प्रियतमका मधुर मिलन
आत्महत्या, जो घोर पाप माना गया है, उसका कारण बिना कर्मफल भोग किये शरीर त्यागना नहीं है; बल्कि वह दूषित मनोवृत्ति है, जो मनुष्यको आत्महत्यामें प्रवृत्त करती है। प्राय: सभी आत्महत्याएँ मानसिक उद्वेग, आत्मग्लानि, क्रोध आदि तामसी मतिके ही कारण होती हैं। धर्म, प्रेम या कर्तव्य-पालनके उद्देश्यसे जो मृत्युको आलिंगन किया जाता है, वह किसी प्रकार अधोगतिका कारण नहीं हो सकता। इसी कारण युद्धमें मारा जाना, पतिके साथ सती होना, सतीत्व-रक्षा, धर्मपालन, देश-रक्षा और दुर्बलकी रक्षा आदिके लिये प्राणोंका बलिदान कर देना अथवा भगवद्विरह असह्य होनेपर सहज ही प्राण-परित्याग करना, सब प्रकार श्रेयस्कर ही माना गया है। आपने इस प्रकारके प्राणत्यागकी जो रूपरेखा खींची है, वह कदापि उपयुक्त नहीं मालूम होती। केवल हठ या आग्रहके द्वारा न तो अन्त समयमें भगवदाकार वृत्ति ही हो सकती है और न सात्त्विकताका ही उदय हो सकता है। भगवद्विरहमें प्राण त्यागनेकी कोई विशेष विधि नहीं बतायी जा सकती। यह तो एक ऐसी दुर्लभ स्थिति है, जो परम सौभाग्यसे किन्हीं उत्कट प्रेमियोंको स्वत: ही प्राप्त होती है। इसमें विधि-निषेधकी गति नहीं है। प्रेमीका काम तो प्रियतमकी स्मृति बढ़ाते हुए उसकी विरहवेदनाको तीव्र करना ही है। जब वह वेदना असह्य हो जाती है, तब प्रियतमके लिये भी दूर रहना कठिन हो जाता है। उन्हें या तो स्वयं आना पड़ता है या वे उसे ही अपने पास बुला लेते हैं। प्रियतमके उस मधुर आवाहनसे प्रेमी शरीरको तृणवत् त्यागकर भगवद्धाममें प्रवेश कर जाता है। इसे आत्महत्याका नाम देना तो भारी अपराध ही है। यहाँ न कोई मरनेवाला है न मारनेवाला। यह तो प्रियतम और प्रेमीका मधुर मिलन है।