पुरानी बुरी आदत कैसे छूटे?

सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपकी वृद्धावस्था होनेपर भी लड़कपनके अभ्यासवश आपमें एक बुरी आदत है और उसके न छूटनेसे आप दु:खी हैं, सो यह दु:ख तो उत्तम ही है। अपनी बुराईके लिये मनुष्यके मनमें दु:ख होने लगे और बहुत प्रबल हो जाय तो बुराई छूट जाती है। इस आदतके छूटनेका असली उपाय है—‘भगवान‍्की कृपाके बलपर मनमें दृढ़ निश्चय करना कि अब आगेसे इस कामको कभी नहीं करूँगा।’ मनुष्यके निश्चयमें कमी रहती है और आत्मबलपर अविश्वास रहता है, इसीसे बुरी आदत नहीं छूटती। मेरे एक परिचित स्वर्गीय वृद्ध सज्जनने एक ही दिनमें तमाखू पीनेकी ही नहीं, अफीम खानेकी बरसोंकी पुरानी आदत छोड़ दी थी। उनके मनमें दृढ़ निश्चय था, इसलिये उनका कुछ नहीं बिगड़ा। न फिर वे अपनी प्रतिज्ञासे टले ही। मनुष्य मनमें अधूरा-सा निश्चय करता है, इसीसे प्रसंग सामने आनेपर वह डिग जाता है, आसक्ति उसको दबा लेती है।

दूसरी बात है—‘मनमें ऐसे विषयोंके प्रति विष-बुद्धि हो जाना।’ ऐसा हो जानेपर उक्त विषयका ग्रहण नहीं होता। संखिया विष है—यह निश्चय है; इसलिये किसी खाद्य पदार्थमें—जो देखनेमें सुन्दर और खानेमें सुस्वादु भी हो—संखियाका सन्देह होनेपर भी हम उसे नहीं खाते। इसी प्रकार विषयोंमें विष-बुद्धि हो जानेपर उनका त्याग हो जाता है।

इसीके साथ-साथ सर्वशक्तिमान् परम सुहृद् श्रीभगवान‍्से प्रार्थना करनी चाहिये। प्रार्थनाके बलसे पापबुद्धिका नाश बहुत सहजमें किया जा सकता है। नाम-जपका अभ्यास कीजिये और प्रार्थना कीजिये। इन उपायोंको करके देखिये। मुझे तो आशा है कि इनसे आपकी आदत छूटनेमें अवश्य सहायता मिलेगी।