रोगको मारो, रोगीको नहीं
सादर हरिस्मरण! आपका कृपापत्र मिला। समाचार पढ़नेपर आपके मनकी स्थितिका कुछ पता लगा। उत्तरमें निम्नलिखित निवेदन है—
कहते हैं—एक मनुष्य किसी कामनासे भगवान् शंकरजीकी आराधना करता था। भोलानाथ प्रसन्न हुए और एक दिन स्वप्नमें उसे दर्शन देकर बोले—‘देख, मैं तेरी आराधनासे प्रसन्न हूँ। तू चाहे सो मुझसे माँग ले। पर तेरा पड़ोसी मेरी बहुत दिनोंसे बड़ी सेवा कर रहा है। उसको मैं विशेषरूपसे देना चाहता हूँ। अत: तुझे मुझसे जो कुछ मिलेगा, उससे दुगुना उसे मिल जायगा। दोनोंकी सेवाका फल साथ ही देकर मैं तुम दोनोंको सुखी करना चाहता हूँ। अब जो जीमें आवे, सो माँग ले।’ वह आदमी वरदानकी बात सुनकर तो बड़ा प्रसन्न हुआ था, पर पड़ोसीको दुगुना मिल जायगा—इस बातसे उसे बड़ी निराशा हुई। वह मन-ही-मन विचारने लगा, ‘क्या माँगूँ?’ करोड़ रुपये माँगता हूँ, तो पड़ोसीको दो करोड़ मिलते हैं। एक पुत्र माँगता हूँ, तो उसे दो मिल जाते हैं। संसारमें कीर्ति माँगता हूँ तो उसकी कीर्ति मुझसे दूनी हो जाती है। वह बड़े असमंजसमें पड़ा। अन्तमें उसकी दुर्मतिने उसको सुझाया, ‘तेरे दो आँखें हैं, एक फूट जायगी तो एकसे ही देख सकेगा, तेरा काम चलनेमें कोई विशेष बाधा नहीं आयेगी, पर उसकी दोनों आँखें फूट जायँगी तो वह बिलकुल बेकाम हो जायगा। अत: भगवान्से यही वर क्यों न माँग ले कि आप कृपा करके मेरी एक आँख फोड़ दीजिये।’ उसने अपने निश्चयके अनुसार ही वर माँगा और दूसरेकी दोनों आँखें फूट जायँ, इस नीच अभिसन्धिसे अपनी एक आँख खोनेको राजी हो गया। आज हमारी भी यही दशा है। इसीसे लोग कहते हैं कि ‘हमारा कुछ भी नुकसान हो जाय, पर उसका तो सत्यानाश करके ही छोड़ेंगे।’ मनुष्यके स्वभावमें यह एक महान् दोष आ गया है कि वह जितना अपना भला चाहता है, उससे कहीं अधिक दूसरेका बुरा चाहता है। बल्कि अपना बुरा करके भी कभी-कभी तो द्वेषवश अपने भलेको सर्वथा भुलाकर दूसरेका विशेष बुरा करना चाहता है। परिणामत: वैर-विरोध बढ़ जाता है और दोनोंका ही बुरा होता है।
यह बात सदा याद रखनी चाहिये कि जिस कर्मसे दूसरेका परिणाममें अहित होता है, उससे अपना कभी हित हो ही नहीं सकता; फिर जहाँ दूसरेके अहितके प्रलोभनमें अपना प्रत्यक्ष अहित किया जाता है, वहाँ तो अपने हितका कोई सवाल ही नहीं रहता। यह महामोह है और खेद है कि आप आज इसी महामोहमें फँसे हैं। केवल आपकी ही यह स्थिति नहीं है, इस ‘अर्थ’ और ‘अधिकार’ के कर्तव्यहीन अन्धकारयुगमें प्राय: अधिकांश लोगोंकी यही मनोदशा है; पर यह है बड़ी ही भयानक स्थिति। इससे अपना और दूसरोंका सभीका बुरा होता है।
कई लोग भूलसे ऐसा भी मान बैठते हैं कि ‘हम तो दूसरेके हितके लिये ही उसे दण्ड देना चाहते हैं, जिसको उसका अहित करना समझा जाता है।’ पर इसमें भी दोष ही है।
मनमें द्वेषकी भावना रखकर जब किसीको दण्ड दिया जाता है, तब जान-अनजानमें यही इच्छा रहती है कि उसको अधिक-से-अधिक कष्ट हो और इसलिये उसे यथासाध्य अधिक-से-अधिक बुरे रूपसे सताया जाता है और फिर उसे महान् कष्ट भोगते देखकर चित्तमें प्रसन्नता होती है। यह हितके लिये दिया जानेवाला दण्ड नहीं है, यह घोर हिंसा है या तीव्र प्रतिहिंसाका कार्य है। हिंसा या प्रतिहिंसासे कभी किसीका हित नहीं होता। हम आज जिसे मारते हैं, वही कल दूसरा शरीर पाकर हमें मारनेको प्रस्तुत होगा। असलमें हमने उसको दोषी माननेमें ही भूल की। वह दोषी नहीं था। दोष था उसके मानस रोगोंका, जिनके वशमें होकर वह बुराई कर रहा था और जिनके वशमें होनेके कारण ही आज हम भी उसके हितके नामपर वही बुराई कर रहे हैं। जैसे शारीरिक रोग होते हैं, वैसे ही मानस रोग भी होते हैं। शरीरके कठिन-से-कठिन रोग तो मरनेके साथ ही मर जाते हैं, शरीर छूटनेके साथ ही छूट जाते हैं; परंतु काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, मत्सरता, ईर्ष्या, द्वेष, हिंसा और वैर आदि मानस रोग तो मरनेपर भी जीवके साथ ही जाते हैं। हमने यदि किसीको दण्ड देनेके नामपर उसमें इन रोगोंको बढ़ाया तो आगे चलकर इस जन्ममें या अगले जन्ममें हमारे और समाजके लिये वह और भी भयानक साबित होगा। इसलिये मेरी रायमें तो आपको उनके साथ प्रेमका व्यवहार करके उनके मानस रोगोंको मारनेकी चेष्टा करनी चाहिये। ऐसा न हो सके तो कम-से-कम उदासीन रहकर मन-ही-मन उनमें प्रेम करना चाहिये तथा उनके मानस रोगोंके नाशके लिये प्रतिदिन नियमितरूपसे दृढ़ संकल्प करना तथा भगवान्से प्रार्थना करनी चाहिये। रोगको मारना चाहिये, रोगीको नहीं। इसीमें अपना और समाजका मंगल है।
आशा है, इससे आपको कुछ राह सूझेगी और यदि ऐसा हुआ तो मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी।