प्रारब्ध और पुरुषार्थ
सादर हरिस्मरण।.......आपने अपने एक मित्रके साथ वाद- विवादका उल्लेख करते हुए मेरा निर्णय पूछा है, सो मेरे विचारसे तो आप दोनोंकी बात मिला देनेपर ठीक निर्णय हो जाता है। जीव केवल पूर्व प्रारब्धका ही भोग करता है, ऐसा भी नहीं कह सकते और यह भी नहीं कहा जा सकता कि वर्तमान और भावी जन्म पूर्वकर्मजनित प्रारब्धका भोग करानेके लिये ही होते हैं। यह नियम है कि प्रत्येक भोग किसी-न-किसी पहले किये हुए कर्मका परिणाम होता है। भले वह कर्म इस जन्ममें हुआ हो अथवा पूर्ववर्ती जन्मोंमें। इस नियमके अनुसार इस जन्ममें हम अधिकांश तो अतीत जन्मोंमें किये हुए कर्मोंका ही फल भोगते हैं, किंतु यदि इस जन्ममें भी कोई उत्कट पाप या पुण्य किये जायँ तो उनके फल इसी जन्ममें भी भोगे जा सकते हैं। आगामी जन्मोंमें भी हमें इस जन्मके तथा इससे पूर्ववर्ती जन्मोंके संचित कर्मोंके फल भोगने होंगे। इस प्रकार पूर्वकृत कर्मोंसे वर्तमान एवं आगामी भोग तथा नवीन कर्मोंसे नवीन प्रारब्ध एवं संचित कर्मोंका निर्माण होता रहता है और इस कर्म एवं भोगकी परम्पराके अनुसार नवीन जन्म-परम्पराका प्रवाह चलता रहता है।