न्यायोचित चेष्टा अवश्य करनी चाहिये

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। धन्यवाद। आपके प्रश्नोंपर विचार यों है—

(१) यह ठीक है कि भगवान् सर्वज्ञ हैं; यह भी सत्य है कि वे भविष्यमें होनेवाली सभी बातोंको जानते हैं; अत: जो भी उनके ज्ञान या निश्चयमें है, वही होगा। तथापि मनुष्यको शुभ कर्म करना चाहिये और अशुभसे बचना चाहिये। जो भगवान् सर्वज्ञ हैं, वे ही शास्त्रद्वारा मनुष्यको यह प्रेरणा देते हैं कि वह सत्कर्म करे और पापसे बचे। इससे सिद्ध है कि मनुष्य अपनी रुचिके अनुसार कर्म करनेमें स्वतन्त्र है और यह स्वतन्त्रता सर्वज्ञ ईश्वरकी दृष्टिमें पहलेसे ही मौजूद है। अत: इस विधि-निषेधको मानते हुए मनुष्य जो कुछ कर रहा है या करेगा, वह सब ईश्वरके द्वारा अनुमोदित है। शास्त्र ईश्वरीय आदेश है, उसके पालनसे ईश्वर प्रसन्न होते हैं और शास्त्रके विपरीत चलनेसे मनुष्य दण्डका भागी होता है। इसके अनुसार पुरस्कार और दण्डकी प्राप्ति भी सर्वज्ञ ईश्वरकी दृष्टिमें है; अत: मनुष्यको शास्त्राज्ञा-पालनमें सतत सावधान रहना चाहिये। मनुष्य कर्म करनेमें स्वतन्त्र है, यह बात सर्वज्ञ ईश्वरद्वारा अनुमोदित है ही। इसलिये वह जो कुछ भी करेगा, वही सर्वज्ञकी दृष्टिमें पहलेसे है—ऐसा माना जा सकता है। सर्वज्ञने कब किससे क्या करवानेका निश्चय कर रखा है, यह बात किसीको भी ज्ञात नहीं है। अत: जो न्यायोचित शास्त्रीय कर्तव्य है, उसके लिये चेष्टा करना सभीको उचित है। मनुष्यका ऐसा स्वभाव बना दिया गया है कि वह कर्म किये बिना रह ही नहीं सकता—

न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।

उसका स्वभाव उसे चुपचाप बैठने न देगा। भगवान‍्ने जो पहलेसे निश्चय कर रखा है, वही होगा और वह अपने-आप हो जायगा—यों विचारकर कोई भी हाथ-पर-हाथ धरे बैठा रह सके, यह सम्भव नहीं है। उसकी प्रकृति उसे कर्ममें लगा देगी (प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति)।

महाभारतमें कौरव-पाण्डव उभय पक्षके जिन वीरोंकी मृत्यु नियत थी, उन सबका वह भावी परिणाम भगवान‍्ने अपने विराट् रूपमें पहले ही अर्जुनको दिखा दिया। इसपर अर्जुन यह सोच सकते थे कि ‘ये सब मरेंगे तो निश्चय ही, फिर मैं क्यों इनकी हत्याका कलंक लूँ।’ पर उन्होंने अर्जुनको ऐसा सोचने नहीं दिया। उन्हें यह प्रेरणा दी गयी—‘निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।’ ‘अर्जुन! तू निमित्तमात्र हो जा।’ इसी प्रकार शास्त्रीय विधि-निषेधके द्वारा भगवान् हम सबको निमित्तमात्र बना रहे हैं। अर्जुनको निमित्त बनना पड़ा। हमको भी भावीमें जो सुनिश्चित है, उसके लिये निमित्त बनना ही पड़ेगा। ‘हम निमित्तमात्र ही हैं, वास्तवमें भगवान् स्वयं सब कुछ कर रहे हैं, करवा रहे हैं’—यह भावना दृढ़ रहे तो हमें उन कर्मोंका बन्धन भी नहीं लगेगा। मनुष्य बँधता है ममता और अहंकारके कारण, कर्म और उसके फलमें आसक्ति तथा कामनाके कारण। यदि ईश्वरप्रीत्यर्थ ही सब कुछ किया जाय अथवा अपनेको निमित्तमात्र मानकर अपने ऊपर कर्तृत्वका अभिमान न लादा जाय तो कोई भी कर्म मनुष्यको बाँध नहीं सकता। अत: सब कुछ सर्वज्ञ ईश्वरकी सुनिश्चित इच्छाके अनुसार होनेपर भी हम सबका यही कर्तव्य है कि हम भगवत्प्रीतिके उद्देश्यसे शास्त्रीय सत्कर्मोंके अनुष्ठानमें ही संलग्न रहें।

(२) यह ठीक है कि मरे हुए पिता-पितामह आदि जहाँ जिस योनिमें जन्म पाते हैं, वहाँ उन्हें कर्मानुसार अन्नपान आदि तो प्राप्त होता ही है। फिर भी पुत्र-पौत्रादिका कर्तव्य है, उनके लिये श्राद्ध करें। श्राद्धमें दी हुई वस्तु उन पितरोंको, जहाँ जिस योनिमें भी वे रहते हैं, योग्यतानुसार प्राप्त होती है और उन्हें तृप्त करती है। श्राद्धके तीन देवता हैं, जो नित्य एवं सर्वव्यापी हैं। उनके नाम हैं—वसु, रुद्र और आदित्य। वसु पिताके स्वरूप हैं। रुद्र पितामहके प्रतिनिधि हैं और आदित्य प्रपितामहके प्रतीक हैं। श्राद्धमें जब पितरोंका आवाहन होता है, तब जो आ सकते हैं वे पितर भी आते हैं, नहीं तो ये ही लोग उपस्थित होते हैं; ये पुत्रादिद्वारा अर्पित किये हुए सत्कार, मान, पूजा, श्राद्धान्न आदि सब स्वयं ही ग्रहण करते हैं और वह सब ले जाकर मनुष्यके पितरोंके पास पहुँचा देते हैं। वे अपने ज्ञान और शक्तिसे भलीभाँति जानते हैं कि किसके पिता, पितामह आदि कहाँ किस रूपमें उत्पन्न हुए हैं; अत: उनके पास वे अनायास पहुँच जाते हैं और वह श्राद्धीय वस्तु उनको अर्पित करते हैं। यदि वे पितर मनुष्येतर स्थूल योनिमें या स्वर्ग-नरकादिके देव या पितृ-शरीरमें हैं तो वहाँके शरीरके अनुरूप खाद्य प्रस्तुत करके ये उन्हें तृप्त करते हैं। इस प्रकार श्राद्धद्वारा तृप्त किये हुए वसु आदि देवता मनुष्यके पितरोंको तो पूर्ण तृप्त करते ही हैं, श्राद्धकर्ताको भी उसके भाव तथा श्रद्धाके अनुसार आयु, संतान, धन, विद्या, सुख, राज्य, स्वर्ग और मोक्ष आदिकी प्राप्ति कराते हैं। ऊपर जो कुछ कहा गया, इसका समर्थन याज्ञवल्क्य-स्मृतिके निम्नांकित वचनोंसे होता है—

वसुरुद्रादितिसुता: पितर: श्राद्धदेवता:।

प्रीणयन्ति मनुष्याणां पितॄन् श्राद्धेन तर्पिता:॥

आयु: प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च।

प्रयच्छन्ति तथा राज्यं प्रीता नॄणां पितामहा:॥

(आचाराध्याय २६९-२७०)

आपने श्राद्धके विषयमें वैदिक मन्त्रके उल्लेखका भी अनुरोध किया है। श्राद्धविषयक वैदिक मन्त्र अनेक हैं। यहाँ स्थानाभावके कारण केवल एक मन्त्र दिया जाता है—

आयन्तु न: पितर: सोम्यासोऽग्निष्वात्ता: पथिभिर्देवयानै:। अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधिब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान्॥

(यजुर्वेद १९। ५८)

‘हमारे सोमपानके अधिकारी ‘अग्निष्वात्त’ पितर देवयानमार्गसे आयें और इस यज्ञमें स्वधा (श्राद्धान्न)-से तृप्त होकर हमें मानसिक उपदेश एवं आशीर्वाद दें।’

(३) गीतामें भगवान‍्ने कहा है—

श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्ध: स एव स:।

‘पुरुष श्रद्धामय होता है, जिसकी जैसी श्रद्धा होती है, वह वैसा ही होता है। इसके अनुसार सात्त्विक श्रद्धासे सम्पन्न पुरुष सात्त्विक होता है। अतएव उसकी ऊर्ध्वगति हो सकती है; क्योंकि ‘ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था:’ यह गीताका सिद्धान्त है। इसी प्रकार तामसी श्रद्धावाला मनुष्य तमोगुणी होनेके कारण अध:पतनको प्राप्त हो सकता है। यहाँ मनुष्यके स्वभावगत श्रद्धाकी बात कही गयी। जहाँ श्रद्धारहित कर्मको निष्फल बताया गया है (न च तत्प्रेत्य नो इह), वहाँ उत्तम श्रद्धाका क्रियाके साथ योग न रहनेपर वह कर्म निष्फल होता है—ऐसा अभिप्राय समझना चाहिये। सात्त्विक श्रद्धाका योग न होनेपर कर्म निरर्थक हो जाता है। यदि राजसी या तामसी श्रद्धाका योग हो जाय तब तो राजस-तामसभावके अनुसार फल अवश्य होगा। हवन, दान, यज्ञ, तप, जप आदि कर्म सात्त्विक श्रद्धासे ही किये जाने चाहिये। तामसी श्रद्धावालेकी तो इसमें प्राय: प्रवृत्ति ही नहीं होगी। हुई भी तो विधिका पालन न हो सकेगा। आप कहते हैं श्रद्धारहित कर्म हो ही नहीं सकता; किंतु जगत‍्में श्रद्धारहित कर्म भी होता देखा जाता है। कोई किसी दबाव या संकोचके कारण भी सत्कर्म करता है। भीतरसे उस कर्ममें उसकी रुचि या श्रद्धा नहीं होती। यही अश्रद्धाकृत कर्म है। छान्दोग्योपनिषद्की श्रुतिमें भी श्रद्धाकृत कर्मकी ही श्रेष्ठता बतायी गयी है। इससे और गीताके वचनसे कोई विरोध नहीं है। शेष भगवत्कृपा।