कर्मका उत्तरदायित्व कर्तापर है
सप्रेम हरिस्मरण! कृपापत्र मिला।......सगोत्र-विवाहका शास्त्रोंमें एक स्वरसे निषेध किया गया है। सगोत्रा स्त्रीसे जो सन्तान उत्पन्न होती है, उसे चाण्डालके समान माना गया है। यदि अनजानमें सगोत्रा कन्यासे विवाह हो जाय तो उसे त्यागकर प्रायश्चित्तके रूपमें चान्द्रायणव्रत करनेका विधान मिलता है। इससे सिद्ध है कि सगोत्रा कन्याके साथ किया गया विवाह-सम्बन्ध पाप है। तभी उसके लिये प्रायश्चित्त बतानेवाले वचनोंकी संगति लगती है।
पाप और पुण्यमें मनुष्य केवल अपनी इच्छासे प्रवृत्त होता है। शास्त्रोंने पापका निषेध और पुण्यका विधान मात्र कर दिया है। पापीको दण्ड और पुण्यात्माको उसके कर्मानुसार पुरस्कार मिलता है। यदि केवल प्रारब्ध या दैवकी प्रेरणासे पापमें प्रवृत्ति हो तो मनुष्यको दण्ड और पुरस्कार नहीं मिलने चाहिये; किंतु कर्मोंका फल भोगना ही पड़ता है, ऐसा शास्त्रका वचन है। अत: यह निर्विवाद सिद्ध है कि कर्मोंके करनेका सारा उत्तरदायित्व कर्तापर ही है।
धन, भोग-सामग्री, सुख एवं दु:ख आदि अपने पूर्वजन्मोंके कर्मोंके फल हैं। किसको कितना सुख, कितना दु:ख मिले—यह प्रारब्धपर निर्भर है; किंतु उसे प्राप्त करनेके लिये जो चेष्टा होती है, वह मनुष्यकी अपनी रुचिसे होती है। अत: यदि वह चेष्टा शास्त्रानुकूल, धर्म और न्यायसे युक्त हुई तो वह पुण्य है और उसका भावी फल भी सुखमय है; इसके विपरीत यदि शास्त्र-विरुद्ध, अधर्म और अन्यायसे युक्त चेष्टा हुई तो उसका भावी फल दु:ख है, क्लेश है। जैसे किसीको दस हजार रुपये मिलना है, यह प्रारब्धका फल है; किंतु उसे प्राप्त करनेके अनेक मार्ग हैं! प्रारब्ध मार्गका निर्देश नहीं करता। उसे चुनता है मनुष्य अपनी ही इच्छासे। वह उसके लिये धर्म एवं न्यायपूर्वक व्यापार भी कर सकता है और चोरी आदि अन्यायसे भी उसे प्राप्त कर सकता है। एक मार्ग पुण्यमय है और दूसरा पापमय है। दोनोंसे धन उतना ही मिलेगा, जितना प्रारब्धमें है; किंतु असत् मार्गको जिसने स्वेच्छासे अपनाया, उसने भविष्य-जीवनमें अपने लिये दु:खकी नींव खोद ली।
इसी प्रकार स्त्री-सुख भी पूर्वकर्मका निर्धारित फल हो सकता है; किंतु उसे पानेके लिये सत्-मार्ग भी है, असत्-मार्ग भी है। शास्त्रके अनुसार विधि-निषेधके पालनपूर्वक अपने वर्णकी उत्तम कन्याके साथ जो वैदिक विधिसे विवाह सम्पन्न होता है, वह सन्मार्ग है। सगोत्रा कन्या अथवा नीच कुलकी कन्याको कामवश अपनाना, परायी स्त्रियों अथवा वेश्याओंसे सम्बन्ध स्थापित करना आदि पाप एवं असन्मार्ग हैं। यह पहलेसे विधि-निर्धारित था, ऐसा नहीं कहा जा सकता; क्योंकि इसके लिये शास्त्रोंमें स्पष्टत: दण्डविधान किया गया है।
शास्त्रकी मर्यादा यही है, यही धर्म है और यही ईश्वरकी आज्ञा है। इसीके पालनसे मनुष्यका भला हो सकता है। शेष भगवत्-कृपा।