मानव-धर्म

......सादर सप्रेम हरिस्मरण! आपका पत्र मिला। उत्तरमें देर हो रही है, इसके लिये क्षमा करें। मेरी समझसे तो जब हम मनुष्य हैं, तब सबसे पहले हमारे जीवनमें मानव-धर्म होना चाहिये। मानव-धर्मके बाद हिंदू-मुसलमान-ईसाई-धर्म हैं। सच पूछा जाय तो हम सबसे पहले आत्मा हैं, भगवान‍्के सनातन अंश हैं; इसके बाद मानव हैं तथा मानवके बाद और कुछ। हिंदू-मुसलमान-धर्मका पालन करने जाकर यदि हम मूल मानव-धर्मको ही भूल जाते हैं तो फिर हिंदू-मुसलमान-धर्मका पालन कैसे कर सकेंगे। भगवान् मनुने मनुष्यके साधारण दस धर्म बतलाये हैं—

धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।

धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥

(१) धैर्य या श्रेष्ठ धारणा; (२) क्षमा—अपना अहित करनेवालेसे बदला लेनेकी पूरी शक्ति होनेपर भी उसके अनिष्टाचरणको सह लेना और उसके प्रति मनमें जरा भी द्वेषबुद्धि न रखकर उसका हित चाहना (याद रखना चाहिये—क्षमा कायरोंका धर्म नहीं है, इन्द्रिय-विजयी वीरोंका धर्म है); (३) मनका निग्रह—मनपर अपना पूरा प्रभुत्व हो; उसे जहाँ लगाया जाय, वह वहीं लगे; (४) अस्तेय (मन, वचन, शरीरसे किसीके स्वत्वको ग्रहण करना चोरी है, इससे सर्वथा बचना। आजकलकी चोर-बाजारी (Black-marketing) और घूसखोरी (Corruption) प्रत्यक्ष चोरी हैं); (५) शौच—बाहर तथा भीतरकी पवित्रता; (६) इन्द्रियनिग्रह—आँख, कान, नाक, जिह्वा तथा त्वगिन्द्रियका वशमें होना; (७) धी—(श्रेष्ठ, सावधान और निश्चयात्मिका बुद्धि); (८) विद्या—जिससे संसारका बन्धन छूट जाय, ऐसी विद्या; (९) सत्य—(वाणी, मन और आचरणमें सत्यका सेवन) और (१०) अक्रोध—(मनके विरुद्ध कार्योंको बिना विकारके सह लेना)—धर्मके ये दस लक्षण हैं।

कुछ-कुछ प्रकारान्तरोंसे ऐसे ही साधारण धर्मोंका उपनिषद्, श्रीमद्भागवत, योगदर्शन, भगवद‍्गीता, जैन और बौद्ध-शास्त्र, ईसाई, पारसी तथा इस्लामधर्ममें भी वर्णन आया है।

इसके अतिरिक्त मनुष्यका परम धर्म एक और है, और वह है—‘भगवान‍्का भजन।’ भगवान‍्का स्वरूप जिसके मनमें जैसा जँचा हुआ हो, जिसे भगवान‍्का जो नाम रुचिकर प्रतीत हो, पूजा-पद्धति जैसी अपने मनको भाती हो, उसी स्वरूपका, उसी नामका, वह उसी पूजा-पद्धतिसे भजन करे, पर करे अवश्य। यही परम धर्म है। इस परम धर्मसे और उपर्युक्त मानव-धर्मसे विमुख होकर—इनका विरोधी होकर—अर्थात् मानवताको खोकर जो किसी धर्म-विशेषका पालन करना चाहता है, वह वस्तुत: बड़े भ्रममें है।

इसका अर्थ यह नहीं कि अपने-अपने धर्मको, सम्प्रदायको कोई न माने। जरूर माने, अवश्य अपने धर्मके तथा सम्प्रदायके अनुकूल आचरण करे। उससे कभी हटे नहीं, परंतु दूसरे किसीका विरोध या खण्डन भी न करे। जितने भी सच्चे महात्माओंके बतलाये हुए मार्ग हैं, सभी आगे-पीछे भगवत्-प्राप्ति करानेवाले हैं। जो जिस मार्गपर चल रहा है, वह उसीपर चले, स्वच्छन्दतासे चले; पर इस बातको याद रखे कि जगत‍्के सभी चराचर जीव एक ही भगवान‍्के अंश हैं, सबमें समानभावसे आत्मा व्याप्त है, कोई किसीका न वैरी है, न द्वेष्य है। सब एक ही भगवान‍्से आये हैं, एकमें ही बसते हैं और एकमें ही मिल जायँगे। साथ ही जिन आचरणोंसे मनुष्यका मनुष्यत्व बना रहता है, मनुष्य मनुष्य कहलानेयोग्य होता है, उन आचरणोंको—उन धर्मोंको कभी न छोड़े।

यह सत्य है कि सर्व-धर्म-समन्वयका प्रयास व्यर्थ है और एक झखमात्र है। विभिन्न धर्म भगवत्प्राप्तिके मार्ग हैं और उनका समन्वय हो नहीं सकता। धर्मके लक्ष्यका समन्वय अवश्य हो सकता है और होना भी चाहिये। साध्य एक है, पर उसकी प्राप्तिके साधन तो अधिकारी-भेदसे अनेक रहेंगे ही। कलकत्ते पहुँचनेके अनेक मार्ग हैं और भिन्न-भिन्न दिशाओंमें स्थित पुरुषोंको अपने-अपने स्थानसे ही चलकर कलकत्ते आना पड़ता है। मार्ग सभी पृथक्-पृथक् होते हैं और उनका आरम्भ एक-दूसरेके बिलकुल विपरीत और बड़ी दूरीपर होता है। कोई यदि सोचे कि हम सभी आरम्भसे ही एक ही मार्गसे जायँ तो ऐसा सोचना पागलपनके सिवा और कुछ नहीं होता; परंतु लक्ष्य एक होनेसे ज्यों-ज्यों लक्ष्यके समीप पहुँचते हैं, त्यों-ही-त्यों मार्गकी दूरी भी मिटती जाती है और वातावरण भी एक-सा आता-जाता है। अन्तमें सब एक ही कलकत्तेमें पहुँच जाते हैं। कलकत्ते पहुँचनेपर सब एक जगह हैं, पर कोई पहलेसे ही एक जगहसे चलना आरम्भ करना चाहें तो वह असम्भव है। इसी प्रकार सब धर्मोंका भगवत्प्राप्तिके समस्त मार्गोंका—एकीकरण भी असम्भव प्रयास है—निरी भावुकतामात्र है। जब लक्ष्य एक है, तब मार्गकी विभिन्नताको लेकर लड़ना भी क्यों चाहिये और क्यों यह आग्रह करना चाहिये कि सब हमारे ही मार्गपर आ जायँ?