कल्प-भेदसे अवतार-भेद

सप्रेम हरिस्मरण! आपका कृपापत्र मिला। धन्यवाद। प्रत्येक कल्पमें भगवान् श्रीरामका अवतार होता है तथा प्रतिकल्पमें ही वे रावण-कुम्भकर्णादिका वध करते हैं। सृष्टिचक्र अनादि कालसे चला आ रहा है। पता नहीं, अबतक कितने कोटि कल्प बीत गये होंगे। उन अनन्तकोटि कल्पोंमें अनन्त बार भगवान‍्ने श्रीराघवेन्द्रके रूपमें अवतरित होकर अनन्त प्रकारकी चित्र-विचित्र लीलाएँ की हैं। इसी प्रकार रावण आदि भी अनन्त बार हुए हैं। पर यह आवश्यक नहीं कि प्रति कल्पमें वही आत्मा रावणके शरीरमें रही हो। एक शरीरमें कई आत्माओंके रहनेकी तो कल्पना ही नहीं करनी चाहिये। प्रत्येक कल्पमें एक ही आत्मा रावणके शरीरमें रहती है। रामचरितमानसमें श्रीगोस्वामीजीने ऐसे कई व्यक्तियोंका उल्लेख किया है, जो जन्मान्तरमें रावण-कुम्भकर्ण हुए थे। जैसे जय-विजय, जालन्धर आदि, दो हरगण तथा प्रतापभानु-अरिमर्दन आदि। जिस कल्पमें जय-विजय रावण-कुम्भकर्ण हुए, उस कल्पमें वैकुण्ठविहारी अखिल जगत‍्के स्वामी भगवान् श्रीविष्णु श्रीरामके रूपमें अवतरित हुए थे और कश्यप तथा अदितिने दशरथ-कौसल्याके रूपमें जन्म लिया था। यह अवतार सनकादिके दिये हुए अपने पार्षदविषयक शापका निवारण करनेके लिये हुआ था।

जिस कल्पमें प्रतापभानु और अरिमर्दन रावण-कुम्भकर्ण हुए, उस कल्पमें स्वायम्भुव मनु और शतरूपा दशरथ-कौसल्याके रूपमें आविर्भूत हुए। इनके घर सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, दिव्य-गुणसम्पन्न, प्राकृत-गुणरहित परमेश्वर श्रीसाकेतविहारीजी अवतीर्ण हुए थे। ऐसे ही प्रत्येक कल्पमें विभिन्न हेतुओंसे विभिन्न आत्माओंने रावण-कुम्भकर्णके रूपमें शरीर धारण किया था। और भी प्रभुके अनेक अवतार अनेकों हेतुओंसे हुए थे। श्रीगोस्वामीजी कहते हैं—

राम जनम के हेतु अनेका।

परम बिचित्र एक तें एका॥

× × × ×

कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं।

चारु चरित नाना बिधि करहीं॥

अतएव ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये कि ‘एक ही रावण-कुम्भकर्ण प्रतापभानु-अरिमर्दन भी थे, जय-विजय भी थे और दोनों हरगण भी थे।’ यह सब कल्पभेदकी विभिन्न कथाएँ हैं और सभी सत्य हैं।