सबके एकमात्र गुरु श्रीभगवान् ही हैं
प्रिय महोदय! सादर सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र यथासमय मिल गया था। उत्तरमें देर हुई, कृपया क्षमा करें। आपने जो प्रश्न पूछे हैं उनके विषयमें मेरे जैसे विचार हैं, नीचे निवेदन करता हूँ—
(१) हिंसाका अर्थ है किसी प्राणीको कष्ट पहुँचाना। किसीके प्राण हर लेनेको भी इसीलिये हिंसा कहते हैं; क्योंकि उससे भी उसे कष्ट पहुँचता है। अत: जीवात्मा अमर होनेपर भी जीवको कष्ट पहुँचनेके कारण किसीको मारना हिंसा ही है? पेड़ और वनस्पतियोंमें जीवात्मा अवश्य है, परंतु वह सुषुप्ति-जैसी अवस्थामें है। उसीसे वृक्षोंमें बढ़ना, हरा होना और सूखना आदि विकार तो होते हैं, किंतु अन्य जीवोंकी तरह सुख-दु:खका अनुभव उन्हें उतना नहीं होता। वे घोर तमोगुणकी स्थितिमें रहते हैं। अत: वृक्षादि काटना उस कोटिकी हिंसा नहीं है जैसी जंगम प्राणियोंको कष्ट पहुँचाना है। तथापि हरे वृक्षको काटना सर्वथा निर्दोष नहीं माना जाता। जीवन-निर्वाहमें अनिवार्य होनेके कारण जहाँ विशेष आवश्यकता हो, वहीं हरा वृक्ष काटना क्षम्य हो सकता है।
(२) सत्यनारायणजीकी जो कथा प्रचलित है, मुझे तो उसीका पता है। वास्तवमें वह श्रीसत्यनारायणजीके पूजन और व्रतका माहात्म्य है। कथा सुननेकी अपेक्षा भी उसमें बताये हुए क्रमसे पूजन और व्रत करना विशेष महत्त्व रखते हैं। ‘यह असत्य बनाकर कही जाती है’ ऐसा आपने कैसे निश्चय कर लिया!
(३) कल्याणके मानसांकमें ‘रामार्चापद्धति’ विषयक एक लेख है। उसमें श्रीरामजीके पूजनकी विशेष पद्धति दी है। राम-मन्त्र-जपकी विधि देखना चाहें तो १२ वें वर्षके कल्याणके १०वें अंकमें ‘कुछ उपयोगी मन्त्र और उनकी जपविधि’ शीर्षक लेखमें देखनेकी कृपा करें। श्रीरामोपासनाकी विधि ‘रामपूर्वतापिनी-उपनिषद्’ तथा अन्य कई ग्रन्थोंमें मिल सकती है।
(४) यह कोई नियम नहीं है कि आजकल अधर्म करनेवाले ही ऐश्वर्यवान् देखे जाते हैं। हाँ, ऐसा तो कह सकते हैं कि ऐश्वर्यवान् लोग प्राय: अधिक अधर्म करते हैं। यह उनका प्रमाद है। इसका दुष्परिणाम उन्हें इस या आगामी जन्ममें भोगना पड़ेगा। उन्हें जो ऐश्वर्य मिला है, वह तो उनके पूर्वपुण्यका ही परिणाम है। भक्त या धार्मिक पुरुष तो कभी दु:खी नहीं होते। यदि लौकिक दृष्टिसे उनकी स्थिति अच्छी नहीं होती तो उसे भी वे तो प्रभुका न्यायोचित विधान ही मानते और सब प्रकारकी विपरीतताओंका भी सहर्ष स्वागत करते हैं।
(५) जैसा व्यवहार हम अपने साथ पसंद नहीं करते, वैसा दूसरोंके साथ करना ही पाप है। इसके मूलमें स्वार्थ रहता है। अत: इससे बचनेका उपाय भी यही है कि हम स्वार्थ त्यागकर कोई भी ऐसी क्रिया न करें जो हम दूसरोंके द्वारा अपने प्रति की जानी पसंद नहीं करते। जिसके परिणाममें अपना और दूसरोंका अहित हो, वही पाप है। संक्षेपमें यही पापकी परिभाषा है।
(६) वेद आजकल भारतवर्षमें भी हैं और भारतसे बाहर भी। ये अनेकों नगरोंके बड़े-बड़े पुस्तकालयोंमें मिल सकते हैं। आप यदि देखना चाहें तो किसी बड़े पुस्तकालयमें जाकर देख सकते हैं।
(७) जबतक बाह्य विषयोंमें आसक्ति रहती है, तबतक भजनमें मन नहीं लगता। यदि भगवान्का भजन करना है तो सांसारिक वस्तुओंका भजन छोड़ना पड़ेगा। भजनमें मन लगनेका मूल सिद्धान्त तो यही है। जितना इधरसे छोड़ेंगे उतने ही उधर जुड़ेंगे।
(८) सबके गुरु तो एकमात्र श्रीभगवान् ही हैं। किसी महात्मा या संतके रूपमें भी वे ही पथ प्रदर्शन करते हैं। अत: उन्हींको गुरु मानकर शास्त्रादेशके अनुसार साधन करना चाहिये। साधनमें सच्ची लगन होगी तो आवश्यकता होनेपर संतरूपमें भी वे स्वयं ही आ जायँगे। जो किसी भी प्रकार भक्ति या साधन करता है, उसका अकल्याण तो किसी प्रकार नहीं हो सकता; अत: साधन छोड़नेकी तो किसी भी अवस्थामें आवश्यकता नहीं है।
(९) हिंदुओंके ही नहीं, संसारमें किसी भी धर्मके शास्त्र मानवीय कल्पना नहीं कहे जा सकते। कल्पना तो प्रत्यक्ष ही होती है। उनका अनुसरण भला कौन करेगा। शास्त्र तो ईश्वरीय ज्ञान होते हैं और वे विशिष्ट अधिकार-सम्पन्न संतोंके हृदयमें प्रकट होते हैं। आशा है, इन पंक्तियोंसे आपको कुछ संतोष हो सकेगा। शेष भगवत्कृपा।