मानस भावोंका विकृतरूपसे प्रकाश
सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। कई बार ऐसा होता है कि मनुष्य जब हठपूर्वक किसी मानसिक भावको दबा देता है, तब वह भाव अन्यान्य मार्गोंसे—जहाँ कहीं उसे जरा-सा भी रास्ता दिखायी देता है, उसीसे विकृत होकर निकलता है। इसलिये यह आवश्यक है कि हठपूर्वक किसी भावको न दबाकर उसके मूलस्वरूपमें ही परिवर्तन करनेका प्रयत्न किया जाय, जिससे मनमें उसका मूल ही न रहे। इस प्रणालीसे जिस अनिच्छित भावका नाश होगा, वह स्थायी, सुखकर, आरोग्यकर और शान्तिप्रद होगा। दबे हुए प्रबल भावोंको जब प्रकट होनेका सीधा मार्ग नहीं मिलता, तब वे हिस्टीरिया, उन्माद, रोष, विषाद, निराशा, प्रमाद, अनाचार, अत्याचार, विकृत चेष्टा आदि अनेकों अवांछनीय रूपोंमें प्रकट होनेका प्रयास करते हैं। यह नियम जैसा व्यष्टिके लिये है, वैसा ही समष्टिके लिये भी है।
आर्य-हिंदूशास्त्रोंमें ‘अहिंसाको परमधर्म’ माना गया है और सभीने एक स्वरसे उसकी प्रशंसा की है, परंतु साथ ही धर्म, न्याय और स्त्रियोंके सतीत्व आदिकी रक्षा, अनाचार-अत्याचारके उन्मूलन तथा राक्षसी प्रकृतिके जीवोंके दमनके लिये हिंसाकी आवश्यकता और अनिवार्यता भी मानी गयी है। इसी कारण समय-समयपर सुयोग्य अधिकारियोंके द्वारा व्यवस्थित हिंसाका प्रयोग किया जाता था, जिसको ‘दण्ड’ और ‘धर्मयुद्ध’ की संज्ञा दी गयी थी।
हिंसा निस्सन्देह बहुत बुरी चीज है, वह मनुष्यकी मानवताको दुर्दान्त दानव बना देती है; परंतु हिंसाका यथार्थ त्याग मनसे होता है। अतएव अहिंसाकी यथार्थ प्रतिष्ठाके लिये सबसे पहले और सबसे अधिक आवश्यकता है मनमें बसे हुए अहंकार, ममत्व, राग-द्वेष एवं तज्जनित हिंसावृत्तिका सर्वथा नाश करके उसकी जगह विशुद्ध प्रेमवृत्तिके उद्बोधनकी। यह कार्य तो हुआ नहीं। मनके राग-द्वेष और हिंसा-प्रतिहिंसाको मिटानेका कोई विशेष प्रयत्न बना नहीं। बाहरसे ‘हिंसा न करो’ का पाठ हमने पढ़ा। इससे बाहरकी हिंसा रुकी, पर भीतर हिंसाकी आग उत्तरोत्तर भीषण रूप धारण करती गयी और इसी आभ्यन्तरिक दुर्दमनीय हिंसाका दुष्परिणाम यह हुआ कि मर्यादित और व्यवस्थित हिंसाकी जगह ऐसी विकृत और घृणित हिंसाके सामूहिक कुकार्य हुए, जिनसे मानवताके ही मूलपर ही कुठाराघात हो गया। प्राचीन कालमें मर्यादित ‘धर्मयुद्ध’ के अवसरोंपर वीरोंसे वीरोंका युद्ध होता था और धर्मके आश्रय, बल-बुद्धिकी प्रचुरता तथा इष्टदेवकी कृपाके आधारपर किसीको विजयश्री प्राप्त होती थी। नृशंस बालहत्या, स्त्रीहत्या, सतीत्वनाश, अबाध लूट-पाट, घरोंमें आग लगाकर सारी सम्पत्तिको और जीवित नर-नारियोंको अंदर ही जला देना—ऐसे बर्बर कुकर्म प्राय: नहीं होते थे। इधर कुछ वर्षों पूर्व भारतवर्षके दोनों खण्डोंमें जो राक्षसी कुकृत्य हुए—और हुए भी धर्मके नामपर,वे बाहरी अहिंसाके कारण दबी हुई भीतरी हिंसावृत्तिके ही विकृत परिणाम थे। (मुसलमानोंने बहुत अधिक किया, हिंदुओंने उनकी अपेक्षा बहुत ही कम किया—यह सत्य है, पर किसी-न-किसी अंशमें उन्होंने भी किया ही!) इसकी जगह यदि खुलकर मर्यादित युद्ध होता तो उससे इतने बुरे रूपमें मानवताका संहार नहीं होता! इसलिये हिंदूशास्त्रोंमें आततायीके प्रति बलप्रयोगको वैध बतलाया गया है। आततायीके प्रति भी प्रेमका भाव होना बहुत उत्तम है, पर वह तो किसी असाधारण महामानवमें ही हो सकता है। साधारण मनुष्यसे उसकी आशा नहीं की जा सकती। जिनके घरमें आग लगती है, जिनके बच्चे आँखोंके सामने मारे जाते हैं, जिनकी माँ-बहिन-बेटियोंपर बलात्कार होता है, घर लूटे जाते हैं, मन्दिर तोड़े जाते हैं और भूमि छीनी जाती है, उनके मनमें द्वेष-वैर न्यूनाधिकरूपमें रहता ही है। उसे यदि सीधे मार्गसे नहीं निकलने दिया जाता तो वह कहीं-न-कहीं मार्ग बनाकर अत्यन्त विकृतरूपमें फूट निकलता है। पर आज लोग इस तथ्यको नहीं समझ रहे हैं। इसीसे अग्निको दबाया जाता है, उसे बुझाया नहीं जाता। अस्तु!
आप क्रोध और लोभका दमन सच्ची नीयतसे कर रहे हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं और बलात् भी इन दुष्ट भावोंका दमन करना सर्वथा उचित ही है। तथापि जबतक क्रोध और लोभके मूल हेतु आपके मनमें वर्तमान हैं, तबतक वे मौका पाकर किसी-न-किसी रूपमें प्रकट होंगे ही। आपके प्रसंगमें प्रत्यक्ष यही हो रहा है। आपके पत्रसे यह स्पष्ट प्रकट है कि आप जितना ही उनको दबाते हैं, उतना ही अधिक प्रबलरूपमें वे अत्यन्त विकृत होकर प्रकट होना चाहते हैं। मेरी समझसे तो आपको यह चाहिये कि आप इनके मूल स्वरूपको बदल डालें। श्रद्धा-विश्वासपूर्वक किये जानेवाले ‘सतत भगवद्भजन’ एवं ‘निज-दोष-दर्शन’ के अभ्याससे तथा ‘संतोषमें ही परम सुख है’ इस भावनासे इनका स्वरूप बदला जा सकता है। यह साधन-साध्य है, धीरज चाहिये; परंतु असाध्य नहीं है। इसका स्वरूप बदल जानेके बाद ये दु:खदायी और अशान्तिकर नहीं रहेंगे। इनका मूल ही उखड़ जायगा और यदि रहेंगे भी तो आपके सत्प्रयत्नमें सहायक बनकर रहेंगे। फिर आपको क्रोध आयेगा अपने दोषोंपर, अपने साधनकी त्रुटिपर और लोभ होगा दैवीसम्पत्ति, साधु-भाव, भगवद्भजन और भगवत्-प्रीतिकी समुन्नतिका—अभिवृद्धिका। शेष भगवत्कृपा।