किस काममें जल्दी करे और किसमें न करे

सादर सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला! आपने निर्णय करनेमें भी जल्दी की और फिर निर्णयके अनुसार काम करनेमें तो बहुत ही जल्दबाजी की। उस समय आपको अपनी भूल नहीं मालूम हो रही थी। इसीलिये आपने स्वस्थ अंगको सड़ा समझकर काट देनेकी तरह अपने आत्मीय स्वजनोंसे और विश्वस्त घरके लोगोंसे अनुचित बर्ताव किया और इसीसे आज आप पछता रहे हैं और दु:खी हैं। शास्त्रमें कहा है—

रोगे दर्पे च माने च द्रोहे पापे च कर्मणि।

अप्रिये चैव कर्तव्ये चिरकारी प्रशस्यते॥

बन्धूनां सुहृदां चैव भृत्यानां स्त्रीजनस्य च।

अव्यक्तेष्वपराधेषु चिरकारी प्रशस्यते॥

(स्कन्द०, कुमारिका० ६। १२५-१२६)

‘रोग (के समय खान-पान)-में, दर्प (घमंड)-में आकर, अभिमानमें, वैरके कार्यमें, पापमें और अप्रिय कर्तव्यमें देर करनेवाला, (खूब सोच-विचारकर धीरे-धीरे करनेवाला) प्रशंसनीय होता है। भाई-बन्धु, सुहृद्, नौकर और स्त्री—इनके अपराधका भलीभाँति पूरा पता लग जानेतक जल्दी न करनेवाला (देरसे काम करनेवाला) प्रशंसनीय है।’

हाँ, भजन, धर्मपालन, दान और सत्संग आदिमें जल्दी करनेवाला प्रशंसाका पात्र है। न मालूम फिर वैसी परिस्थिति (आयु, स्वस्थता, योग्यता, शक्ति आदि) हो या नहीं, वैसा मन रहे या नहीं, इसलिये इन कामोंको कलपर न छोड़कर आज ही अभी कर लेना चाहिये।

काल करै सो आज कर आज करै सो अब्ब।

पलमें परलै होयगी फेर करैगा कब्ब॥

स्कन्दपुराणके वचन हैं—

धर्मे शत्रौ शस्त्रहस्ते पात्रे च निकटस्थिते।

भये च साधुपूजायां चिरकारी न शस्यते॥

(कुमारिका० ६। १२९)

‘धर्मके कार्यमें, शस्त्र हाथमें लिये शत्रुके सामने आनेपर, दानके योग्य सत्पात्रके समीप आनेपर, किसी भयकी हालतमें और साधु-सेवामें देर करनेवाला प्रशंसनीय नहीं होता।’

हमलोगोंकी कुछ ऐसी बुरी आदत हो गयी है कि भजन, सत्संग, दान, तीर्थसेवन आदि सत्कार्योंको तो आगेपर टालते रहते हैं और संसारके ऐसे कार्य, जिनका परिणाम दु:खदायी होता है, प्रमाद और कामनावश जोशमें आकर बिना विचारे ही कर बैठते हैं। आपने भी ऐसा ही किया है, पर जो हो गया सो तो हो ही गया। वह भूल तो अब ‘भूल न होने’ की नहीं है। उसका सुधार कैसे हो, यह विचारना है। इसका उपाय है—‘जिनके प्रति आपने भूलसे दुर्व्यवहार किया है, अभिमान और हेंकड़ी छोड़कर नम्रतापूर्वक उनका ससम्मान प्रिय कार्य करना और सच्चे हृदयसे अपने कियेपर पश्चात्ताप करना।’ आपका पश्चात्ताप सच्चा होगा और सच्चे हृदयसे ही आप उनका प्रिय कार्य करना चाहेंगे तो कोई कारण नहीं कि उनका हृदय न पलटे और वे आपके साथ पुन: पूर्ववत् प्रेम न करने लगें। इसमें देर होना तो कई कारणोंसे सम्भव है; बहुत चिकने-चिपटे मैलके धुलनेमें देर हो सकती है, परंतु वह धुल जायगा अवश्य। अपना मन बदल गया—साफ हो गया तो अपने-आप ही व्यवहार-बर्तावमें परिवर्तन हो जायगा और उसका असर प्रतिपक्षीपर देर-सबेर होगा ही। देर भी प्राय: वहीं होती है, जहाँ अपना मन बदलनेके पहले उसका मन बदलनेकी बाट देखी जाती है, जो एक प्रकारका धोखा होता है। मन-परिवर्तनका असली स्वरूप तो यही है कि अपनी भूल प्रत्यक्ष हो जाय, मन उसे स्पष्टरूपसे स्वीकार कर ले, भूलके लिये पश्चात्ताप हो, जिसके प्रति भूल हुई है उससे स्पष्ट और सरलभावसे क्षमा-याचना की जाय—वह क्षमा न करे तो भी अपने मनमें उसके प्रति जरा भी असद्भाव न रहे; क्योंकि भूल अपनी ही थी और यथासाध्य उसके साथ सरल और सत्य सम्मानयुक्त विनीत प्रेमका व्यवहार किया जाय। आप उचित समझें और मनमें बल हो तो इस उपायको आजमाकर देखिये।