मनुष्य कर्म करनेमें स्वतन्त्र है

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। धन्यवाद। आपका कहना है कि ‘संसारमें जो कुछ होता है, सब ईश्वरकी इच्छासे ही होता है। मनुष्य भी जो-जो कार्य करता है, वह सब ईश्वरेच्छासे ही करता है, ऐसी दशामें मनुष्योंको इसका फल क्यों भोगना पड़ता है?’

उत्तरमें निवेदन है कि संसारमें जो सुख-दु:ख, हर्ष-शोक, धन- वित्त आदि प्राप्त होते हैं, वे जीवोंके प्रारब्धके फल हैं। प्रारब्धके निर्माता एवं नियामक ईश्वर हैं तथा बिजलीकी बत्तियोंमें शक्ति प्रदान करके उन्हें जलानेवाले शक्तिभण्डार (पावर-हाउस)-की तरह कर्म करनेकी शक्ति प्रदान करनेवाले भी ईश्वर हैं। इसीसे कहा जाता है कि यह सब ईश्वरेच्छासे हुआ है। वस्तुत: हुआ है अपने-अपने कर्मानुसार। समष्टि प्रकृतिमें जो चेष्टा होती है, वह ईश्वरेच्छासे होती है; क्योंकि जड प्रकृतिमें जो गतिशीलता आती है, वह चेतन पुरुषके संनिधानसे ही आती है। अतएव कहा जाता है कि ईश्वरकी इच्छाके बिना पत्ता भी नहीं हिलता। वास्तवमें—‘स्वभावस्तु प्रवर्तते।’

मनुष्य जो कुछ कर्म करता है, वह ईश्वरकी इच्छासे करता है—यह मानना ठीक नहीं है। ईश्वर धर्ममय हैं। यदि उनकी प्रेरणासे मनुष्य कर्म करे तो सभीके द्वारा धर्मका ही अनुष्ठान हो। कोई पापके निकट जाय ही नहीं। अत: मनुष्यके द्वारा जो कुछ कार्य होता है, उसके मूलमें अहंकार और राग-द्वेष काम करते हैं। हाँ, जो निष्काम कर्मयोगी है अथवा जो भगवत्-शरणागत निर्भर भक्त है, उसकी प्रवृत्ति राग-द्वेषके कारण नहीं होती। वह ईश्वरकी आज्ञासे ही सारे कार्य करता है, ईश्वरके लिये ही करता है। अतएव उसके द्वारा अनुचित कार्य कभी नहीं होते।

भगवान‍्ने प्रत्येक मनुष्यको कर्म करनेमें स्वतन्त्र बना रखा है। अतएव उसके कार्यकी जिम्मेदारी उसीपर है। वह कर्म करनेमें स्वतन्त्र, किंतु फलभोगमें परतन्त्र है। मनुष्यके अन्त:करणमें दो प्रधान शत्रु हैं—काम और क्रोध*।

ये ही सारे अनर्थोंकी जड़ हैं। इन्हींकी प्रेरणासे मनुष्य पापकर्ममें प्रवृत्त होता है। ये दोनों शत्रु अपने मनमें रहते हैं और हम ही इनको प्रोत्साहन देते हैं। अत: इनके द्वारा होनेवाले कर्म भी हमारे ही किये हुए समझे जाते हैं। अतएव कोई भी मनुष्य, जो राग-द्वेष या कामनाके वशीभूत होकर कर्ममें प्रवृत्त होता है, अपने किये हुए कर्मोंके उत्तरदायित्वसे मुक्त नहीं हो सकता। उसे उनका फल अवश्य भोगना ही पड़ेगा।

यदि ऐसा मान लिया जाय कि सब कुछ ईश्वर ही करते हैं, तब तो ईश्वरको विषम दृष्टि रखनेवाला और निष्ठुर मानना पड़ेगा; क्योंकि उन्होंने सबको एक-सा नहीं बनाया। किसीको सुन्दर बनाया तो किसीको काना या कुबड़ा कर दिया। कोई सुखी, कोई दु:खी, कोई धनी, कोई दरिद्र—ऐसी विषमता या निर्दयता क्या कभी ईश्वर करते हैं?—नहीं; अतएव यह मानना पड़ेगा कि जीवोंको अपने किये कर्मोंका ही दण्ड या पुरस्कार मिलता है। भगवान् तो शक्तिदाता, नियामक और साक्षिमात्र हैं। शेष प्रभुकी कृपा।