खर्च घटनेका उपाय—सादगी
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आजकल हमलोगोंके खर्च बहुत बढ़ गये हैं—यह सत्य है। इसका कारण महँगी तो है ही। साथ ही हमारी रहन-सहनकी खर्चीली पद्धति भी है। रहन-सहनका स्टैंडर्ड (स्तर) ऊँचा करनेकी चर्चा इधर बहुत जोरोंसे चल रही थी। इस स्तरकी उच्चताने इतना अधिक व्यर्थ खर्च बढ़ा दिया है कि जिसकी पूर्ति अब बहुत कठिन हो गयी है। अभाव जितना बढ़ाइये, उतना ही बढ़ता रहेगा। कामनाका अन्त कहाँ है? और जितनी ही कामना बढ़ेगी, उतना ही अनाचार, भ्रष्टाचार और पाप बढ़ेगा—यह प्रत्यक्ष है। भगवान्ने गीतामें भी इस कामनाको ही महाशन (भोगोंसे कभी तृप्त न होनेवाला), महापापी और मनुष्यका शत्रु बतलाया है। ‘महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।’ (३। ३७) और पापका फल दु:ख होगा ही। एक युग था, जब यहाँके निवासी कहते थे—
स्वच्छन्दवनजातेन शाकेनापि प्रपूर्यते।
अस्य दग्धोदरस्यार्थे क: कुर्यात् पातकं महत्॥
‘वनमें उत्पन्न होनेवाले शाक आदिके द्वारा ही जब पेट भर जाता है, तब इस पेटके लिये कोई महान् पाप क्यों करेंगे।’ आज यह सपनेकी-सी बात हो गयी है!
आज तो हमारा पेट इतना बढ़ गया है कि वह किसी भी हालतमें भरता ही नहीं। कामनाकी भूखका क्या ठिकाना। इसीसे आज प्रत्येक व्यक्ति अर्थ और अधिकारके पीछे पागल है।
खान-पानमें अपनी देशप्रथाके अनुसार पहले जो कुछ होता था, उसमें एक संयम था। अब देशके बड़े-बड़े अग्रणी पुरुष भी अंग्रेजी पढ़-लिखकर ब्रेक-फास्ट (प्रात:कालीन भोजन), लंच (मध्यकालीन भोजन), टिफिन (मध्याह्नोत्तर ब्यालू), डिनर (रात्रि-भोजन) करते हैं। इसके सिवा, बेड टी (विस्तरकी चाय)-से लेकर रात्रितक कई बार बिस्कुटसहित चाय अलग ली जाती है। फल और सूखा मेवा अलग। अब बतलाइये, भोजन-खर्च क्यों न बढ़े।
गाँवोंमें पहले लोग धोती पहनते और बदनपर एक गमछा या चादर डाल लेते थे। धूप, वर्षा, सर्दी आदि सहनेका इसीसे उनको अभ्यास था और इसीसे वे प्राय: नीरोग भी रहते थे। अब ग्रामवासी लोग भी पढ़-लिखकर वेष-भूषा सजाने लगे। गरमीकी मौसिममें भी पैरोंमें मोजे, पतलून या चूड़ीदार पाजामा, बदनपर तीन-चार कपड़े, कोट लंबी शेरवानी आदि आ गये हैं। इन कपड़ोंकी सिलाईमें सैकड़ों रुपये खर्च हो जाते हैं। बच्चोंको यूरोपियन ढंगकी घघरी, फ्रॉक, कोट आदि पहनाये जाते हैं। स्त्रियोंके फैशनका तो कोई ठिकाना ही नहीं। तब बताइये, खर्च कैसे नहीं बढ़ेगा? खर्च तो तब घटेगा, जब इतनी वस्तुओंका व्यवहार नहीं किया जायगा और इसके लिये—जिनकी साधारण लोग नकल करते हैं, उन बड़े लोगों, नेताओं, सरकारी अफसरों आदिका सादे भोजन और सादे पोशाकवाले होना आवश्यक है।
मुसलमानी जमानेमें पाजामा, अचकन, शेरवानी आदि हमारी पोशाकमें आये। अंग्रेजोंके संगसे पतलून, कोट, हैट आदि आये; परंतु अब स्वराज्य मिलनेपर भी हमारा यह विदेशी मोह नहीं छूटा है—यह खेदकी बात है। महात्मा गाँधी लंदनमें बादशाहसे नंगे बदन, नंगे पैर, छोटी-सी धोती पहने, चादर ओढ़े मिले थे। यदि आज हमारी सरकार यह घोषणा कर दे कि राष्ट्रिय पोशाक धोती और चद्दर है और यदि बड़े-बड़े मिनिस्टर, न्यायाधीश, जिलाधीश, विद्यालयों-महाविद्यालयोंके अधिपति, आचार्य, नेतागण, प्रमुख व्यापारीवर्ग इसी पोशाकमें अपने-अपने कार्यालयों, कचहरियों, विद्यालयों और दूकानोंपर उपस्थित होने लगें तो इनकी देखा-देखी बहुत शीघ्र जनता उसीके अनुसार धोती, चादरका व्यवहार करने लगे। कपड़ेका खर्च अपने-आप कम हो जाय। यह सच है कि मनुष्योंकी संख्या बढ़ी है; परंतु साथ ही उत्पादन भी तो बढ़ा है। ज्यादा अभाव तो हुआ है कल्पित अभावोंको बढ़ा लेनेसे—उच्चस्तरके जीवनके नामपर अधिकाधिक वस्तुओंके व्यर्थ व्यवहार और संग्रहसे!
पहले धार्मिक भावनासे नर-नारी व्रत-उपवासादि करते थे। उससे भी बहुत अन्न बच जाता था। साथ ही संयम तथा इन्द्रियनिग्रहका पाठ भी सीखते थे। अब तो धर्मका नाम लेना भी अपराध-सा हो चला है। खर्च घटाना चाहते हैं, पर जीवनको निरंकुश, उच्छृंखल, वासनाओंका दास, विलास और कल्पित अभावोंसे पूर्ण बना रहे हैं। विवाह आदिमें विभिन्न प्रकारके आडम्बर बढ़ रहे हैं; तब खर्च घटेगा कैसे? और खर्च न घटनेपर चोरी, डकैती, घूसखोरी, चोरबाजारी होगी ही। इन दोषोंको दूर करनेके लिये सर्वप्रथम तो आवश्यक है—ईश्वर, परलोक तथा धर्ममें विश्वास। जब एकान्तमें भी मनुष्य चोरी करना, दूसरेका पैसा लेना अधर्म समझेगा, तब आजकी तरह उसकी केवल कानूनके पंजेसे बचकर पाप करनेकी प्रवृत्ति नहीं होगी। तभी ये अनर्थ बंद होंगे। साथ ही कल्पित अभावों तथा उच्चस्तरके (खर्चीले) जीवनसे भी अपनेको दूर रखना पड़ेगा। ‘कामोपभोगपरायण’ मनुष्य तो अन्यायसे अर्थसंचय करेगा ही। जीवनमें जितने ही अभाव कम होंगे, जितनी ही आवश्यकताएँ थोड़ी होंगी, उतना ही जीवन निष्पाप रहेगा और उतनी ही सुख-शान्ति भी रहेगी।
समाजसे इस पापको दूर करना है तो समाजके प्रमुख पुरुषोंको, शासनाधिकारियोंको और नेताओंको अपना जीवन बदलना पड़ेगा। तभी यह पाप मिटेगा। परोपदेशसे तथा कानूनी कड़ाईसे कुछ नहीं होगा। भगवान्ने गीतामें कहा है—
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
श्रेष्ठ (समाजमें प्रमुख माने जानेवाला) व्यक्ति जो-जो आचरण करता है, साधारण लोग उसीका अनुकरण करते हैं, वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, जैसा आदर्श उपस्थित करता है, उसीके अनुसार लोग बर्तते हैं। शेष भगवत्कृपा।