नरक-भोगके बाद फिर भोग-योनि क्यों?

सप्रेम हरिस्मरण! कृपापत्र मिला। आपने ‘मार्कण्डेयपुराण’ में पापियोंकी नरक-यातनाका वर्णन पढ़कर यह सन्देह किया है कि ‘जब विभिन्न नरकोंमें पापोंका दण्ड मिल ही जाता है, तब संसारमें कोई सुखी, कोई दु:खी क्यों है? कोई पशु और कोई मनुष्य क्यों बना है?’

आपकी शंका ठीक है। इसका समाधान भी आपको उक्त पुराणमें ही मिल सकता है। जहाँ नरकयातनाका वर्णन है, उसके बादवाले प्रसंगोंमें यह भी बताया गया है कि नरकसे लौटे हुए प्राणी इस जगत‍्में किन-किन योनियोंमें जन्म लेते हैं तथा किन-किन पापोंके कारण उन्हें किस-किस प्रकारकी योनि मिलती है।

वह प्रसंग पढ़नेसे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि जीव अपने शुभ और अशुभ कर्मोंका फल भोगनेके लिये जब स्वर्ग और नरकमें जाता है, उस समय वहाँ वह शुभाशुभ कर्मोंके अधिकांश फलको तो भोग लेता है, कुछ पुण्य अथवा पाप बाकी रह जाते हैं, जिनके अनुसार इस लोकमें उसे विभिन्न योनियोंकी प्राप्ति होती है। अत: यहाँ जो विषमता देखनेमें आती है, वह अपने ही पूर्व कर्मोंका ही फल है।

नरक-यातनाके द्वारा पापका दण्ड भोग लेनेपर भी जो उसके अन्त:करणमें पापके संस्कार जमा होते हैं, वे नहीं जाते। इसलिये उस जीवसे यदि वह पुरुषार्थ करके अथवा सत्संग या भगवत्कृपाके आश्रयसे पापपथसे सर्वथा हट नहीं जाता तो पूर्वसंस्कारवश पुन: पापके आचरण बनते हैं और उनके फलस्वरूप वह बार-बार नरकों तथा पापयोनियोंमें पड़ता रहता है। जब भगवान‍्की दयासे उसमें सुबुद्धिका उदय होता है और वह सत्संग आदिके प्रभावसे भगवान‍्के नाम-जप आदिमें लगता है तभी उसके पाप-संस्कार दूर होते हैं और तभी वह उत्तम गतिका अधिकारी हो पाता है।

पापाचारी मनुष्य पापयोनिमें पड़ता है, इसका समर्थन वेदकी श्रुति भी करती है।

‘......य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरञ्श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चाण्डालयोनिं वा।

(छा०उ०५। १०। ७)

अर्थात् इस संसारमें जो मलिन आचरणवाले लोग हैं, वे बार-बार मलिन-योनि, कूकर-सूकर एवं चाण्डाल आदिकी योनियोंमें पड़ते हैं।

गीतामें भी भगवान‍्का वचन है—

तानहं द्विषत: क्रूरान् संसारेषु नराधमान्।

क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥

(१६।१९)

‘जो सबसे द्वेष रखनेवाले क्रूर नराधम हैं, उन्हें संसारके भीतर मैं बार-बार आसुरी योनियोंमें ही गिराता हूँ।’

मनुस्मृतिमें भी पापके कारण प्राप्त होनेवाली पापयोनियोंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।

उपर्युक्त विवेचनसे आपको यह स्पष्ट हो गया होगा कि ब्राह्मण-चाण्डाल, अमीर-गरीब, सुखी-दु:खी, रोगी-नीरोग, मनुष्य-पशु आदिकी अवस्था जीवोंको अपने कर्मानुसार ही प्राप्त होती है। नरक भोगनेके बाद भी पापकर्म शेष रह जाते हैं।