मृत्युके बादके शरीर और श्राद्ध-तर्पण
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। आपके प्रश्नोंका संक्षेपमें क्रमसे उत्तर लिख रहा हूँ। पितृ-श्राद्धके सम्बन्धमें ‘कल्याण’ के १५ वें वर्षके ११ वें अंकमें छप चुका है, उसे भी देखना चाहिये।
(१) ‘जैसे जोंक अगले तृणपर पैर रखकर पिछले तृणसे पैर उठाती है, इसी प्रकार जीव दूसरे शरीरका निश्चय करके पहले शरीरको छोड़ता है।’ अथवा जैसा श्रीमद्भगवद्गीतामें कहा है—‘जैसे पुराना वस्त्र त्यागकर मनुष्य नया वस्त्र पहन लेता है, वैसे ही जीव एक शरीरको त्यागकर दूसरे नये शरीरको धारण कर लेता है।’ ये दोनों ही बातें सत्य हैं। साथ ही यह भी सत्य है कि ‘जीव अपने कर्मफल भोगनेके लिये नरक, पितृलोक या स्वर्गादि लोकोंमें भी जाता है।’ इन दोनोंमें ही शास्त्रीय सिद्धान्तोंकी संगति है। शरीरोंके कई भेद हैं। हमारे इस मर्त्यलोकका शरीर पांचभौतिक पृथ्वीप्रधान होता है, पितृलोकका वायुप्रधान होता है और स्वर्गादि देवलोकोंका तेज:प्रधान होता है। यहाँ मृत्यु होते ही जीवको एक आधाररूप शरीर मिल जाता है, उसे ‘आतिवाहिक देह’ कहते हैं। इसलिये उपर्युक्त दोनों सिद्धान्तोंके साथ कोई विरोध नहीं रहता। उनमें शरीर मिलनेकी बात है; कैसा कौन-सा शरीर मिलेगा, यह कुछ भी नहीं कहा है।
आतिवाहिक शरीरसे—कर्मानुसार यदि जीवको नरकोंमें जाना है तो वायुप्रधान ‘यन्त्रणा-शरीर’ मिलता है, जिसमें उसे भीषण यन्त्रणाओंका अनुभव होता है; पर मृत्यु नहीं होती। जैसे नरकोंकी आगसे जलने और तीक्ष्णधार पत्रोंके द्वारा कटने आदिकी पीड़ा असह्य होती है, पर मृत्यु नहीं हो पाती। पितृलोकके अन्यान्य स्तरोंमें जानेवाले जीवोंको भी वायुप्रधान भोगदेह प्राप्त होते हैं, परन्तु उनमें वे नरक-यन्त्रणा न भोगकर पितृलोकके भोग भोगते हैं। स्वर्गादि देवलोकोंमें जानेवालोंको तेज:प्रधान देह मिलते हैं। ये स्थूल पार्थिव देह नहीं होते। देव-देहमें वृद्धावस्था नहीं होती। मूत्र-पुरीषादि नहीं होते। हमलोगोंकी भाँति मरण नहीं होता। पर इन देहोंकी आकृति यहाँ मृत्युलोककी आकृतिके सदृश ही होती है। हाँ, प्रेतलोकके देहकी आकृति मलिन तथा भयानक दीखती है और देवलोकके देहकी तेजस्वी और सुन्दर प्रतीत होती है; परंतु उन आकृतियोंको देखकर यहाँके उनके परिचित लोग उन्हें पहचान सकते हैं कि ये अमुक हैं। लंका-विजयके पश्चात् महाराज दशरथके लंकामें पधारनेकी बात आती है और उन्हें पहचानकर सीताजी अवगुण्ठनवती हो जाती हैं तथा भगवान् श्रीरामचन्द्र उनका यथोचित सत्कार करते हैं। इस प्रकारके अन्यान्य बहुत-से इतिहास हैं। इस युगमें भी परलोकगत आत्माओंके आने और उन्हें पहचाननेके बहुत-से उदाहरण मिलते हैं (यद्यपि ऐसी बातोंमें आज झूठ-फरेब बहुत अधिक मात्रामें आ गया है)। पितृलोक और देवलोकके हमारे आत्मीय हमारे साथ वैैसा ही सम्बन्ध मानते हैं, जैसा यहाँ मानते थे और अपने-अपने स्वभावके अनुसार हमारे सुख-दु:खमें सुखी-दु:खी होते हैं तथा सहायता एवं विरोध करनेका भी यथाशक्ति प्रयास करते हैं। हमलोग जो उनके लिये श्राद्ध-तर्पण, दान आदि करते हैं, उन लोकोंके नियमानुसार वहाँके पदार्थोंके रूपमें वह उन्हें प्राप्त होता है, उनकी भूख-प्यास मिटती है और उन्हें शान्ति मिलती है। उनके निमित्त किये हुए सदनुष्ठानोंसे उनकी सद्गतितक हो जाती है। इसलिये उनके निमित्त श्रद्धा तथा विधिपूर्वक श्राद्ध-तर्पण, कीर्तन, दान तथा जपादि अवश्य-अवश्य करने चाहिये।
(२) जो लोग पितृलोक तथा देवलोकादिसे लौटकर मनुष्य या पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि स्थूल शरीरोंको प्राप्त हो जाते हैं, उनको भी उनके यहाँके पदार्थोंके रूपमें परिणत होकर हमारे अर्पण किये हुए पदार्थ मिलते हैं। जैसे हमें अमेरिका डालर भेजने हों तो यहाँ तो रुपये ही जमा करायेंगे; परंतु बैंक अपने भावसे मुद्रापरिवर्तन करके वहाँ उन्हें दे देगा। इसी प्रकार हम यहाँ जो कुछ देंगे, वह उन्हें वहाँ उन्हींके उपयोगी होकर मिल जायगा। वसु, रुद्र और आदित्य—देवशक्तियाँ, कौन जीव कहाँ है, इस बातका पता रखती हैं और यथायोग्य वस्तुएँ वहाँ पहुँचा देती हैं। इसलिये श्राद्ध-तर्पण करते ही रहना चाहिये, चाहे पितर पितृ-देवलोकमें हों, चाहे स्थूल योनिमें आ गये हों।
(३) आपकी यह शंका ठीक है कि ‘यदि कोई पितर मुक्त हो गया हो तो उसके निमित्त किया हुआ श्राद्ध-दान आदि किसको मिलेगा। ऐसी स्थितिमें श्राद्ध-तर्पण करनेसे क्या लाभ है?’ इसका उत्तर यह है कि प्रथम तो हमको यह पता कैसे लगेगा कि अमुक पितरकी मुक्ति हो गयी है। हमने मुक्ति मानकर श्राद्ध-तर्पण करना छोड़ दिया और उसकी मुक्ति अभी नहीं हुई हो तो हम कर्तव्यविमुखताका पाप करनेवाले हुए और उस पितरको अतृप्त रहना पड़ा। दूसरे, यह मान लें कि मुक्ति हो गयी तो भी श्राद्ध-तर्पणादि करनेमें कोई हानि नहीं है, हमारे उस सत्कर्मका फल लौटकर हमींको मिल जायगा, जैसे किसीके नाम मनीआर्डरसे भेजे हुए रुपये उस व्यक्तिके वहाँ न मिलनेपर या मर जानेपर लौटकर हमें वापस मिल जाते हैं।
शास्त्रका आदेश तो डंकेकी चोट है ही, हमारा अपना भी इस विषयमें कुछ अनुभव है; उसके आधारपर हम यह कह सकते हैं कि श्राद्ध-तर्पण, हरिकीर्तन, अनुष्ठान, नारायणबलि और गया-श्राद्ध आदिसे पितरोंको बहुत सुख मिलता है, उनका बड़ा हित होता है। अतएव माता-पिता तथा पूर्वपुरुषोंके प्रति कर्तव्यशील प्रत्येक व्यक्तिको श्रद्धा तथा विधिपूर्वक यथासाध्य श्राद्ध-तर्पण अवश्य करना चाहिये।