पाप-पुण्यकी परिभाषा

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपके प्रश्नोंका उत्तर निम्नलिखित है—

(१) पाप और पुण्य कौन हैं? इनको गिनकर नहीं बताया जा सकता। हिंदू-धर्मशास्त्रोंमें—वेद आदिमें जो कर्म करनेयोग्य बताया गया है, वह पुण्य है तथा जिसको निषिद्ध कहा गया है, वह पाप है। कभी-कभी मानसिक भावके भेदसे पुण्यकी क्रिया भी पाप बन जाती है। जैसे जप-तप बड़े पुण्यका कर्म है; परंतु वह किसीका प्राण लेनेके उद्देश्यसे किया जाय अथवा अपनेको पुण्यात्मा बताकर किसीको ठगनेके लिये किया जाय तो देखनेमें ऊपरसे पुण्यकर्म होनेपर भी वह वास्तवमें पाप हो जाता है। इसी प्रकार झूठ बोलना वस्तुत: पाप है; परंतु किसी निर्दोषकी प्राण-रक्षाके लिये झूठ बोलनेकी आवश्यकता हो तो वहाँ झूठ भी पुण्य बन जाता है। व्यासजीने सम्पूर्ण शास्त्रोंका आलोडन करके एक-एक वाक्यमें पाप और पुण्यकी परिभाषा बतलायी है—

परोपकार: पुण्याय पापाय परपीडनम्॥

‘दूसरोंका भला करना पुण्यका काम है और दूसरोंको कष्ट पहुँचाना पापका कार्य है।’

या यों कहिये कि जिस कर्मसे अपना और दूसरोंका परिणाममें अहित होता हो, वह पाप है और जिससे परिणाममें दोनोंका हित होता हो, वह पुण्य है।

यही पाप-पुण्यकी परखका सारभूत सिद्धान्त है। इसे सदा स्मरण रखना चाहिये।

(२) भोजनके सम्बन्धमें हिंदू-धर्मशास्त्रोंने बहुत सावधान रहनेकी राय दी है। हमारे भोजन और पानसे ही मन-प्राणकी पुष्टि होती है। कहावत है, ‘जैसा अन्न, वैसा मन।’ हमारे खाये हुए अन्नका जो सारतम अंश है, उसीसे मन बनता है। मन ही समस्त इन्द्रियोंका प्रेरक है; अत: मन ठीक न रहे तो हमारे शरीर और इन्द्रियोंके द्वारा कोई उत्तम कार्य हो ही नहीं सकता। परमार्थसाधनमें मनकी शुद्धिपर बहुत अधिक जोर दिया गया है। अशुद्ध मनसे ज्ञान या भक्ति—किसी भी साधनमें यथार्थ तथा पूर्ण सफलता नहीं होती। सिद्धिका दूसरा नाम ही मन:शुद्धि है। मन तभी शुद्ध रहता है, जब आहार शुद्ध हो—‘आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धि:।’ आहार वही शुद्ध है, जो शुद्ध न्यायपूर्ण जीविकाद्वारा उत्पादित अन्नसे बना हो, सात्त्विक हो, भोजननिर्माणमें भी बाह्य शुद्धि और आन्तरिक शुद्धिके नियमोंका यथावत् पालन किया गया हो। आजकल चौका-चूल्हाको ढकोसला बताया जाता है; परंतु कितने ही अदृश्य भूतादि प्राणी, जो आतिवाहिक देहोंमें या वायुप्रधान प्रेत-शरीरमें रहते हैं, भूखके कारण प्रत्येक अन्नपर दृष्टि रखते हैं। अपवित्र स्थानोंमें उनका बल स्वभावत: बढ़ता है। अत: वे अपवित्र स्थानमें अपवित्रतापूर्वक तैयार किये हुए अपवित्र अन्नको अपनी दृष्टि और स्पर्शसे भी दूषित कर देते हैं। ऐसे अन्नके भोजनसे आध्यात्मिक पवित्रता तो नष्ट होती ही है, अनेक प्रकारके रोगोंका भी आक्रमण होता है। जहाँ रसोईघर साफ-स्वच्छ, धुला या लिपा-पुता हो, बनानेवाला शुद्ध, सदाचारी, प्रेमीहृदय एवं बाह्य शुद्धिसे भी सम्पन्न हो, अन्न भी न्यायत: उपार्जित हो, वहाँ इन अदृश्य भूतादिकोंका प्रवेश नहीं होता। जहाँ भगवन्नामका कीर्तन होता है, स्वाहा-स्वधाके स्वर गूँजते हैं, वहाँसे भूत-प्रेतादि भाग जाते हैं। ऐसे घरोंका अन्न स्वभावत: पवित्र होता है। भगवान‍्को भोग लगाया गया हो, बलिवैश्वदेव कर्म करके देवता और अतिथिका प्राप्य भाग निकाल दिया गया हो, वह अन्न यज्ञशिष्ट है; उसे अमृतके समान हितकर बतलाया गया है। उसके भोजनसे आयु और आरोग्यकी वृद्धि होती है। बड़ी जातिका आदमी छोटी जातिके हाथका अन्न खा ले तो क्या लाभ-हानि है? यह आपका प्रश्न है। जातियाँ सभी अपने-अपने स्थानपर बड़ी हैं। छोटाई-बड़ाई केवल अवस्थाको लेकर है। ब्राह्मण पहले पैदा हुए तो वे ‘अग्रज’ कहलाते हैं। जो सबसे अन्तमें उत्पन्न हुए थे, वे ‘अन्त्यज’ कहलाये। चारों वर्णोंके लोग अपने-अपने स्थानपर उतना ही महत्त्व रखते हैं। उनके कर्म अलग-अलग हैं। उन कर्मोंको असंख्य पीढ़ियोंसे करते रहनेके कारण उनकी रग-रगमें वैसे ही संस्कार व्याप्त रहते हैं। अत: रहन-सहन और खान-पानमें भी उसका प्रभाव पड़े बिना नहीं रह सकता। ऐसी दशामें उचित यही है कि सभी वर्ण या वर्गके लोग अपने समान वर्णवाले लोगोंके साथ ही खान-पान आदिका सम्बन्ध स्थापित करें। समान वर्णवालोंमें भी जो संक्रामक रोगोंके शिकार हों, उनके साथ सबका बैठना उत्तम नहीं है। इस प्रकार विचारपूर्वक भोजन आदिमें सावधानी बरतनेसे सबके तन-मन स्वस्थ रह सकते हैं। आजकल सभी वर्णके लोगोंमें रोटी-बेटीका सम्बन्ध चालू करनेका प्रयत्न हो रहा है। कुछ लोग जात-पाँतकी मर्यादाके पीछे ही कुठार लेकर पड़ गये हैं। यह स्थिति बड़ी भयंकर है। इससे हिंदू-समाजमें जो एक परम पावन संस्कृतिकी अजस्र धारा प्रवाहित होती चली आ रही है, उसमें आधुनिक सुधारवादकी ये अविवेकमूलक प्रवृत्तियाँ गंदे नालेका काम करेंगी। प्रत्येक विचारशीलको ऐसी प्रवृत्तियोंसे बचनेकी चेष्टा करनी चाहिये।......विशेष प्रभुकी कृपा।