संयम और सदाचारसे जीवका कल्याण
आदरणीय महोदय! सादर प्रणाम। आपका पत्र मिला। आपकी पंचदशवर्षीया कन्या इसी गतमासमें विधवा हो गयी। यह दु:खद समाचार पढ़कर हृदयमें बड़ी ही वेदना हुई। आप तो पिता हैं,आपको अधिक शोक-संताप होना स्वाभाविक ही है। आजकल भारतमें ऐसी बाल-विधवाओंकी समस्या लेकर प्रत्येक सहृदयका हृदय, चाहे वह किसी विचारका क्यों न हो, द्रवित हो उठा है और अपने समाजके उन कठोर नियमोंकी ओरसे जहाँ विधवा-विवाहके लिये आदेश नहीं, विद्रोह-सा करने लगा है।
आप इस विषयमें शास्त्रीय मत जानना चाहते हैं। हमारा प्राचीन समाज प्राय: शास्त्रीय नियमोंपर ही निर्मित हुआ है। हिंदूशास्त्र प्राय: प्रत्येक मानवको ब्रह्मचर्य, सत्य, अहिंसा, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह आदि तपका ही आदेश देते हैं। ये आदेश देखनेमें कठोर हैं, परंतु इनका परिणाम बड़ा ही मधुर और मंगलमय है। यदि ऐसा न होता तो पूर्वकालके बड़े-बड़े वैभवशाली राजर्षि अपनी लौकिक सुख-समृद्धिपर लात मारकर वनमें न जाते। वे जानते थे इस संसारका जीवन क्षणिक है, यहाँके सुख-भोग नश्वर हैं। वे जन्म-मृत्यु, जरा-व्याधिके चक्रमें फँसानेवाले हैं। इन भोग-विलासोंके मोहमें पड़कर नारी और नर ऐसे पाप-पंकमें निमग्न हो जाते हैं, जहाँसे उनका उद्धार कठिन हो जाता है। वे शूकर-कूकर और कीट आदि योनियोंमें पड़नेकी योग्यता संचय कर लेते हैं।
सुख तो वही चाहनेयोग्य है जो मिलकर फिर कभी खो न जाय, जो नित्य, सनातन और एकरस हो। ऐसे सुखके निकेतन हैं एकमात्र मंगलमय भगवान्। अत: प्रत्येक स्त्री-पुरुषका प्रयत्न उन्हीं परम प्रभुको प्राप्त करनेके लिये होना चाहिये।
इसीलिये शास्त्र संयम और सदाचारपर अधिक बल देते हैं; क्योंकि इन्हींमें जीवका कल्याण भरा है। वह प्रारम्भमें कठिन और दु:खसाध्य होनेपर भी परिणाममें परम कल्याणकारी है। कहा जाता है कि नयी अवस्थामें सुखभोग और उम्र ढलनेपर धर्मका सेवन करना चाहिये; किंतु यह कौन कह सकता है कि किसकी आयु कब समाप्त हो जायगी। काल नयी और पुरानी अवस्थाका विचार करके नहीं आता। उसकी दृष्टि शिशु, तरुण, युवा, प्रौढ़ एवं वृद्ध सबपर समानरूपसे पड़ती है। आयु समाप्त होनेपर वह एक क्षण भी अधिक जीनेका अवसर नहीं देता। फिर कब धर्मका संचय होगा और कैसे नित्य-सुखकी प्राप्ति होगी? जन्मान्तरमें पुन: मानव-शरीर मिलेगा या नहीं, कौन कह सकता है? दूसरे किसी शरीरसे आत्माके लिये कल्याणकारी धर्मोंका सम्पादन सम्भव नहीं है।
अत: विधवा स्त्रीको अपने परलोकगत स्वामीका स्मरण करते हुए अथवा सबके परमपति परमेश्वरका स्मरण करते हुए संयम एवं सदाचारपूर्ण जीवन बिताना चाहिये। वह सद्ग्रन्थका स्वाध्याय करे, गुरुजनोंकी यथायोग्य और यथाशक्ति सेवा करे। उस सेवाको भगवान्की सेवा माने। घरके बालकोंका लालन-पालन करे और सदा भगवान्का स्मरण करती रहे। उसे भोग-विलासके साधनों तथा भड़कीले वस्त्राभूषणोंसे स्वत: दूर रहना चाहिये। घरके लोगोंका कर्तव्य है कि वे विधवा नारीका अधिक आदर और सम्मान करें। उसे घरकी देवता समझें। उसके प्रति जरा भी दुर्भाव न रखें। यदि विधवा नारीको धर्माचरणकी सुविधा और घरके लोगोंका सम्मान प्राप्त होने लग जाय तो उसे अपना वैधव्य उतना कष्टप्रद न जान पड़े, जितना आजकल अनुभवमें आता है। हमारी उपेक्षा और असद्व्यवहारसे ही विधवा स्त्री अपने जीवनको भाररूप समझने लगती है।
कहा जाता है कि प्राचीन कालमें नियोगकी प्रथा थी, पर वह बड़ी नियन्त्रित थी। केवल एक संतानकी प्राप्तिके लिये विधवा नारी देवरसे सम्बन्ध स्थापित करती थी। फिर वे सदाके लिये भाई-बहन या पिता-पुत्रीकी तरह रहने लगते थे। पर कलिके कलुषित वातावरणमें मानव-हृदयकी वासना सर्वथा दूर नहीं हो सकती। वे एक बार जिससे नियोगके बहाने भी सम्बन्ध स्थापित कर लेंगे, उससे सदा वैसी ही वासनापूर्ण प्रीति करते रह जायँगे, यही सोचकर हमारे ऋषि-महर्षियोंने कलियुगमें नियोगकी प्रथाको दूषित और निषिद्ध ठहराया है।
मनुस्मृतिमें तो नियोगको ‘पशुधर्म’ कहकर धिक्कारा गया है। मनुजीकी रायमें यह प्रथा राजा वेनके समयमें प्रचलित हुई थी। वेन कितना दुराचारी और उच्छृंखल था, यह पुराणवेत्ता जानते हैं। वह अपने अत्याचारोंके कारण प्रजाके हाथों मारा गया। मनुजी कहते हैं—‘न विवाहविधावुक्तं विधवावेदनं क्वचित् ’ विवाहकी विधिमें कहीं भी विधवा स्त्रीका पुनर्दान नहीं बताया गया है। तात्पर्य यह कि जो कन्या एक बार किसीको दे दी गयी, वह पुन: दूसरेको नहीं दी जा सकती। वह पहले जिसे दी गयी, उस कुलकी हो गयी; वही उसका गोत्र हो गया।
उपर्युक्त पंक्तियोंमें शास्त्रीय दृष्टिकोण आपके सामने रखनेका प्रयत्न किया गया है। आजकलके वातावरणमें जब कहीं भी संयमपूर्ण जीवन देखनेको नहीं मिलता, किसी छोटी कन्यासे जीवनभर संयम और ब्रह्मचर्य पालन करानेकी पूर्ण आशा नहीं की जा सकती। उसके कष्ट और दु:खको देखकर हृदय विदीर्ण होने लगता है। फिर भी उसका परम हित इसीमें है कि जैसे भी हो, भरसक उससे शास्त्रीय मर्यादाका पालन कराया जाय। आदर और प्रेमसे रखनेपर उसे वैसा जीवन बितानेमें कष्ट न होगा, परंतु यदि किसी कारणवश कोई विधवा सदाचार-पालनमें असमर्थ हो जाय और दूसरे प्रकारके अनर्थ संघटित होनेकी सम्भावना हो जाय, तब उसे किसी एक योग्य व्यक्तिके अधीन कर देना ही लोक-दृष्टिसे अच्छा होगा। अनेकसे सम्बन्ध न रखकर एकसे सम्बन्ध हो जाना बड़े पापकी अपेक्षा फिर भी अच्छा है। नारीके लिये उत्तम आदर्श तो है सतीत्व ही; विधवाका यथार्थ कल्याणकारी धर्म है सदाचार, संयम और भगवत्स्मरण। शेष प्रभुकी कृपा।