार लेख आ चुके हैं। आप ‘कल्याण’ पढ़ते हैं तो आपने उन लेखोंको भी पढ़ा ही होगा। मरे हुए पितरोंका श्राद्ध विधि तथा श्रद्धाके साथ अवश्य करना चाहिये। आप मेरा मत पूछते हैं तो यही मेरा सुदृढ़ मत है। आपने गया-श्राद्धके सम्बन्धमें पूछा सो गया-श्राद्ध भी अवश्य करना चाहिये। ‘पुत्रकी पुत्रता तीन ही बातोंसे सिद्ध होती है—१. जीवित माता-पिताकी आज्ञाका पालन करना, २. मृत्युकी तिथिपर प्रतिवर्ष खूब ब्राह्मणभोजन कराना और ३. गयाजीमें जाकर पिण्ड देना’—
जीवतोर्वाक्यकरणात् प्रत्यब्दं भूरिभोजनात् ।
गयायां पिण्डदानाच्च त्रिभि: पुत्रस्य पुत्रता॥
‘जो पुत्र गयामें जाकर पिण्डदान करता है, उसी पुत्रसे पितर अपनेको पुत्रवान् समझते हैं और गयामें पिण्ड देकर ही पुत्र पितृ-ऋणसे उऋण होता है’—
गयां गत्वान्नदाता य: पितरस्तेन पुत्रिण:।
गयायां पिण्डदानेन पितॄणामनृणो भवेत्॥
पुत्रके लिये गयामें जाकर पिण्डदान करना परम आवश्यक कर्तव्य है। पितृगण अपनी संतानसे सदा ही यह आशा करते हैं कि वे गयामें पिण्डदान करें और न करनेपर उन्हें बड़ा शोक होता है।
हमें स्वयं ऐसी कई घटनाओंका परिचय है, जिनसे यह सिद्ध होता है कि गया-श्राद्धसे परलोकमें पीड़ित पितरोंको बड़ा सुख मिलता है, उनकी तृप्ति होती है और उनका बड़ा हित होता है।
पितरोंके हितके लिये ‘हरि-नाम-संकीर्तन’ करना या कराना भी बहुत ही उत्तम है, इससे भी बड़ा लाभ होता है; परंतु इसका यह अर्थ नहीं कि हरिकीर्तन करा देनेपर गया-श्राद्ध नहीं करना चाहिये।