निष्कामताका स्वरूप
सादर हरिस्मरण! आपका कृपापत्र मिला। आपने निष्काम कर्मके विषयमें शंका की, सो कामनाकी कोटिमें तो भोग्य वस्तु ही आती है, भोक्ता नहीं आता। पत्नी पतिसे कोई पदार्थ चाहे अथवा उसके द्वारा किसी दूसरे प्रकारका सुख भोगना चाहे, तभी उसे कामना कहेंगे। केवल प्रियतमको चाहना तो कामना नहीं है, उसे तो ‘प्रेम’ कहा जाता है। इसी प्रकार श्रीभगवान्से किसी भी प्रकारके लौकिक या पारलौकिक भोगकी इच्छा रखना ही सकामता कहा जाता है। अपने कर्तव्य-पालनके द्वारा प्रभुको या प्रभुकी प्रसन्नताको पानेकी इच्छा कामना नहीं कही जाती। उसे तो निष्कामता ही समझना चाहिये।
आप लिखते हैं कि ‘सच्चा निष्काम तो नास्तिक ही हो सकता है, ईश्वरकी सत्ता माननेवाला तो निष्काम हो ही नहीं सकता’ सो मेरे विचारसे यह बिलकुल विपरीत बात है; क्योंकि कोई भी प्रवृत्ति बिना प्रयोजनके नहीं होती। प्रयोजन दो प्रकारका होता है—(१) भोग या (२) मोक्ष। विषयजनित सुखको ‘भोग’ कहते हैं और विषय-निरपेक्ष आत्मानन्द या भगवदीय आनन्दको ‘मोक्ष’। यह आनन्द ईश्वर या आत्माकी सत्ता स्वीकार करनेवालेका ही लक्ष्य हो सकता है और कर्मके लक्ष्यरूपसे इस भगवदीय आनन्दका रहना ही निष्कामता है। नास्तिककी दृष्टिमें तो इस प्रपंचके सिवा किसी अदृष्ट तत्त्वकी सत्ता ही नहीं होती। अत: उसकी कर्मप्रवृत्तिका प्रयोजन तो भोग ही होगा। वह निष्काम कैसे हो सकता है? अत: अपने इस कथनपर आप एक बार फिर विचार करनेका कष्ट करें। शेष भगवत्कृपा!