कुसंगका अवश्यम्भावी फल
सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपने लिखा कि ‘बीचमें मेरे विचार और आचरण बहुत अच्छे हो गये थे। भगवान्का भजन भी होता था तथा दैवीसम्पत्तिके गुण—सत्य, अहिंसा, दया, प्रेम आदि भी पर्याप्त मात्रामें थे। मैंने समझ लिया था कि मेरे काम-क्रोधादि दुर्गुण नाश हो गये हैं और भजनमें मन लग गया है; परंतु इधर व्यापारमें विशेषरूपसे लगनेपर विचार और आचरण बिगड़ गये, भजन भी छूट गया तथा सत्य, अहिंसा, दया आदि गुण भी नहीं रहे। धन कमाया था, वह भी प्राय: चला गया; इस समय चित्तमें बड़ी अशान्ति है। शोक तथा चिन्तामें ही दिन बीतते हैं और आसुरी दुर्गुण बढ़ते जा रहे हैं।’ आपका यह लिखना बहुत ठीक है। बीचमें आप अच्छे संगमें थे, भजन भी होता था; उसका असर था। संगका असर होता ही है। जैसा संग होता है, मनुष्य वैसा ही बन जाता है। अच्छे संगके कारण—जैसे अच्छे राजाके राज्यमें चोर-डाकू छिप जाया करते हैं, वैसे ही आपके दुर्गुण छिप गये थे। वे मरे नहीं थे। मर गये होते तो कलुषित और असत्यपूर्ण व्यापारमें धनके लोभसे आपकी प्रवृत्ति ही क्यों होती। कुछ भी हो, धन कमानेके लिये आपने व्यापारक्षेत्रमें विशेषरूपसे प्रवेश किया। आजकल वह क्षेत्र प्राय: अत्यन्त दूषित है। आप रात-दिन उसी वातावरणमें रहे, वैसे ही विषयी मनुष्योंका संग हुआ। परिणाममें आपके वे दुर्गुण सुअवसर पाकर पुन: प्रबुद्ध हो गये और आज प्रबल रूपसे सामने आ रहे हैं। विषयासक्तिका परिणाम शोक-चिन्ता होता ही है। उसीसे आप ग्रस्त हो रहे हैं। यह जो कुछ हुआ है, ठीक ही हुआ है। ऐसा ही हुआ करता है। श्रीमद्भागवतमें कहा है—
यद्यसद्भि: पथि पुन: शिश्नोदरकृतोद्यमै:।
आस्थितो रमते जन्तुस्तमो विशति पूर्ववत्॥
सत्यं शौचं दया मौनं बुद्धि: श्रीर्ह्रीर्यश: क्षमा।
शमो दमो भगश्चेति यत्सङ्गाद्याति संक्षयम्॥
(३।३१।३२-३३)
‘अच्छे मार्गपर चलता हुआ मनुष्य यदि किन्हीं शिश्नोदरपरायण विषयी पुरुषोंके संगमें आ जाता है और उनमें विश्वास करके उन्हींके पीछे-पीछे चलने लगता है तो वह पहलेके समान ही पुन: पतनावस्थामें जा पड़ता है। उन विषयी पुरुषोंके संगसे इसके सत्य (सत्य-भाषण, सत्य-व्यवहार, सत्य-आचरण), शौच (बाहर-भीतरकी पवित्रता), दया (दु:खियों-दीनोंके प्रति सक्रिय करुणभाव),वाणीका संयम, बुद्धि (विचारशक्ति), धन-सम्पत्ति, लज्जा (बुरे कामोंमें होनेवाला संकोच), यश, क्षमा, मन तथा इन्द्रियोंका संयम एवं ऐश्वर्य आदि सभी सद्गुण नष्ट हो जाते हैं।’
यह कुसंगका अनिवार्य परिणाम है। इसीसे श्रीरामायणमें कहा गया है—
बरु भल बास नरक कर ताता।
दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥
‘नरकमें निवास करना कहीं अच्छा। नरककी यातनाएँ भोगनी अच्छी। पर विधाता दुष्ट-संग न दें।’
मनुष्यको पता नहीं लगता, पर दुष्ट-संगसे उसके विचार और कर्म सर्वथा बदल जाते हैं और फलत: वह असत् विचारों एवं दुर्गुणों तथा दु:खोंकी खानि बन जाता है। आप यदि शान्ति चाहते हैं, सुख चाहते हैं तो विषयोंकी ओरसे मनको हटाकर तुरंत भगवान्की ओर जीवनको मोड़िये। पुन: अच्छे संगकी प्राप्तिका प्रयास कीजिये। साथ ही भगवान्का भजन—उनके पावन नामका जप कीजिये। आपकी इच्छा सच्ची होगी तो भगवान् अवश्य आपकी सहायता करेंगे। सत्संग और भजन—दो ही ऐसे साधन हैं, जिनसे सारे दोषोंका नाश होकर सारे सद्गुणोंकी प्राप्ति एवं फलत: समस्त दु:खोंका नाश होकर आत्यन्तिक सुखकी प्राप्ति हो सकती है—
ततो दु:सङ्गमुत्सृज्य सत्सु सज्जेत बुद्धिमान्।
सन्त एतस्य छिन्दन्ति मनोव्यासङ्गमुक्तिभि:॥
निमज्ज्योन्मज्जतां घोरे भवाब्धौ परमायनम्।
सन्तो ब्रह्मविद: शान्ता नौर्दृढेवाप्सु मज्जताम्॥
(श्रीमद्भा०११।२६।२६,३२)
‘बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि दु:संगका त्याग करके सत्पुरुषोंका संग करे। सत्पुरुष अपने सदुपदेशोंसे उसके मनकी विषय-वासनाके बन्धनको अनायास ही काट डालते हैं। जैसे जलमें डूब रहे लोगोंके लिये सुदृढ़ नौका ही एकमात्र सहारा है, वैसे ही इस भयानक संसार-सागरमें डूबने-उतरानेवाले लोगोंके लिये ब्रह्मको जाननेवाले शान्त संत ही दृढ़ नौका हैं।’ संतोंका संग करनेपर अनायास ही भवसागरसे पार हुआ जा सकता है।
इसी प्रकार भजनके लिये भी कहा गया है—
जिह्वां लब्ध्वापि यो विष्णुं कीर्तनीयं न कीर्तयेत्।
लब्ध्वापि मोक्षनि:श्रेणीं स नारोहति दुर्मति:॥
‘जीभ पाकर भी जो मनुष्य कीर्तन करनेयोग्य श्रीभगवान्का नाम-गुण-कीर्तन नहीं करते, वे दुर्मति, मूर्ख मोक्षकी सीढ़ी पाकर भी उसपर नहीं चढ़ते।’
ते सभाग्या मनुष्येषु कृतार्था नृप निश्चितम्।
स्मरन्ति ये स्मारयन्ति हरेर्नाम कलौ युगे॥
‘राजन्! मनुष्योंमें वे बड़े भाग्यवान् और निश्चय ही कृतार्थ हैं, जो इस कलियुगमें स्वयं भगवान्का नाम-स्मरण करते हैं तथा दूसरोंसे कराते हैं।’
सत्संग और भजनके महत्त्वसे शास्त्र भरे हैं। महात्मा संत पुरुषोंके तथा संसारी पुरुषोंके भी असंख्य अनुभव हैं। सत्संग-भजनकी महिमा कहना तो उनकी महिमाको घटाना है। अतएव आप सत्संग-भजनमें लगनेका प्रयत्न कीजिये। सब प्रकारके सद्गुण, सुख, समृद्धि और शान्तिका यही सर्वोत्तम साधन है। भगवान् शंकरजीने यही वरदान भगवान् श्रीराघवेन्द्रसे चाहा था और यही हम सबके लिये आदर्श है।
बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग।
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सत्संग॥