मित्र और सुहृद्के लक्षण
प्रिय महोदय! सादर सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। मित्र और सुहृद्का भेद पूछा। इसके उत्तरमें निवेदन है कि मित्र देने-लेनेमें संकोच न करनेवाला हितैषी होता है और सुहृद् प्रत्युपकारकी कोई भावना न रखकर हित करता है। मित्रकी बड़ी सुन्दर व्याख्या श्रीतुलसीदासजी महाराजने की है—
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी।
तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥
निज दुख गिरि सम रज करि जाना।
मित्रक दुख रज मेरु समाना॥
× × × ×
कुपथ निवारि सुपंथ चलावा।
गुन प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा॥
देत लेत मन संक न धरई।
बल अनुमान सदा हित करई॥
बिपति काल कर सतगुन नेहा।
श्रुति कह संत मित्र गुन एहा॥
आज ऐसे मित्र कहाँ हैं? जो केवल अपने स्वार्थ-साधनके लिये ही किसीके साथ मित्रताका नाता जोड़ना चाहते हैं या जो सभाओंमें कहनेभरको किसीको ‘मित्र’ नामसे सम्बोधित करते हुए अंदर-ही-अंदर उसका अहित सोचते रहते हैं; ऐसे मित्रोंसे तो बचना ही चाहिये। सुहृद्के सम्बन्धमें शास्त्र कहते हैं—
परेषामनपेक्ष्यैव कृतप्रतिकृतं हि य:।
प्रवर्तते हितायैव स सुहृत् प्रोच्यते बुधै:॥
(स्क० मा० कुमा० १०।२६)
‘प्रत्युपकारकी आशा न रखकर जो दूसरेके हितके लिये प्रवृत्त होता है, बुद्धिमान् पुरुष उसको सुहृद् कहा करते हैं।’ हम सभीको मित्र और सुहृद् बननेकी चेष्टा करनी चाहिये। हम किसीके मित्र या सुहृद् होंगे तो हमें भी मित्र-सुहृद् मिल जायँगे। सच्चे सुहृद् तो श्रीभगवान् ही हैं, जिन्हें सुहृद् जान लेनेपर ही शान्ति मिल जाती है।
सुहृदं सर्व भूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति।