कठोर व्रत है पर उसीको निभाना है
बहिन! मैं तुम्हें क्या लिखूँ। तुम्हारी स्थितिकी स्मृति ही मेरी आँखोंसे अश्रुधारा बहा देती है। यह मेरा चाहे मोह हो, पर है तो सही ही। पर असल बात यह है कि भगवान्ने अयाचितरूपसे तुम्हें जो कुछ दिया है, उसे सिर चढ़ाकर स्वीकार करना चाहिये और उसीमें मंगल समझना चाहिये। न स्वीकार करोगी, न अपनाओगी तो भी वह हटेगा तो नहीं। तब फिर, उसे संतोषके साथ ग्रहण करनेमें ही बुद्धिमानी है और उसीमें यथार्थ लाभ भी है। माना, यह महान् दु:ख है, भयानक विपत्ति है; परंतु धर्मप्राण व्यक्तियोंकी कसौटी तो विपत्ति और दु:ख ही हैं। सोना ही आगमें तपाया जाता है। यह आग है। पर यदि यही आग तुम्हारे जन्म-जन्मान्तरके विषयानुरागको जलाकर तुम्हारे हृदयको विषय-वासनाशून्य बना दे सके तो कितने मंगलकी बात है। संखियेको परिशुद्ध करके उसका यथाविधि सेवन करनेमें ही बुद्धिमानी है। जो स्थिति मिल गयी है, वह तो मिल ही गयी। अब उस स्थितिको प्रतिकूल मानकर रोना, जीवनको तमसाच्छन्न बना डालना और मानवोचित कर्तव्योंसे च्युत हो जाना तो बुद्धिमानी नहीं है; बुद्धिमानी तो उस स्थितिको अनुकूल बनाकर उसे मानव-जन्मकी सफलताका साधन बनानेमें ही है।
तुम्हारे कुछ हितैषी तुम्हें जो दूसरा मार्ग दिखला रहे हैं और उससे तुम्हें बड़ी मनोवेदना हो रही है—सो तुम्हारी मनोवेदना तो उचित ही है। जिसकी वंशपरम्परामें सदा ही उस दूसरे मार्गको पाप समझा गया हो, जिसके संस्कारमें ऐसी बातका सुनना भी अपराध माना गया हो, उसको अपने ही लिये ऐसी बात सुनकर दु:ख तो होगा ही। मैं तो तुम्हारे ही मतका हूँ, यह तुम जानती ही हो। जो सज्जन दूसरे मार्गका निर्देश कर रहे हैं, वे भूलमें हैं और वे सुखके भ्रमसे भारी दु:खके बीज बो रहे हैं। तथापि उनकी हितैषिताकी भावनामें तुम्हें जरा भी सन्देह नहीं करना चाहिये! वे तुम्हारे दु:खसे सचमुच दु:खी हैं, वे तुम्हें सुखी देखना चाहते थे और चाहते हैं; पर उनकी दृष्टि दूसरी है। वे जहाँतक देख पाते हैं, वहाँतक उन्हें उनके मतके समर्थक कारण ही मिलते हैं। आज हमारे समाजकी जो दुर्दशा है, उसे देखकर उनका ऐसा मत हो जाय तो इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। इसलिये उनके मतका अनुसरण न करते हुए भी उनके आत्मीयभाव तथा सद्भावका तो आदर ही करना चाहिये। पर यदि तुम्हारा अपना व्रत दृढ़ है, तुम प्रत्येक परिस्थितिका सामना करनेके लिये तैयार हो तो तुम्हें कोई डिगा नहीं सकता। भगवान् तुम्हारे शुभ संकल्पमें सहायक होंगे। अवश्य ही तुम्हारा व्रत है बड़ा कठोर और सर्वथा तपोमय। आजके युगमें तुम कुछ देवियाँ ही ऐसी हो जो संसारमें तप, व्रत और त्यागकी प्रभामयी ज्वाला बनकर सर्वत्र प्रकाश फैला रही हो। तुम्हें धन्य है और धन्य है तुम्हारे असिधारा व्रतको! मेरा तो मस्तक तुम सतियोंके चरणोंमें सदा ही नत है। भगवान् तुम्हारी सहायता करें। शेष भगवत्कृपा।