काल करै सो आज कर
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिल गया था। उत्तरमें देर हुई, इसके लिये क्षमा करें। आपके विचार बहुत ही उत्तम हैं। आपने जो योजना सोची है, वह भी बढ़िया है; परंतु आप समर्थ होते हुए भी बारह सालसे केवल सोच ही रहे हैं, कुछ कर नहीं रहे हैं, यह ठीक नहीं है। आप जैसे अनुकूल समयकी प्रतीक्षा कर रहे हैं, कौन कह सकता है कि वैसा अनुकूल समय आयेगा या नहीं या उसके आनेके पहले ही आप संसारसे चले नहीं जायँगे। भजन, दान और धर्मसंग्रह आदि कार्योंमें जरा भी विलम्ब नहीं करना चाहिये। पाप-प्रवृत्तिमें चिरकारिता, दीर्घसूत्रीपन होना बहुत अच्छा है; परंतु सत्कार्यमें तो यह बड़ा भारी विघ्न है। महाभारतमें कहा है—
श्व: कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्णे चापराह्णिकम्।
न हि प्रतीक्षते मृत्यु: कृतमस्य न वा कृतम्॥
‘कल करना हो उसे आज करो, दिनके पिछले पहरमें करना हो उसे पहले पहरमें कर लो; तुम्हारा काम हुआ या नहीं, मृत्यु इसकी बाट नहीं देखेगी।’
इसीका अनुवाद कबीरजीके इस दोहेमें है—
काल करे सो आज कर आज करै सो अब।
पलमें परलै होयगी फेरि करैगा कब॥
मेरे एक आदरणीय मित्र थे, बड़े आदमी थे, अच्छा हृदय था। उन्होंने कई योजनाएँ सोच रखी थीं। योजनाएँ सभी लोकोपकारिणी और सुन्दर थीं; परंतु वे उन योजनाओंको सफल नहीं बना सके, पहले ही उनका देहावसान हो गया और सारी बातें मन-की-मनमें ही रह गयीं।
अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वत:।
नित्यं संनिहितो मृत्यु: कर्तव्यो धर्मसंग्रह:॥
‘शरीर सदा नहीं रहते, न वैभव ही सदा रहता है और मृत्यु सदा समीप है, यह समझकर धर्मका संग्रह करनेमें विलम्ब नहीं करना चाहिये।’
पता नहीं, कल मन बदल जाय, स्थिति बदल जाय, साधन न रहें, इसलिये आपको अपनी योजना कार्यरूपमें परिणत करनेके लिये जल्दी करनी चाहिये। यह मेरा आपसे बलपूर्वक अनुरोध है।
अब रही भजनकी बात, सो वह तो अत्यन्त ही आवश्यक है। मुझे पता नहीं आपकी क्या उम्र है; परंतु भजन तो लड़कपनसे ही करना आवश्यक है। कोई आज मरे या सौ वर्षके बाद, भजन सदा बनता रहे। पता नहीं, कब मौत आ जाय। भजन बिना ही यदि शरीर छूट गया तो इससे बढ़कर और कोई हानि नहीं होगी। मनुष्य-जन्म ही व्यर्थ हो जायगा। जो लोग कहते या मानते हैं कि अभी तो काम करने या भोग-भोगनेका समय है, बड़ी उम्र होगी तब भजन करेंगे, वे वस्तुत: बड़े भ्रममें हैं। एक भ्रमर था। वह कमलकोषमें जा बैठा और मधुपान करने लगा। सन्ध्या होने आयी। कमल सिकुड़ने लगा। उसने सोचा—
रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं
भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पङ्कजश्री:।
इत्थं वितर्कयति कोषगते द्विरेफे
हा हन्त हन्त नलिनीं गज उज्जहार॥
‘रात बीतेगी, सुन्दर प्रभात होगा, सूर्यदेव उदय होंगे, तब कमलकी कलियाँ खिल जायँगी। (उस समय मैं निकल जाऊँगा, इतने रात्रिभर आनन्दसे मकरन्द-रसका पान करता रहूँ) इस प्रकार कमलकोषमें बैठा हुआ भ्रमर विचार कर ही रहा था कि हाय! हाय!! हाथीने आकर कमलको उखाड़ फेका (और दाँतों-तले दबाकर भ्रमरके सहित ही उसे पीस डाला)।’
यही बात हमारे लिये है, पता नहीं, काल-कुंजर कब आकर हमें पीस डालेगा। इसलिये मेरा आपसे यही अनुरोध है कि आप अपनी योजनाको कार्यान्वित करनेमें जरा भी विलम्ब न करें और साथ ही मानव-जीवनके सर्वप्रथम और सर्वप्रधान कर्तव्य भगवद्भजनमें तो तत्परताके साथ लग ही जायँ। ऐसा न कर सके तो सम्भव है औरोंकी भाँति आपको भी पछताना ही पड़े। शेष भगवत्कृपा।