कुछ प्रश्नोत्तर

प्रिय महोदय! सादर सप्रेम हरिस्मरण। आपका ३० मईका कृपापत्र यथासमय मिल गया था। उत्तरमें कुछ देर हो गयी, कृपया क्षमा करें।

आपने गीताप्रेसके प्रति जो सद्भाव प्रकट किया है, उसके लिये धन्यवाद। इससे जो कुछ कार्य हो रहा है, वह केवल उन सर्वकर्ता ईश्वरकी ही लीला है; सारे संसारके प्राणियोंको वे ही अपने संकल्पमात्रसे नचा रहे हैं। लोग व्यर्थ ही अपने द्वारा कोई महत्कार्य होनेका अभिमान करते हैं। हम तो केवल उन्हींके यन्त्र हैं।

आपने कुछ प्रश्न पूछनेकी कृपा की है, उनके विषयमें मेरे जैसे विचार हैं, नीचे निवेदन करता हूँ।

(१) अविनाशी जीव ईश्वरका अंश है, इसमें संदेह नहीं। परंतु जैसे आकाशस्थ निर्मल मेघका अंशभूत जल पृथ्वीपर गिरनेसे मलिन हो जाता है, उसी प्रकार देहासक्तिमें फँसनेसे जीव भी मलिन हो जाता है। इस मलिनताके कारण उसे मोह होता है और मोहसे दुष्कर्म तथा दुष्कर्मोंसे नरकादि भोग होता है। यदि किसी प्रकार सत्संग और भगवद्भजनके द्वारा मोहमुक्त होकर वह देहासक्तिसे छूट जाय तो अवश्य देहपातके पश्चात् परमात्माको ही प्राप्त हो जायगा।

(२) भगवती सीताजी तो रावणको इच्छामात्रसे नष्ट कर सकती थीं। रावण ही क्या, उनके संकल्पसे तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भी एक क्षणमें भस्म हो सकता है, किंतु भगवान् और उनकी अभिन्न मायाशक्ति भगवती सर्वसमर्थ होते हुए भी भक्तजनोंको लीला-सुख देनेके लिये अलौकिक माधुर्यपूर्ण लीलाएँ किया करते हैं। उन लीलाओंमें वे सर्वसमर्थ होते हुए भी संयोगवश असमर्थकी तरह और सर्वथा मोहशून्य होते हुए भी मोहयुक्तोंकी तरह व्यवहार करते हैं। इसी तरहकी यह माता जानकीजीकी लीला थी। ‘अद्‍भुत रामायण’ में तो उनके द्वारा एक सहस्रमुखके रावणका वध वर्णन भी किया गया है। अत: उनका रावणकी कैदमें रहना केवल लीलामात्र था।

(३) महाभारतमें जहाँ द्रौपदीके विवाहका प्रसंग है, वहीं उसके पाँच पति होनेके कारण भी दिखाये गये हैं। आप उस प्रसंगको देखनेकी कृपा करें। पाण्डव साधारण जीव नहीं थे। वे पाँचों पाँच इन्द्रोंके अवतार थे और द्रौपदी उनकी शक्ति थीं। अत: वे दिव्य जीव थे और उनका यह नित्य सम्बन्ध था। इसलिये इसमें मानवी जगत‍्का नियम लागू नहीं हो सकता। पाप-पुण्यका नियम केवल मनुष्योंके लिये है। देवताओंपर यह नियम लागू नहीं है।

(४) काकभुशुण्डिजीकी कथा जैसी श्रीतुलसीदासजीने लिखी है, उसे मैं पूर्ण सत्य मानता हूँ। वाल्मीकीय रामायणमें इसका कोई उल्लेख नहीं है; परंतु यह कोई नियम नहीं है कि जो बात वाल्मीकीय रामायणमें न हो, वह सत्य ही नहीं हो सकती। गोस्वामीजी क्या कोई सामान्य पुरुष थे? इतने बड़े महापुरुष क्या कोई झूठी बात लिख सकते हैं? काकभुशुण्डिजीके इसी प्रकारके आश्रम और रहन-सहनका वर्णन श्रीवाल्मीकिजीद्वारा रचित योगवासिष्ठ महारामायणके निर्वाण-प्रकरणमें है।

(५) भगवती जगदम्बा हैं, इसमें सन्देह नहीं; परंतु उनके जो पुत्र जैसा खाते-पीते हैं, उसी प्रकारके खान-पानसे उनका पूजन करेंगे; अत: जो लोग मद्य-मांसका सेवन करनेवाले हैं, वे बलि-प्रदानसे उनका पूजन करते हैं; परंतु ऐसा करना अनिवार्य नहीं है। जो मांस-भक्षण नहीं करते, उन्हें मांसबलि देनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। वे पूर्णतया हविष्यान्नद्वारा उन्हें भोग समर्पित कर सकते हैं। शास्त्रदृष्टिसे उनकी यह पूजा ही श्रेष्ठ भी मानी गयी है। मांस-बलिदानका तो सर्वथा त्याग ही करना चाहिये।

(६) प्रश्न (३) के उत्तरमें लिखा गया है कि देवताओंको पाप-पुण्य नहीं लगता। अत: सूर्यके द्वारा कुमारावस्थामें पुत्र प्राप्त होनेसे कुन्तीको पाप नहीं लग सकता। यहाँतक कि इससे उनका कौमार भी भंग नहीं हुआ।

(७) जो बात प्रश्न (६) के उत्तरमें लिखी गयी है, वही यहाँ समझनी चाहिये। जब देवताओंको ही पाप-पुण्य नहीं लगता, तब स्वयं विष्णुभगवान् पर उनका अधिकार कैसे हो सकता है। विष्णु तो सबके प्रेरक और आत्मा हैं। पाप-पुण्यके प्रेरक और आत्मा भी तो वे ही हैं। फिर उनपर उनका क्या प्रभाव होगा।

(८) विभीषण रावणकी दृष्टिमें राजद्रोही अवश्य थे, किंतु इस अपराधका दण्ड तो राजा ही दे सकता है। जब राजा ही अपने सारे परिवार और दरबारियोंसहित मारा गया, तब उन्हें दण्ड कौन देता। वर्तमान युद्धमें भी जो लोग शत्रु-पक्षमें उत्पन्न होनेपर भी मित्र-पक्षमें आ गये, वे पारितोषिकके ही भागी समझे गये। यदि शत्रुकी विजय होती तो वे राजद्रोही और दण्डके भागी अवश्य होते। फिर विभीषण तो भगवान‍्की शरणमें आये थे। भगवत्-शरणके लिये तो माता-पिता-भाई किसीको भी त्यागना पाप नहीं माना जाता। अत: धर्मनीतिसे तो वे किसी प्रकार दण्डके अधिकारी नहीं कहे जा सकते।

(९) श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान् हैं। वे सबके आत्मा हैं, सबके पति हैं। वे सहस्रों सुन्दरियोंके स्वामी होकर भी सर्वथा अलिप्त हैं। उनका अनुकरण मनुष्य कैसे कर सकते हैं? यों प्राचीन और वर्तमान राजा लोग ५—७ स्त्रियाँ तो रखते ही हैं और यह समाजमें विशेष निन्दनीय भी नहीं माना जाता; परंतु भगवच्चरित्रके साथ इसका कोई सामंजस्य करना तो दु:साहस ही है।

(१०) भगवान् उन्हें कहते हैं, जिनमें ऐश्वर्य, यश, धर्म, ज्ञान, वैराग्य और श्री—ये छ: विभूतियाँ पूर्णरूपसे हों। संसारमें आजतक एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं हुआ, जिसमें इनमेंसे एक भी विभूति पूर्णरूपसे प्रकट हुई हो। फिर आजकलके श्रेष्ठ पुरुषोंको भगवान् कैसे कह सकते हैं?

(११) जिससे मनुष्यको अभ्युदय (लौकिक उन्नति) और नि:श्रेयस (मोक्ष) दोनोंकी प्राप्ति हो, उसे ‘धर्म’ कहते हैं और जो लौकिक उन्नति तथा कल्याणका बाधक हो—इस लोकमें अपयश एवं परलोकमें नरककी प्राप्ति करानेवाला हो, वह ‘पाप’ कहा जाता है।

(१२) सीताजीका विषाद उनकी लीलामात्र है। श्रीरामजीकी दिव्य अँगूठीकी दिव्यता उनकी आँखें परख सकती थीं। इसीलिये उन्होंने ऐसा निश्चय किया कि मायासे ऐसी अँगूठी नहीं बनायी जा सकती। इसमें शंकाकी तो कोई बात नहीं है।

(१३) भूत-प्रेत होते हैं—ऐसा शास्त्रीय सिद्धान्त भी है। मुझे भी इसमें अविश्वास नहीं है। शेष भगवत्कृपा।