नवीन प्रारब्ध

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निर्धनता अवश्य प्रारब्धवश ही प्राप्त होती है, परंतु नवीन उत्कट पाप-पुण्यद्वारा नवीन प्रारब्ध भी बनाया जा सकता है। इस सिद्धान्तके अनुसार धनकी इच्छासे भजन करनेवाले प्राणियोंको इसी जन्ममें धन प्राप्त होना भी असम्भव नहीं है; किंतु ऐसा तभी हो सकता है, जब उनका वह कर्म पूर्वप्रारब्धकी अपेक्षा भी विशेष प्रबल हो।

वैराग्य पूर्वसंस्कारोंसे भी हो सकता है और इस जन्मके सत्संग आदि विशेष साधनोंके द्वारा भी। शेष भगवत्कृपा।