निष्काम कर्मका स्वरूप
सप्रेम हरिस्मरण! कृपापत्र मिला। उत्तर बहुत विलम्बसे जा रहा है। कृपया क्षमा करेंगे।
मैंने आपकी जीवनी भलीभाँति पढ़ ली है। आपका श्रीभगवान्के चरणोंकी ओर झुकाव हो रहा है, यह बड़े सौभाग्यकी बात है। जिस किसीकी प्रेरणासे जीव भगवान्की ओर बढ़े, यही जीवनका परम पुरुषार्थ है। ‘सभी रूपोंमें एक ही भगवान् हैं’—यह धारणा बहुत उत्तम है। इस दृष्टिसे भगवान् शंकर और भगवान् श्रीराममें कोई तात्त्विक भेद नहीं है। फिर भी आपने भगवान् श्रीराघवेन्द्रको इष्टदेव बनाकर जो साधना आरम्भ की है, वह परम मंगलमयी है। आप पूर्ण उत्साह, श्रद्धा, विश्वास और लगनके साथ अपना भजन चालू रखें, यही तो परम कल्याणका साधन है। अब रही अध्ययन और परीक्षा छोड़नेकी बात, सो मेरी समझसे किसीको भी अपने न्यायोचित कर्तव्यका त्याग करनेकी आवश्यकता नहीं है। फिर आप तो कर्मयोगी बनना चाहते हैं; आप अध्ययन क्यों छोड़ें? फलकी कामना और आसक्तिको छोड़कर लाभ-हानि, सिद्धि-असिद्धि, अनुकूलता-प्रतिकूलता तथा जय-पराजय आदिमें समानभाव रखते हुए भगवत्प्रीतिके लिये अध्ययनादि सत्कर्म करते रहना ही वास्तविक कर्मयोग है। विहित कर्मसे भागना तो इस कर्मयोगमें निषिद्ध है। इस कर्मयोगसे भगवान्की पूजा होती है और उसका फल होता है जीवनकी सफलता—भगवान्की प्राप्ति। ‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:’—जीवनके चरम लक्ष्य—भगवान्को पा लेना ही परम सिद्धि है और भगवान्की आज्ञा समझकर उनकी प्रसन्नताके लिये ही शास्त्रोक्त शुभ कर्म करना कर्मके द्वारा भगवान्का पूजन करना है। इस प्रकार विचार करके आप अपना अध्ययन पूर्ण करें।
आपमें ‘धन आदिकी कामना नहीं है’ यदि ऐसा है तो यह और भी उत्तम है और ऊँचे उठानेवाली बात है। ऐसी दशामें आप आयुर्वेदके ज्ञाता होनेपर जनतारूप भगवान्की विशेष सेवा कर सकेंगे। जबतक शरीर है, तबतक इसको भोजन-वस्त्र देना ही है, स्त्री और बच्चे तथा परिवारके अन्य लोग भी इसलिये आदरणीय हैं कि उनमें भी आपके इष्टदेव श्रीराम व्यापक हैं, अत: उन सबको अपने पिता-पत्नी मानकर नहीं, पिता-पत्नी आदिके वेषमें भगवान् समझकर उनका आदर करना तथा यथायोग्य भरण-पोषणके द्वारा उनकी सेवा करना है। इसके लिये यदि न्यायत: आप कुछ उपार्जन करें तो यह दोषकी बात नहीं है। भगवद्बुद्धिसे, भगवान्की सेवाका भाव रखनेसे यह चिकित्सारूपी कर्म ही आपके लिये भजन बन जायगा। पत्नीको आपने देवताओंकी साक्षितामें ग्रहण किया है; अत: आपका और उसका यह सम्बन्ध आजीवन रहेगा। दाम्पत्य-सम्बन्ध हिंदू-धर्ममें बड़ा पवित्र माना गया है। इसका प्रभाव जन्मान्तरमें भी पड़ता है। आप दोनों परस्परकी सम्मतिसे संयमका जीवन बिता सकते हैं। आपकी पत्नी भी भगवान्की ओर बढ़ें, घर-परिवारके अन्य लोग भी भगवान्में लगें, अपने सद्व्यवहारके द्वारा ऐसा प्रयत्न करते हुए आपको घरपर ही रहना चाहिये। यही सच्ची आत्मीयता है—
तुलसी सो सब भाँति परम हित
पूज्य प्रानतें प्यारो।
जासों होय सनेह रामपद
एतो मतो हमारो॥
यही घरवालोंके प्रति आपका कर्तव्य है।
घर छोड़कर जानेमें और भी अनेकों बाधाएँ हैं, जिनकी अभी आपको पूरी कल्पना भी नहीं है। मन ठीक हो तो घरपर भी भजन हो सकता है। मन वशमें न होनेपर जंगलमें भी अमंगल ही होगा। अत: वही करना चाहिये, जो निरापद हो और भगवद्भजनमें सहायक हो।
मेरी स्पष्ट सम्मति है कि आप घरमें रहकर अपने भजनको चालू रखते हुए सत्संग और स्वाध्याय भी करते रहें। अध्ययनको पूरा करके उसके द्वारा जनतारूप भगवान्की सेवा करें और न्यायवृत्तिसे भगवत्-प्रसादरूपमें जो उपार्जन हो, उसके द्वारा अपने कुटुम्बीजनोंका यथाशक्ति पालन करें। यद्यपि सबका पालन करनेवाले श्रीभगवान् ही हैं, तथापि मनुष्य भी निमित्त बना करता है। भगवान् ही पिता, माता, भाई, बन्धु, पत्नी, पुत्र, पति आदि रूप धारण करके भक्तसे सेवा लेनेके लिये आते हैं; अत: हमें उन्हींकी ओर दृष्टि रखकर उत्साहपूर्वक उनका आराधन करना चाहिये। दूसरे अपने साथ कैसा बर्ताव करते हैं, इसकी ओर ध्यान न देकर अपने कर्तव्यका पालन करनेकी ओर ही दृष्टि रखनी चाहिये। यह याद रखना चाहिये कि अनन्य भक्त वही है, जो सबको भगवान्का रूप समझकर अपनेको सेवक मानता है—
सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥