कुछ जाननेयोग्य बातें
प्रिय महोदय! सादर सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र यथासमय मिल गया था; उत्तरमें देर हो गयी, आशा है आप कोई विचार नहीं करेंगे। आपने बहुत लंबी प्रश्नावली भेजी है, उसके विषयमें मैं अपने विचार नीचे निवेदन करता हूँ—
१-इस बातको पूरा समझ लेना तो सृष्टितत्त्वको ही जान लेना है। पत्र-व्यवहारद्वारा इसे न तो हर कोई समझा सकता है, न हर कोई समझ सकता है। तथापि इतना तो समझ ही सकते हैं कि जब सब कुछका नाम ही संसार है और वह जबतक नहीं रचा गया था तब कुछ नहीं ही होना चाहिये। यह कुछ नहीं, ही सबका मूल कारण या प्रकृति है। जिस प्रकार सुषुप्ति या मूर्च्छामें किसी प्रकारका विशेष ज्ञान न रहनेसे वह मृत्युकी-सी अवस्था होती है तथा जाग्रत् और स्वप्न विशेष ज्ञानके कारण जीवन कहे जाते हैं, उसी प्रकार उस समय अव्यक्त प्रकृति निर्विशेषरूपमें होनेसे मृत्युसे व्याप्त कही गयी है। जब वह कार्योन्मुख हुई तब मानो सजीव होने लगी।
२-वेदोंके दो भाग हैं—‘संहिता’ और ‘ब्राह्मण’ या ‘आरण्यक’। आर्यसमाजी महानुभाव केवल संहिताभागको श्रुति मानते हैं और सनातनधर्मी दोनों भागोंको। श्री श्रीनारायण स्वामीजी आर्यसमाजी हैं। इसीसे उन्होंने ब्राह्मण-उपनिषदादिको मुख्य प्रमाण नहीं माना है। उपनिषदोंमें ईश और मुण्डकके सिवा और सब प्राय: ब्राह्मण और आरण्यकोंसे ही लिये गये हैं। अत: आर्यसमाजी सज्जन उनके संहितानुकूल अंशको ही प्रमाण मानते हैं।
३-द्वैतवादी ईश्वरको विभु और जीवको अणु मानते हैं। दोनों चेतन हैं, किंतु जीव अल्पज्ञ और अल्पशक्ति है तथा ईश्वर सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान्। ईश्वर एक हैं और जीव अनन्त हैं। ईश्वर सूर्यप्रकाशके समान सर्वव्यापक हैं और जीव दीपज्योतिके समान संकुचित हैं। जिस प्रकार सूर्य-प्रकाश और दीपककी ज्योति एक स्थानपर रह सकते हैं, उसी प्रकार जीव और ईश्वर भी एक ही अन्त:करणमें रह सकते हैं। (द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया)तथा जैसे दीवारोंसे घिरे हुए घरमें सूर्य प्रकाशकी सत्ता रहनेपर भी प्रधानता दीपकके प्रकाशकी ही रहती है, किंतु दीवार गिरा दी जाय तो दीपप्रकाश सूर्यप्रकाशमें लीन हो जाता है, उसी प्रकार जबतक अज्ञानवश देहादिका अभिमान बना हुआ है, तबतक अन्त:करणमें अन्तर्यामीरूपसे भगवान्की सत्ता रहते हुए भी जीवभावकी ही प्रधानता रहती है, किंतु जब ज्ञानोदय होनेपर देहाभिमान गलित हो जाता है, तब जीवभाव भी भगवद्भावमें विलीन हो जाता है। कुछ लोग जीवको अनन्त माननेके साथ ही विभु भी मानते हैं, जैसे आकाशमें एक ही समय अनन्त शब्द सर्वत्र व्याप्त हैं।
४-जीव ईश्वरका अंश उसी प्रकार है, जैसे अग्निका अंश चिनगारी अथवा जलका अंश सीकर है। ऊपर जो जीवको दीप-ज्योतिके समान बताया है, वह ज्योति भी वास्तवमें व्यापक तेजस्तत्त्वका अंश ही है।
५-‘सन्ध्या’ शब्दसे यहाँ नित्यकर्मान्तर्गत सन्ध्योपासन अभिप्रेत है। मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र स्वयं साक्षात् भगवान् होते हुए भी आचरण तो आदर्श मनुष्यके समान ही करते थे। अत: उनका समयपर सन्ध्योपासन करना उचित ही है। उस समय वे भी हमारी तरह श्रीविष्णु, रुद्र, ब्रह्मादिका ध्यान अथवा स्वरूपचिन्तन करते थे।
६-संख्यासे जो जप किया जाता है, वह अनुष्ठानरूप होता है। उसका चित्तशुद्धिके अतिरिक्त और भी विशेष फल हो सकता है। इसके सिवा संख्यासे तो निश्चित जप हो जाता है, बिना संख्याके हर समय जप करनेसे कभी होता है, कभी नहीं होता। अत: जितना अवकाश मिल सके, उसके अनुसार कुछ जप तो स्नानादिसे शुद्ध होकर आसनपर बैठकर नियमित संख्यामें करना ही चाहिये। शेष समय जो मन-ही-मन संख्याहीन जप किया जाता है, उसे नामस्मरण कहते हैं। वह भी बहुत उपयोगी है और अवश्य करना चाहिये।
७-‘शिव’ का नाम शिव क्यों है—यह तो शिव ही जानें। मैं इस विषयमें क्या लिखूँ? हाँ, शिव कल्याणका वाचक है। शिव कल्याणमय हैं। इसलिये ‘शिव’ नाम हो सकता है।
८-मलादि त्याग करते समय भगवत्स्मरण रखना तो ठीक है, किंतु यदि नित्यपाठकी दृष्टिसे समयका सदुपयोग करनेके लिये गीतापाठ किया जायगा तो वह अनुचित होगा; क्योंकि पाठ एक नियमित तथा पवित्र कर्म है, उसे विधिवत् ही करना चाहिये।
९-यदि बिछौनेको बार-बार धूप या हवा लगाते रहेंगे तो खटमल नहीं पड़ेगे। खटमल पड़ जानेपर भी धूपमें डालने या झाड़नेसे निकल जायँगे। उन्हें स्वयं मारना नहीं चाहिये।
१०-चींटियोंद्वारा पकड़े हुए कीड़ेको छुड़ा देना ही उचित है; क्योंकि उस समय प्रत्यक्ष रूपसे तो कीड़ेको ही अधिक कष्ट है, चींटियाँ दूसरी चीज खाकर रह सकती हैं।
११-कब्जियतमें शाक उपयोगी है—इसका आशय तो भाजी या तरकारीसे ही है। पंचसकार चूर्णमें जो पाँच चीजें—सौंफ, सनाय, शिवा, सोंठ और सैंधव लिखी हैं, वे ही पड़ती हैं; किंतु यह चूर्ण नित्य नहीं खाना चाहिये, जब विशेष कब्जियत हो तभी खाना चाहिये। भोजनके बाद तुरंत शौच जाना ठीक नहीं है। यदि आप भोजनके पहले शौच हो आया करें तो सम्भव है आपकी यह आदत छूट जाय। कब्जियतके कारण अनेक होते हैं, मालूम नहीं आपको क्यों रहती है। वस्तुओंकी अनुकूलता-प्रतिकूलताका निर्णय आपको अपने अनुभवसे कर लेना चाहिये; सब चीजें सबके लिये समान नहीं रहतीं।
१२-जीवोंकी हिंसा जान-बूझकर कभी नहीं करनी चाहिये, यदि अपना स्वाभाविक कर्म करते हुए अनिवार्य रूपसे किसी जीवको कष्ट पहुँचता हो तो उसमें लाचारी है। खेतीमें आप तो हल जोतते हैं; उसके कारण यदि कोई जीव मर जाय तो आप क्या कर सकते हैं। उसी प्रकार अनाजमें घुन आदि लग जाय और आपको उसे खाना है तो धूपमें डालना ही होगा। इससे कुछ मरेंगे, कुछ कहीं अन्यत्र अपना स्थान ढूँढ़ लेंगे। आप हिंसाके लिये तो हिंसा नहीं करते, फिर भी जहाँतक हो, जीवोंको किसी प्रकारका कष्ट न पहुँचे, इस दृष्टिसे आप जितना त्याग कर सकें उतना अवश्य करना ही चाहिये।
१३-चोरको पकड़ लेनेपर छोड़ देना साधुता है और सरकारके हवाले कर देना नीति है। आपमें यदि वस्तुओंका राग नहीं है तो छोड़ देना अच्छा है और यदि लोकसंग्रहकी भावना अधिक है तो उसे दण्ड दिलाना अच्छा है। साधन-साम्राज्यमें तो लोकसंग्रहीसे साधुका दर्जा ऊँचा है ही।
१४-ऐसी अवस्थामें माता-पिता या चोरका सुख न देखकर हित देखना होगा। यदि आपके सच बोलनेसे उनका हित होता हो, भले ही बाह्य दृष्टिसे उन्हें हानि उठानी पड़े, तो आपको सच्ची बात कह देनी चाहिये। यदि हिताहितका कोई प्रश्न न हो तथा मौन रहनेसे काम चल जाय तो चुप हो जाना चाहिये और यदि सच्ची बात कहनेसे उनका अहित होता हो तो संयमित तथा विवेकसम्मत मिथ्याभाषणके द्वारा अपना अहित करके भी उनका निश्चित हित करना चाहिये। ऐसा अवसर प्राय: आता नहीं, केवल एक पक्षान्तर प्रदर्शित करनेकी दृष्टिसे ही ऐसा कह दिया है।
१५-पवित्रता-अपवित्रताका विचार सबका समान नहीं होता। किसी-किसी देशमें तो बायें हाथका स्पर्श ही अपवित्र माना जाता है। चौकेका नियम माननेवाले लोग भोजन करनेवाले मनुष्यकी स्पर्श की हुई वस्तुको अपवित्र ही मानते हैं, भले ही वह दूसरे हाथसे स्पर्श करे; किंतु जिनमें ऐसा विचार नहीं है, वे लोग आपसके भोजनमें बायें हाथद्वारा परोसी हुई चीज भी खा लेते हैं। यह बात आचारदृष्टिसे तो विरुद्ध ही है, किंतु व्यवहारमें होता ऐसा भी है।
१६-स्त्रीको समझाने और स्नेहबुद्धिसे डाँटने-डपटनेके सिवा और क्या दण्ड दिया जा सकता है। इससे आगे तो यही है कि आप उसकी कोई बुरी आदत छुड़ानेके लिये अनशन या इसी प्रकारका कोई दूसरा तप करें, जिससे आपकी सहानुभूतिवश वह पश्चात्ताप करे और फिर वैसा न करे। स्त्रीको पीटना या कष्ट देना तो पतिके लिये सर्वथा अनुचित है और न इससे उसका सुधार हो सकता है। उसके सुधारका उपाय तो सच्चा प्रेम या स्वयं तपस्या करना है।
१७-यदि शरीरमें रोग नहीं है तथा भगवद्विधानमें पूर्ण विश्वास है तो शरीरकी ओषधि न करनेमें भी आपत्ति नहीं है, किंतु यदि रोगके कारण भजन एवं कर्तव्यपालनमें बाधा पहुँचती है तो अवश्य ओषधि करनी चाहिये। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार चित्त शान्त रहे और भगवन्निष्ठा बढ़े, वैसा ही करना चाहिये। असलमें न तो औषधसेवन करनेमें राग होना चाहिये और न न करनेमें ही। जैसा जहाँ कर्तव्य हो वैसा करना चाहिये।
१८-पुस्तकोंको समय-समयपर धूप दिखाते रहनेसे तथा उनकी उलट-पलट करते रहनेसे कीड़ोंसे रक्षा हो सकती है।
१९-‘ॐ रां रामाय नम:’—इसमें ‘ॐ’ और ‘रां’ के अनुस्वारका उच्चारण मकारके समान करना अधिक उपयुक्त है।
२०-‘धातु’ शब्दसे वहाँ वीर्य ही अभिप्रेत है। मलोत्सर्गमें जोर लगानेसे उसी समय मूत्रेन्द्रियद्वारा वीर्यपात हो जाता है। कब्जियत दूर करनेके लिये तीन लीटर जल पीना आवश्यक है, यह ठीक है, किंतु जलके विषयमें सबसे अच्छा नियम यही है कि जब प्यास लगे तभी पी लिया जाय। अधिक जल पीनेके तो पक्षमें भी विद्वानोंकी सम्मतियाँ हैं और विपक्षमें भी।
२१-यह प्रतापभानुने जो झूठ बोला है वह किसी स्वार्थ या लोभदृष्टिसे नहीं, बल्कि नीतिकी दृष्टिसे अपनेको छिपाया है। राजा या पुलिसके लोग दूसरोंकी वास्तविकताको जाननेके लिये इस प्रकार मिथ्याभाषण कर सकते हैं; क्योंकि इस मिथ्याभाषणमें कोई स्वार्थसिद्धि या राग-द्वेषकी भावना नहीं होती, केवल वास्तविकताका निश्चय करना ही होता है। नाटकका पात्र राजा न होनेपर भी जैसे अपनेको राजा कह देता है, उसी प्रकार यह प्रतापभानुका असत्य भाषण है। तथापि सत्यको ही परमधर्म माननेवालेके लिये तो यह दोष ही है।
२२-‘भवितव्यता’ जो कुछ होनेवाला हो, उसे कहते हैं। दैव या प्रारब्ध भी उसीको कहा जा सकता है, किंतु इनमें कुछ अन्तर अवश्य है। ‘प्रारब्ध’ उन कर्मोंको कहते हैं, जो फल देनेको उन्मुख हो गये हैं, उनका फल सुख या दु:खके रूपमें प्राप्त होता है। उन सुख-दु:खभोगके लिये जो कर्मोंको प्रवृत्त करता है, उसका नाम ‘दैव’ है तथा वह दैव भोगप्राप्तिके लिये जो परिस्थिति उपस्थित करता है, उसे ‘भवितव्यता’ कहते हैं। प्रतापभानुके सामने यह परिस्थिति किस कर्मका फल भोगनेके लिये आयी, यह मैं कैसे बता सकता हूँ। उसके प्राक्तन सम्पूर्ण कर्मोंका सम्बन्ध मुझे मालूम थोड़े ही है।
२३-सुमेरु पर्वत दिव्यलोककी चीज है। इस लोकमें उसका कोई अस्तित्व नहीं है।
२४-आजकलका भूगोल केवल स्थूलदृष्टिके अनुभवपर अवलम्बित है और पुराणोंका भूगोल योगदृष्टिसे अनुभव किया हुआ है। जिस प्रकार जलमें रहनेवाले जीव हमारे नगरादिकी कल्पना भी नहीं कर सकते, उसी प्रकार केवल स्थूलदृष्टिसे उस भूगोलका ज्ञान नहीं हो सकता। योगदर्शनमें कहा गया है—सूर्यमें संयम करनेसे भुवनोंका ज्ञान होता है। अत: यह भुवनकोशका प्रत्यक्ष योगदृष्टिका ही विषय है।
२५-रामचरितमानसके प्राचीन विश्रामस्थान महात्माओंके स्वानुभवपर अवलम्बित हैं, उनका विशेष फल होता है। अत: पुण्य-पाठकी दृष्टिसे तो उन्हें ही रखना उचित है। यों निष्कामभावसे किसी भी प्रकार पाठ कर सकते हैं।
२६-बद्धकोष्ठताकी बीमारी जल्दी जानेवाली नहीं होती। इसके लिये मुझे कोई रामबाण उपाय भी मालूम नहीं है। यदि आप अनुकूल आहार, चोकर मिले आटेकी रोटीका सेवन, आसन, व्यायाम और प्राकृत चिकित्सा आदि बहुत दिनोंतक करें तो सम्भव है कुछ लाभ हो जाय। शौच-शुद्धिके लिये उष:पान अर्थात् सबेरे उठते ही जल पीना बहुत उपयोगी है। इसके सिवा जब विशेषरूपसे कब्ज हो, तब उपवास करना या एनिमा लेना चाहिये। नौली और गणेश-क्रियासे भी शौच-शुद्धिमें सहायता मिलेगी। रात्रिको इसब्गोलकी भूसी लेना भी अच्छा है। भोजनके समय यदि पेट भारी हो तो पहले शौच हो आइये, तब खाइये। सोनेके समय गुड़ और हरीतकीका या त्रिफलाका प्रयोग भी अच्छा है।
२७-गायत्रीमन्त्रका अर्थ इस प्रकार है—ॐ भू: भुव: स्व:— इनमें ‘ॐ’ परमात्माका प्रतीक या शब्दमयी मूर्ति है। भू: सत्, भुव: चित् और स्व: आनन्दके द्योतक हैं।
इसके आगे गायत्रीमन्त्र आरम्भ होता है। ये प्रणव और व्याहृति उसके साथ अलगसे जोड़ दिये जाते हैं। इनके सहित ही गायत्री जपनेका नियम है—तत् (उस) सवितुर्देवस्य (सविता अर्थात् सृष्टि उत्पन्न करनेवाले देवताके) वरेण्यम् (प्रशंसनीय) भर्ग:(तेजको)धीमहि (ध्यान करते हैं) य: (जो) न: (हमारी) धिय:(बुद्धियोंको) प्रचोदयात् (प्रेरित करता है)।
इन सबका भावार्थ यह है कि ‘ॐ’ जिसका प्रतीक है और जो सच्चिदानन्दस्वरूप है तथा जो हमारी बुद्धियोंको अन्तर्यामीरूपसे प्रेरित करता है, उस जगदुत्पादक देवके वरणीय (आदरणीय) तेजका हम ध्यान करते हैं।
२८-डॉक्टरी दवाओंमें प्राय: मद्य-मांसादि अपवित्र वस्तुएँ सम्मिलित रहती हैं, इसलिये साधकोंको उनका सेवन नहीं करना चाहिये। इसके सिवा वे भारतीयोंकी प्रकृतिके उतनी अनुकूल भी नहीं हैं।
२९-‘क्षोभ’ का अर्थ है उत्तेजना। ‘समीचीन’ ठीक या सम्यक्को कहते हैं। ‘तात’ एक प्रियतावाचक सम्बोधन है, जिसका प्रयोग पूर्वकालमें अपनेसे बड़ोंके लिये भी होता था और छोटोंके लिये भी; किंतु अब यह प्रचलित नहीं है। ‘नैर्घृण्य’ निर्दयताको कहते हैं।
३०-कठपुतली क्रियासे नहीं बना जाता, भावसे बनना होता है। आपको मन मिला है यह ठीक है, परंतु वह मन किसने दिया है और उसका प्रेरक कौन है? यदि यह भाव दृढ़ हो जाय कि वह तो प्रभुकी देन है और वे ही उसके प्रेरक हैं तो अपने कर्तापनका अभिमान गल जायगा। कर्तृत्वाभिमानके गलनेसे भोक्तृत्व भी नहीं रहेगा और भोक्तृत्व न रहनेसे स्वार्थ एवं भोगेच्छा भी नहीं रहेगी। इस प्रकार स्वार्थ एवं भोगेच्छाके शान्त होनेपर तो स्वत: ही मनका शमन हो जायगा और कोई भी शास्त्रविपरीत आचरण नहीं होगा। अत: कठपुतली बननेमें किसी प्रकारकी मनमुखी प्रवृत्ति नहीं हो सकती। मनमुखी प्रवृत्ति तो तभी होती है जब हम या तो मनमें ही अपनेको आरोपित कर देते हैं या मनको अपना यन्त्र मानकर स्वयं कर्ता-भोक्ता बने रहते हैं।
३१-वैकुण्ठादि भगवद्धाम भगवत्-लीलाके नित्य दिव्य स्थान हैं। वहाँ जो अभिमान एवं क्रोधादि आते हैं, वे भगवदिच्छासे केवल भगवत्-लीलाकी पूर्तिके लिये आते हैं। भगवान् लोककल्याणके लिये सभी प्रकारके भावोंको स्वीकार करते हैं; क्योंकि किसी-न-किसी प्रयोजनसे उन्होंने ही तो इन्हें उत्पन्न किया है। यदि सनकादिके शापकी लीला न होती तो हमें भगवान्के अवतारचरित्र पढ़ने-सुननेको कैसे मिलते। अत: संसारी जीवोंको उद्धारकी सामग्री समर्पित करनेके उद्देश्यसे उन्हींकी प्रेरणासे ऐसी लीलाएँ होती हैं।
३२-इन श्लोकोंकी जैसी व्याख्या ‘गीतातत्त्वांक’ में की गयी है, साधारणतया वह समझमें आनेयोग्य ही है। उससे अधिक तभी समझाया जा सकता है, जब यह मालूम हो कि आपकी समझमें उस व्याख्याकी क्या बात नहीं आयी। ऐसा विचार मिलनेपर ही ठीक हो सकता है। आप अपने आसपास रहनेवाले किसी विद्वान्से इसे समझनेका प्रयत्न करें।
३३-सृष्टिचक्रका कोई ठीक निर्णय नहीं किया जा सकता कि सर्वदा ऐसा ही होता है। यदि इस शंकाका यह समाधान किया जाय कि कल्पके प्रत्येक त्रेतायुगमें अवतार होता है तो ऐसी शंका भी की जा सकती है कि जैसे एक बार सत्ययुगके आरम्भमें ब्रह्माजीने सृष्टिरचना की थी, उसी प्रकार क्या प्रत्येक सत्ययुगके आरम्भमें सृष्टिरचना होती है? अत: ऐसा कोई नियम नहीं है कि युगपरिवर्तनके चक्रमें प्रत्येक चतुर्युगीका प्रवाह एक-जैसा ही चले। तात्पर्य केवल इतना ही है कि रामावतार तथा अन्यान्य प्रधान घटनाएँ प्रत्येक कल्पमें होती रहती हैं। वे किसी निश्चित त्रेतायुगमें ही होती हों ऐसा नियम नहीं है। गत त्रेतामें श्रीरामावतार हुआ था—यह तो ठीक ही है। शेष भगवत्कृपा।