कुछ प्रश्नोत्तर

सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। आपके प्रश्नोंमें बहुत-से ऐसे हैं जो निरर्थक हैं। यों व्यर्थ प्रश्न करके आपको न तो अपना समय नष्ट करना चाहिये और न दूसरोंका ही। असलमें मनुष्यका भवबन्धनसे छुटकारा तो श्रीभगवान‍्के भजनसे ही होता है। भजनके बिना सारी बातें व्यर्थ हैं। अस्तु,आपके प्रश्नोंमेंसे कुछके उत्तर ये हैं—

(१) श्रीराधाजीको मैं भगवान् श्रीकृष्णसे नित्य अभिन्न मानता हूँ। वे भगवान‍्की स्वरूपभूता आनन्दशक्ति हैं। आप अपने श्रद्धानुसार मान सकते हैं; परंतु दोषबुद्धि नहीं करनी चाहिये। दोषबुद्धि करनेपर तो अकल्याण ही होगा। श्रीकृष्णके साथ उनका विवाह भी हुआ था। ब्रह्मवैवर्तपुराण इसका साक्षी है।

(२) भगवती श्रीपार्वतीजी भगवान् शंकरकी नित्य सहचारिणी हैं। वे पहले सतीरूपमें थीं। किसी भी रूपमें हों, वे नित्य हैं और भगवान् श्रीशंकरसे उनका अभिन्न सम्बन्ध है।

(३) श्रीभगवतीके ५२ पीठोंका वर्णन ‘कल्याण’ के ‘शक्ति-अंक’ में देखिये।

(४) गायत्रीमन्त्रका अर्थ है—‘इस सबकी उत्पत्ति करनेवाले परमात्माके उस श्रेष्ठ तेजका हम चिन्तन करते हैं, जो हमारी बुद्धियोंको सत्कर्मोंकी ओर प्रेरित करता है।’

(५) भक्त कभी मूर्तिपूजन नहीं करता, वह मूर्तिके व्याजसे अपने इष्टदेव श्रीभगवान‍्का ही पूजन करता है। उसके लिये मूर्ति, मूर्ति नहीं है, साक्षात् सच्चिदानन्दघन भगवान् हैं। यही अर्चावतार है। ऐसे भक्तके साथ मूर्तिमें अवतरित भगवान् हँसते—बोलते हैं, उसका निवेदन किया हुआ प्रसाद भोग लगाते हैं। उसको उपदेश करते हैं। मूर्तिकी तो बात ही क्या, सच्ची निष्ठा और दृढ़ विश्वासके बलपर प्रह्लादने भगवान‍्को खंभेसे प्रकट कर लिया था।

‘प्रेम बढ़ॺो प्रहलादहिको

जिन पाहनतें परमेसुर काढ़ॺो।’

भक्तमालकी कथाएँ सच्ची ही हैं। आज भी विश्वासी निष्ठावान् और प्रेमी भक्त वैसा अनुभव कर सकते हैं, करते हैं। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं करना चाहिये।

(६) ब्रह्मचर्यकी रक्षाके लिये सात्त्विक वातावरणमें रहना और इन्द्रिय-संयम रखना परम आवश्यक है। मन निरन्तर सात्त्विक कार्योंमें लगा रहेगा तो कामचिन्तन होगा ही नहीं। फिर ब्रह्मचर्यकी रक्षा अपने-आप हो जायगी।