सन्ध्योपासन अवश्य करना चाहिये
सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। उत्तर निम्नलिखित है—
१-गीता, रामायण, भागवत आदिका पाठ सभी कर सकते हैं, परंतु स्नान आदिके द्वारा शुद्ध होकर करना उत्तम है। प्रणवका उच्चारण स्त्री और शूद्रोंके लिये निषिद्ध है। सूतक-पातकमें भी मानस-पाठ किया जा सकता है।
२-यज्ञोपवीत-संस्कार हो जानेपर सन्ध्योपासनाके लिये जरूर समय निकालना चाहिये। मुसलमान भाइयोंको यदि नमाजके लिये समय मिल जाता है तो हमें सन्ध्याके लिये क्यों नहीं मिलेगा? असलमें अपनी गौण-बुद्धि होनेपर ही अवहेलना होती है। सन्ध्या-वन्दनको हम परम आवश्यक कार्य मान लें तो अन्य कार्योंसे इसके लिये अवकाश निकालना असम्भव नहीं है। जल आदि न मिलें तो समयपर मानसिक सन्ध्या कर लेनी चाहिये। सन्ध्या न होती हो, ऐसी अवस्थामें यज्ञोपवीत ही नहीं रखें—यह बात ठीक नहीं है। द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य)-के लिये यज्ञोपवीत धारण करना परम आवश्यक है और यज्ञोपवीत धारण करनेके बाद सन्ध्या भी करनी ही चाहिये। यदि किसी अनिवार्य कारणवश कभी सन्ध्या न हो सके तो उसका प्रायश्चित्त किया जा सकता है; परंतु इसलिये यज्ञोपवीत धारण ही न करना सर्वथा अनुचित है।
३-सन्ध्या न होनेके कारण नाम-जप, गीता-पाठ और पूजा आदि व्यर्थ होते हैं, उनका फल नहीं होता—ऐसी बात नहीं है। इनके करनेका सुफल भी होगा और सन्ध्या न करनेके कारण पाप भी। श्रेष्ठ कर्म कभी शुभ फल देनेसे नहीं चूकते।
४-सूतक-पातकके समय वैदिक मन्त्रोंका मनसे उच्चारण कर लेना चाहिये। उस समय यज्ञोपवीत तो रहता है। इसमें कोई दोष नहीं है।
५-मानसिक पूजाके समय भगवान्के श्रीविग्रह, पूजाकी सामग्रीके साथ-साथ पूजा करनेवालेके रूपमें अपनी भी कल्पना करनी होगी, नहीं तो पूजा कौन करेगा; सो इसमें अलग अपनी कल्पना करनेकी आवश्यकता नहीं है। पूजा करनेवाला तो स्वयं बैठा ही है। वह कल्पना करता है अपने इष्टदेव भगवान् की, पूजन-सामग्रीकी और पूजनकी।