मृत्युपर शोक नहीं करना चाहिये

प्रिय भाई! सप्रेम हरिस्मरण। कुछ दिनों पूर्व तुम्हारा लिखा एक कार्ड मिला था।......उस दिन अकस्मात् श्री.....के पत्रसे भाई......की बीमारीका समाचार मिला और तीसरे ही दिन उनके शरीर-त्यागका समाचार मिल गया। शरीरके सम्बन्धको लेकर लौकिक दृष्टिसे विचार करनेपर यह बड़ी ही दु:खद घटना प्रतीत होती है। मेरे प्रति उनका जो प्रेमभाव था, उसकी इस समय तीन दिनोंसे बहुत ही स्मृति हो रही है। उनके-जैसे सरल-हृदय निष्कपट पुरुष इस युगमें बहुत ही थोड़े हैं। उनमें कई आदर्श गुण ऐसे थे, जिनकी स्मृति और अनुशीलनसे जीवनमें पवित्रताका संचार हो सकता है। सत्संगी भाइयोंमें उनके-जैसे दम्भ और मत्सरसे रहित श्रद्धालु पुरुष बिरले ही हैं। उनके-जैसे पुरुषका हमलोगोंके बीचसे उठ जाना अवश्य ही मर्मभेदी है और ऐसी अवस्थामें चित्तका शोकाकुल होना स्वाभाविक ही है, परंतु भैया! शरीरका यह परिणाम अवश्यम्भावी है। दो दिन आगे-पीछे सबकी यही गति होनेवाली है। हमलोगोंको शोक होता है ममत्व और स्वार्थवश। जिसमें ममत्व नहीं होता या किसी स्वार्थसाधनकी तनिक भी आशा नहीं होती, उसके वियोगमें दु:ख नहीं होता। शत्रुभाव होनेपर तो मनुष्यको उसकी मृत्युमें द्वेषवश सुख होता है। पुत्रशोकसे व्याकुल राजा चित्रकेतुको समझानेके लिये नारदजीने जब राजपुत्रके आत्मासे अनुरोध किया, तब उस आत्माने राजासे कहा कि ‘तुम मेरे लिये क्यों शोक कर रहे हो? मैं अपने कर्मवश देव-मनुष्य, पशु-पक्षी आदि विविध योनियोंमें भटका करता हूँ। वहाँ किस योनिमें तुमलोग मेरे माता-पिता होते हो! मेरे मर जानेपर तुम्हें मुझे पुत्र समझकर शोक हुआ है, उसके बदले मुझे तुम शत्रु समझकर हर्ष क्यों नहीं मानते? क्योंकि ये शत्रु-मित्र और पिता-पुत्रके सम्बन्ध तो बदलते ही रहते हैं। शरीरके सम्बन्धसे ही ममत्वके कारण दु:ख-सुख होता है। आत्मा संगरहित, पुत्र-पिता और शत्रु-मित्रादि भावसे रहित और नित्य है, वह सुख-दु:खादि कुछ भी नहीं भोगता। तुमलोग मुझे अपना पुत्र क्यों समझते हो, मेरा तुम्हारे साथ कोई सम्बन्ध नहीं है।’

भाई! यहाँके सभी सम्बन्ध आरोपित हैं। अपना-अपना कर्मफल भोगनेके लिये जीव विविध योनियोंमें आते हैं और कर्मफल भोगकर चले जाते हैं। इसमें शोककी वास्तवमें कोई बात नहीं है। फिर......की मौत जैसी परिस्थितिमें हुई है, वह तो ईर्ष्या उत्पन्न करनेवाली है। मृत्युका ऐसा सुअवसर किसको कब मिलता है! पुण्यभूमि ऋषिकेशमें ब्रह्मद्रवरूपा भगवती भागीरथीके पावन तटपर भक्तोंसे घिरे हुए भगवन्नाम-कीर्तन और श्रीगीताजीकी पतितपावनी ध्वनिको कर्णपथसे हृदयमें धारण करते हुए और सच्चे महात्मा पुरुषोंके आश्रयमें शरीरत्यागका सौभाग्य सहज ही किसको मिलता है? यह तो भाई श्री......के पुण्यपुंजका प्रभाव और उनकी जीवनमयी सत्संगति और भगवत् -शरणागतिका दुर्लभ फल है। ऐसी मृत्यु चाहनेपर नहीं मिलती। जब अभिमन्युके निधन होनेपर पाण्डव-परिवार शोकसागरमें डूबने लगा, श्रीसुभद्राजीकी दशा शोचनीय हो गयी, तब श्रीभगवान‍्ने उनसे कहा था—

वीरसूर्वीरपत्नी त्वं वीरजा वीरबान्धवा।

मा शुचस्तनयं भद्रे गत: स परमां गतिम्॥

तपसा ब्रह्मचर्येण श्रुतेन प्रज्ञयापि च।

सन्तो यां गतिमिच्छन्ति तां प्राप्तस्तव पुत्रक:॥

(महा०, द्रोण०७७।१६-१७)

ये चान्येऽपि कुले सन्ति पुरुषा नो वरानने।

सर्वे ते तां गतिं यान्तु ह्यभिमन्योर्यशस्विन:॥

(महा०, द्रोण० ७८।४१)

‘हे भद्रे! तुम वीरमाता हो, वीरपत्नी हो, वीरपुत्री हो और वीरकी बहिन हो। तुम्हारा पुत्र परम गतिको प्राप्त हुआ है, उसके लिये शोक न करो। तुम्हारे पुत्रको वही दुर्लभ गति मिली है, जिसको संतगण तप, ब्रह्मचर्य, स्वाध्याय और प्रज्ञासे प्राप्त करना चाहते हैं। मैं तो यह चाहता हूँ कि हमारे कुलमें और भी जो लोग हैं, सब इसी यशस्वी अभिमन्युकी गतिको प्राप्त करें।’

अतएव......का आदर्श मरण देखकर, भैया! तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। माताजीको मेरा सादर यथायोग्य कहकर मेरी ओरसे उन्हें समझाना चाहिये। उन्हें अपने मनमें इस बातका गौरव करना और अपना सौभाग्य समझना चाहिये कि वे इस प्रकारकी दुर्लभ मृत्यु पानेवाले पुण्यशील पतिकी धर्मपत्नी हैं। पतिके सुखमें सुखी होनेवाली पत्नीको पतिकी शुभगति होते जानकर प्रसन्न ही होना चाहिये। जिस बातमें पतिकी आत्माको सुख हो, उसका कल्याण हो, वह बात देखनेमें परम दु:खप्रद होनेपर भी प्रेमके कारण पत्नीके मनमें सुख उपजानेवाली होनी ही चाहिये। पतिव्रता अपना सुख नहीं चाहती, वह पतिको सुखी देखकर ही सुखी होती है, चाहे पतिका वह सुख लौकिक दृष्टिसे अपने लिये कितना ही दु:खजनक माना जाता हो।

भैया! वियोग और संयोगमें जो दु:ख और सुख होता है, वह अपने ही लिये होता है। हम वियोगमें अपनेको किसी लाभसे वंचित और संयोगमें लाभसे समन्वित समझते हैं, इसीसे हमें दु:ख-सुखकी प्रतीति होती है। हमें उस जीवके सुख-दु:खका उतना खयाल नहीं होता। पर प्रेममें इस खयालकी बड़ी आवश्यकता है। फिर एक बात यह भी खयालमें रखनेकी है कि अनित्य वस्तुका नित्य संयोग असम्भव है। यह तो भगवान‍्की लीला है। हम सब उसके इस जगन्नाटकमें लीलापात्र हैं। घर स्टेज है, इसमें अभिनेताओंको अपना-अपना पार्ट करना हैै। यहाँ अपना कौन है। नये-नये सीन आयेंगे ही, यह समझकर शोकको नष्ट करना चाहिये। जब आत्मा अविनाशी है और शरीर क्षणभंगुर है ही, तब शोक कैसा? तुम गीता पढ़ते हो। तुम्हारी सत्संगमें प्रीति है। अभी घरके मोहमें आसक्त भी नहीं हो। इससे सम्भव है तुमको शोक कम होगा। परंतु माताजीका शोक सहज नहीं है। मेरा तुमसे यह अनुरोध है कि तुम अब यथासाध्य सभी प्रकारसे माताजीको संतुष्ट रखनेकी चेष्टा करना। तुम्हारा प्रत्येक बर्ताव उनके दु:खानलमें शीतल जलकी धारा बहानेवाला होना चाहिये। भूलकर भी ऐसा कोई व्यवहार न कर बैठना, जो शोककी आगमें आहुतिका काम दे। तुम्हारा परम कल्याण मेरी समझसे अब माताजीके चित्तको संतोष पहुँचानेमें ही है। इसीको भगवत्सेवा समझकर करना चाहिये।

भैया! संसार अस्थिर है, यहाँ सभी कुछ जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधिशील है। इस अस्थिर, अनित्य और दु:खालयमें स्थिरता, नित्यता और सुख कहाँ है? इसमें जो आनन्द है वह तो नित्य, सनातन, अचल, अनन्त श्रीभगवान‍्के आनन्दरूपको लेकर ही है। उसे पानेपर फिर दु:खका स्वप्नमें भी लेश नहीं रहता और उसकी प्राप्ति न होनेतक लौकिक दृष्टिसे ऊँची-से-ऊँची अवस्थामें भी चित्तमें दु:खका दावानल धधकता रहता है। इसीसे श्रीभगवान‍्ने घोषणा की है—

अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥

माताजीको धीरज बँधाना, समझाना और सेवाद्वारा उनके दु:खको हलका करना तुम्हारा कर्तव्य है। तुम भी मनमें साहस, धैर्य रखना। विवेक और भगवत्-शरणागतिके भावोंसे चित्तको क्षोभरहित बनाये रखनेका प्रयत्न करना।

मैं तुम्हें लिखनेको तो बहुत लिख गया। परंतु.....की स्मृतिसे मेरा चित्त भी विगलित हुआ जा रहा है। काशीमें मेरे तो वे एक बड़े भारी आधार थे; परंतु इस स्मृतिसे क्या होता है।