सनातन वर्णाश्रमधर्म
प्रिय महोदय! सादर सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। आपका यह लिखना ठीक है कि ‘इस समय वर्णाश्रमधर्म अपने वास्तविक एवं विशुद्ध रूपमें उपलब्ध नहीं हो रहा है।’ ब्राह्मण आदि सभी वर्णोंने अपने वर्णाश्रमोचित कर्तव्योंका प्राय: परित्याग कर दिया है। प्राय: सबमें कर्मसंकरता आ गयी है। जीवनका एकमात्र मुख्य उद्देश्य भगवत्प्राप्ति अथवा मुक्ति है—इसको भुला दिया गया है। धन और भोगसामग्रीके विपुल संग्रहमें और पद-अधिकारकी प्राप्तिमें ही पौरुषकी सफलता मानी जाने लगी है। इसमें वर्तमान युगकी धर्महीन शिक्षा और पाश्चात्योंके कुसंगका भी प्रभाव काम कर रहा है। साथ ही आपके कथनानुसार वर्तमान कथित जनतन्त्र सरकारकी वर्गहीन समाज-रचनाके प्रयत्नसे भी वर्ण-धर्मकी अपेक्षा वृत्तिको अधिक प्रोत्साहन मिलने लगा है।
ऐसी दशामें वर्णाश्रमधर्मके प्रति आस्था रखनेवाले सनातनधर्मी लोगोंको क्या करना चाहिये? यह एक विचारणीय प्रश्न हो गया है। कहा जाता है कि ‘समयकी गतिके साथ चलनेमें ही सबका कल्याण है। जब नदियोंमें बाढ़ आती है, तब तटपर स्थित बड़े-बड़े प्राचीन मन्दिरों और मकानोंको भी वह बहा ले जाती है; उसकी गतिको कोई रोक नहीं सकता। नूतन युगकी नूतन विचारधाराके इस प्रबल प्रवाहमें आज सबको बह जाना होगा। आँधीके प्रचण्ड वेगके सामने अकड़कर खड़े होनेवाले वृक्ष जड़से उखड़ जाते हैं और उसके समक्ष नतमस्तक होनेवाले छोटे-छोटे पौधे बच जाते हैं। समाज और देशकी प्राचीन व्यवस्थामें अनेकों बार क्रान्तियाँ हुई हैं, परिवर्तन हुए हैं और सदा समयोपयोगी सुधार स्वीकृत किया गया है इत्यादि।’
हम यह मानते हैं कि सनातन वर्णाश्रमधर्मपर विरोधियोंद्वारा अनेकों बार आक्रमण हुए हैं; किंतु इस धर्मके पालन और संरक्षणसे ही जगत्का कल्याण होगा—ऐसा निश्चय करके धर्मानुरागी सत्पुरुषोंने सदा धर्मका ही आश्रय लिया है। जो लोग समयके प्रवाहमें निश्चेष्ट बहते हैं, बिना सोचे-समझे प्रत्येक बात मान लेते हैं, पुराना सब बुरा—‘नया सब अच्छा’ के नारोंमें बहक जाते हैं, वे और जो कुछ भी हों, बुद्धिमान् तो नहीं कहे जा सकते। विवशताकी बात दूसरी है। शक्ति और स्वतन्त्रता रहते दूसरोंकी देखा-देखी कल्याणकारी धर्ममार्गकी उपेक्षा करके सर्वथा अहितकर अशास्त्रसम्मत मार्गपर चलना अपनी ही आन्तरिक दुर्बलताका द्योतक है। बाढ़ आती है, परंतु कोई भी उसमें बह जानेके लिये स्वयं नहीं कूद पड़ता। लोग उससे बचनेके लिये बड़े-बड़े बाँध बाँधते हैं। जहाँ बाँध नहीं हैं, वहाँ भी लोग पानी बढ़ता देखकर मकानों और गाँवोंको खाली करके सामानसहित दूर हट जाते हैं। आँधीके प्रचण्ड वेगमें तिनके और पत्ते ही उड़ते हैं, बड़े-बड़े पर्वत तो उसके वेगसे हिलतेतक नहीं। बुद्धिमान् और विवेकी पुरुष सोच-समझकर शास्त्र-सम्मत कल्याणकारी धर्मको ग्रहण करते हैं। वे अशास्त्रज्ञ और यथेच्छाचारी लोगोंके बहुमतका अन्धानुकरण नहीं करते। सरकार वर्ग-विहीन समाजकी रचनाका प्रयास करती है तो करे, शुद्ध वर्गवाद मिट नहीं सकता। लाखों वर्षों पूर्वसे चला आनेवाला वर्णाश्रमधर्म बड़े-बड़े विरोधोंका सामना करके भी जो अबतक जीवित है, वही उसकी उपादेयता, अमरता और सनातन सत्ताका प्रमाण है। आज उसके नियमोंकी कुछ लोगोंके जीवनमें उपेक्षा भले ही दिखायी देती हो; उसका बीज सबके हृदयमें वर्तमान है। सबने सर्वथा वर्णाश्रमका त्याग ही कर दिया है—ऐसा नहीं कहा जा सकता। यदि वर्तमान विषाक्त वातावरणके प्रभावसे कुछ लोगोंके जीवनमें धर्मपालनकी प्रवृत्ति शिथिल दिखायी देती है तो सबके लिये वैसा ही नियम बना देना चाहिये, ऐसा सोचना तो बुद्धिमत्ता नहीं है। आजकल अधिकांश लोगोंके व्यवहारमें असत्य ही अधिक देखा जाता है, इसलिये अब सारे देशको नियमितरूपसे असत्यका अनुसरण करना चाहिये—यह कोई भी स्वीकार नहीं कर सकता। सत्य चाहे एकके भी जीवनमें न हो, सत्यका समादर कम नहीं होगा। सत्य ही मानवताका आदर्श धर्म माना जायगा! इसलिये मेरा विचार यही है कि सबको अपनी परिस्थितिके अनुसार शास्त्रीय धर्मके पालनमें ही दत्तचित्त रहना चाहिये। प्राचीन कालमें जो वर्णाश्रम-व्यवस्थाके आधारपर समाज-रचना हुई थी, वही सदा सबके लिये परम हितकर है। सबके कर्म पृथक्-पृथक् हैं। सब अपने-अपने कर्मोंका सम्पादन करके उन्नति प्राप्त कर सकते हैं। किसीके साथ प्रतिद्वन्द्विता नहीं है। वर्णाश्रमधर्मका पालन होता रहे, सब लोग अपने स्वधर्ममें संलग्न रहें—यही उत्थानका उपाय है। इसके संरक्षक भगवान् हैं। यह अमिट है—सनातन है। कालप्रभावसे लोगोंमें इसके सम्बन्धमें शिथिलता दिखायी दे सकती है, परंतु इसका नाश नहीं हो सकता।
यह ठीक है कि सभी वर्णोंके लोग आजकल नौकरी करने लगे हैं। फिर भी शूद्रकी सेवावृत्ति या श्ववृत्तिसे इसमें बहुत अन्तर है। पढ़ाना ब्राह्मणकी वृत्ति है। वह वेतन न लेकर अध्यापन करे तो बहुत उत्तम है। पर इस युगमें उस तरह निर्वाह होना कठिन है, अतएव आपद्धर्मके रूपमें वेतन स्वीकार करनेमें कोई हानि नहीं है। ब्राह्मणको चरणसंवाहन आदि सेवा नहीं करनी चाहिये। यही विशुद्ध शूद्रवृत्ति है। आप क्षत्रिय हैं तो जीविकाके लिये अपने योग्य कोई नौकरी कर सकते हैं। कृषि, गोरक्षण, वाणिज्यको अपना सकते हैं। यद्यपि यह वैश्यवृत्ति है, परंतु आपद्धर्मके रूपमें क्षत्रिय इसे कर सकते हैं। तथापि क्षत्रियका एक मुख्य धर्म है—प्रजा-रक्षण। इसे आप सदा कर सकते हैं। कोई भी कष्टमें हो, आप उसके कष्टनिवारणार्थ सहायता करें। तनसे, मनसे, धनसे, विचारसे और सहयोगसे जैसे भी बने, दूसरोंका कष्ट दूर करना प्रजा-रक्षण है। वृत्तिके रूपमें भी इसे किया जाय तो बुरा नहीं है। भूखेको अन्न, रोगीको दवा, भयातुरको निर्भयताका दान—ये सभी प्रजा-रक्षणधर्ममें आ जाते हैं। यही बात प्रत्येक वर्ण और आश्रमके लिये है। सभी अपने-अपने मुख्य धर्मका पालन कर सकते हैं। सुविधा रहते धर्मपालनमें कभी शिथिलता नहीं आने देनी चाहिये। पुलिसमें रहकर तो आप चाहें तो प्रजा-रक्षणका कार्य और भी अच्छी तरह कर सकते हैं।
धर्म भगवान्का स्वरूप है। इसका निष्कामभावसे सम्पादन किया जाय तो यह भगवान्का पूजन बन जाता है और भगवत्प्राप्ति करा देता है—
‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:।
(गीता १८।४६)
प्राचीन वर्णाश्रम-व्यवस्थाकी विशेषताको सरलतासे हृदयंगम करनेके लिये ‘कल्याण’ के गीतातत्त्वांकमें या गीता-तत्त्व-विवेचनी टीकामें १८ वें अध्यायके ४४ वें श्लोककी पाद-टिप्पणी पढ़नी चाहिये। शेष भगवत्कृपा।