मौनका स्वरूप और प्रभुकी प्रसन्नताका उपाय

सप्रेम हरिस्मरण! आपका कृपापत्र मिला। आपने जो कुछ पूछा, उसका उत्तर निम्नलिखित है—

(१) मौनका साधारण अर्थ है, वाणीसे कुछ भी न बोलना। यह मौनका स्थूल रूप है। इससे भी बड़ा लाभ है। मौन रहनेवाला पुरुष असत्यभाषण, अप्रियभाषण, अहितभाषण, गाली, निन्दा तथा व्यर्थ वार्तालाप आदि दोषोंसे सहज ही छुटकारा पा जाता है। साधन-भजन जितना गुप्त रहता है, उतना ही सफल होता है। इधर-उधर कहनेसे ही साधनकी गुप्तता नहीं रहने पाती। मौनावलम्बी साधक अपने साधन-भजनको अनायास ही गुप्त रख सकता है। पर मौन केवल वाणीका ही नहीं है, इन्द्रिय और मनका भी होता है। इन्द्रिय और मनका विषयोंकी ओर दौड़ लगाना ही उनकी वाचालता है। उनका संयम रखना, उन सबको परमात्मचिन्तनमें विलीन कर देना मौनका यथार्थ स्वरूप है। इस प्रकार मनके मौन हो जानेपर वह सांसारिक संकल्पोंसे रहित होकर नित्य अपने परम इष्ट भगवान‍्के मननमें ही लगा रहता है। ऐसा करते-करते आगे चलकर मनमें समस्त भेद-प्रपंचका लय होकर केवल विशुद्ध सच्चिदानन्दघन एक भगवान् ही रह जाते हैं। ‘सब कुछ भगवान् हैं’ इस सत्यका उसे प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है। फिर तो ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेयकी त्रिपुटी नहीं रहती। गुरु और शिष्य तथा शंका और समाधान सब समाप्त हो जाते हैं। यही मौनका वास्तविक रूप है। इसी स्थितिको लक्ष्य करके कहा गया है—‘गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं शिष्यास्तु छिन्नसंशया:।’

(२) भगवान‍्की प्रसन्नताका उपाय है—भगवान‍्का हो जाना, सबकी आशा-भरोसा छोड़कर केवल भगवान् पर निर्भर रहना। भगवान् कहते हैं—‘सब छोड़कर मेरी शरणमें आ जाओ।’ ‘यह संसार अनित्य और दु:खरूप है, इसमें आकर सुख चाहते हो तो मेरा भजन करो।’ ‘अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।’(गीता ९। ३३)। भगवान‍्की इन आज्ञाओंका उल्लंघन करके क्या हम भगवान‍्की अवहेलना नहीं करते। फिर उनकी प्रसन्नता कैसे हो? उन्हें प्रसन्न करना हो तो उनकी आज्ञाका यथावत् पालन करना चाहिये। उनकी रुचि एवं आज्ञाके अनुसार हमें अपने जीवनका निर्माण करना चाहिये। तनसे, मनसे, प्राणसे और सर्वस्व-समर्पणद्वारा केवल भगवान‍्के प्रेमके लिये ही कार्य करना चाहिये। इसमें भगवान‍्का कोई उपकार नहीं, अपना ही उद्धार होगा।

(३) क्रोधकी वृत्ति मनमें आते ही भगवान‍्को याद करें। जिसके प्रति क्रोध हो, उसमें भी भगवान‍्को विराजमान देखनेका प्रयास करें। संसारके समस्त जड-चेतनमें प्रभु विराज रहे हैं, सब उन्हींके स्वरूप हैं। फिर हम किसपर क्रोध करें—

निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध॥

क्रोध आते ही मौन हो जाय तो भी लाभ होता है। मौन न हुआ जाय तो और कुछ भी न बोलकर जोर-जोरसे भगवान‍्के नामोंका उच्चारण करने लग जाना चाहिये। इससे क्रोध अवश्य दूर हो जायगा।

(४) किसीके उत्कर्षको देखकर जो जलन पैदा होती है, उसीका नाम ईर्ष्या है। जो अज्ञानी है, जो शरीरको ही सब कुछ मानता है, वही दूसरोंसे ईर्ष्या करता है। जिसकी दृष्टिमें सम्पूर्ण विश्व भगवान‍्का स्वरूप है, वह ईर्ष्या भी किससे करेगा? वह तो सर्वत्र भगवान‍्को देखकर मन-ही-मन सबका आदर करके ही सुखी होगा। अत: सर्वत्र भगवद्दर्शन ही ईर्ष्या आदि सभी मनोविकारोंको दूर भगानेका एकमात्र अमोघ उपाय है।