पुराणोंकी वास्तविकता
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। हमारे पुराण-इतिहासोंके बारेमें आजकलके पढ़े-लिखे लोगोंकी जो धारणा है, उससे मेरा मत नहीं मिलता। मैं तो इनमें लिखी एक-एक बातको सच मानता हूँ। सर्वत्यागी ऋषि-मुनियोंको कौन-सा स्वार्थ था जो किसी उद्देश्य-विशेषको लेकर पक्षपातपूर्ण या असत्य बातें लिखते। इसीसे हमारे पुराणेतिहासोंमें कुछ ऐसी बातें भी आ गयी हैं, जो निन्दनीय हैं; परंतु सच्चा इतिहास लिखनेवाले महापुरुष अपनी निन्दाके भयसे निन्दनीय बातको छिपायें क्यों? उन्हें किसीसे प्रशंसापत्र तो लेना ही नहीं है। यह सत्य है कि हमारे शास्त्रीय वचनोंके आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक—ये तीनों अर्थ होते हैं, परंतु उनका आध्यात्मिक अर्थ करके उन्हें कल्पना बता देना नितान्त अन्याय है। हमारे भारतीय विद्वान् भी दूसरोंका चश्मा चढ़ा लेनेके कारण पुराणवर्णित प्रसंगोंका कल्पित अर्थ करते हैं और उसीमें गौरव मानते हैं। इसका कारण है विचित्र रचना करनेवाली प्रकृतिको और लोकोत्तर महापुरुषोंके विविध-विचित्र चरित्रोंको न समझना एवं विदेशी विद्वानोंके प्रभावमें पड़कर उन्हें कल्पना मान लेना। आपने जो कल्पना की है, वह भी ऐसी ही है। जबतक हवाईजहाज नहीं बने थे, तबतक हम पुराणोक्त विमानोंकी चर्चाको लोक-कल्पना ही मानते थे। मेरी समझसे तो पुराणेतिहासोंपर विश्वास करके श्रद्धापूर्ण दृष्टिसे ऋषि-मुनियोंके द्वारा आचरित साधनोंका आश्रय लेकर पुराणेतिहासोंके तथ्योंका अनुसन्धान करना उचित है, तभी उनके वास्तविक रहस्यको हम जान सकेंगे। निरे कौतूहलसे संदिग्ध हृदयसे या उनके मिथ्या कल्पित होनेके दृढ़ निश्चयको लेकर जो अनुसंधान-अन्वेषण होगा, वह तो सत्यके स्थानपर मिथ्याको ही प्रतिष्ठित करेगा। यह मेरा नम्र मत है। मैं यह मानता हूँ कि पुराणोंमें विद्वानोंने कुछ घटाया-बढ़ाया है, पर उससे पुराणोंकी वास्तविकतापर कोई सन्देह नहीं होता। आप विद्वान् हैं, आपको जो उचित तथा सत्य जान पड़े, उसीके अनुसार करना चाहिये। शेष भगवत्कृपा।