सर्वोत्तम हिंदू-संस्कृति

सप्रेम हरिस्मरण! कृपापत्र मिला। धन्यवाद। आपका यह लिखना ठीक है कि आज अपना देश स्वतन्त्रता मिल जानेके बाद भी पाश्चात्य विचारधाराका गुलाम बना हुआ है। रहन-सहन, वेश-भूषा, भाषा, विचारपद्धति और शासनप्रणाली आदि सभी दृष्टियोंसे हम पूर्णत: पाश्चात्य संस्कारोंसे आक्रान्त हैं।

सदियोंकी परतन्त्रता और विधर्मियोंके अत्याचारसे पराभूत होकर हममेंसे कुछ अग्रणी पुरुषोंने भी आत्मविश्वास खो दिया है! हमारे धर्म, हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता और हमारी विचारधारामें क्या अच्छाई है, यह देखनेकी भी इच्छा उन लोगोंमें नहीं रह गयी है। शिक्षा-दीक्षा ऐसी मिली, जिससे भारतीय शरीरमें अभारतीय मनका निर्माण हो गया। हृदय बदला, दृष्टि बदली। फिर कुछ-का-कुछ दिखायी देने लगा। अपनी अच्छाईमें भी बुराई नजर आयी और दूसरोंकी बुराईमें भी अच्छाई दिखायी देने लगी। यह विपरीत दृष्टि ही दु:ख और अशान्तिकी जननी है। आज सारा भारत दु:खी है, चिन्तित है और अशान्त है केवल इस विपरीत दृष्टिके ही कारण।

हमारा यह दृढ़ विश्वास है कि हमारी प्राचीन संस्कृति ही संसारके लिये कल्याणकारक है। आज सबको हाय-हाय लगी है। घर-घर व्यक्ति-व्यक्ति चिन्तित है। सबको अपनी-अपनी चिन्ता है। सब अपना पेट भरना चाहते हैं। सबको अपना तन ढकनेकी चिन्ता है। दूसरा कैसे है, वह सुखी होगा या नहीं—इस ओर किसीका ध्यान नहीं है। साम्यवादियोंका नारा है—‘आज माँगता हिंदुस्थान। रोटी, कपड़ा और मकान।’ आश्चर्य है इस स्थितिपर। भारतवर्ष इस प्रकार याचक तो कभी नहीं हुआ था। भारतवर्ष सदाका दानी रहा है। आज यह दैन्य, यह याचक मनोवृत्ति उसमें कैसे पैदा हुई? यही तो आजके युगकी देन है।

जहाँ स्वार्थ है, लोभ है वहाँ सुख नहीं रह सकता। वहाँ सदा हाहाकार ही बना रहेगा। जहाँ त्याग है, वहीं सुख है, शान्ति है। आज साम्यवादके नारे लोगोंमें स्वार्थमूलक प्रवृत्तिको प्रोत्साहन दे रहे हैं। काम कम करो और वेतन अधिक लो, यह भावना बढ़ रही है। जब उत्पादन और आयमें ही कमी होगी, तब वेतन कहाँसे बढ़ेगा? जो है, वह भी रह जायगा—इसीमें संदेह है। मेरा ही पेट भरे, यह भावना किसीके पेटको भरने नहीं देती। भूख और पेट दोनों बढ़ते जाते हैं। इसीके लिये वर्ग-संघर्ष होते हैं। लूट, खसोट, हिंसा—सभी उपाय काममें लाये जाते हैं। निर्माण नहीं होता, परंतु विध्वंसके कार्य बराबर हो रहे हैं। क्या यही सुख और शान्तिका उपाय है? दूसरेका घर लूटकर हम कबतक अपना पेट भर सकते हैं? जमींदारी-प्रथा और पूँजीवादी-प्रथामें यदि दोष आ गये हैं तो उन दोषोंका सुधार हो सकता है। ये प्रथाएँ तोड़ देनेमें ही लाभ दीखता हो तो तोड़ भी दी जायँ। इनके रखनेमें कोई आग्रह नहीं होना चाहिये। आज जो जमींदारी और पूँजीवादी नीति है, यह प्राचीन भारतीय संस्कृतिके आदर्शसे बहुत नीचे गिर चुकी है। तथापि इन प्रथाओंके नाशसे ही सारी समस्या हल नहीं होगी। सबको वस्त्र मिले, सबको सुख-सुविधा और ज्ञान-वृद्धिके साधन प्राप्त हों; यह होनेपर ही आर्थिक दशाका सुधार माना जायगा।

नारा लगा देनेसे ही कोई मनचाही वस्तु सदा नहीं मिलती रहती। उसके लिये प्रयत्न आवश्यक होता है। उचित श्रमसे ही समुचित फलकी प्राप्ति होती है। आजकी नीति ऐसी है कि वोटके बलपर सभी शासनमें अधिकार प्राप्त करना चाहते हैं। इस प्रतिद्वन्द्वितामें भिन्न-भिन्न दल संगठित होकर सब एक-दूसरेसे लड़ते हैं। जहाँ स्वार्थके लिये सदा संघर्ष चलता रहेगा, वहाँ सुख स्वप्नके समान है। मजदूर और किसान—ये ही तो भारतके प्रधान निवासी हैं। ये उत्पादन बढ़ाकर सभी वस्तुएँ सर्वसाधारणके लिये अधिक-से-अधिक सुलभ कर सकें तभी अन्न-वस्त्र आदिकी वर्तमान समस्या सुलझ सकती है। जहाँ स्वार्थकी भावना काम करती हो, वहाँ ऐसी सद‍्बुद्धि कैसे जगेगी?

साम्यवाद सबको सुख पहुँचाना चाहता है; पर इसके लिये जिस प्रवृत्ति और भावनाको वह प्रोत्साहन देता है, वह सबको दु:खमें ही डालनेवाली है।

अब ‘भारतीय संस्कृति’ के साम्यवादपर दृष्टिपात कीजिये—

संसारके सभी प्राणी, न केवल मानव ही भगवान‍्के चिन्मय अंश हैं। ये जड और चेतन सभी भगवान‍्के स्वरूप हैं, इस सत्यका साक्षात्कार करके सभी मनुष्य जगत‍्के समस्त जड-चेतनको शीश झुकायें और सुख पहुँचानेकी चेष्टा करें। यह भारतीय आदर्श है। दूसरे लोग अधिक-से-अधिक बन्धु अथवा मित्रकी भावनातक जाते हैं। कुछ लोग आत्मभावका समर्थन करते हैं केवल मानव-मानवके लिये। परंतु विश्वके समस्त जड-चेतन अपने आराध्य देव हैं, इस सद्भावनाका केवल हिंदू-धर्म संदेश देता है। इस अवस्थामें पहुँचकर हमारा सबके साथ राग-द्वेष, वैर-विरोध मिट जाता है—

निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध।

इससे बढ़कर समदृष्टि और क्या हो सकती है। इसी उद्देश्यसे हिंदू-शास्त्र प्रत्येक गृहस्थको बलिवैश्वदेव यज्ञका आदेश देते हैं। बलिवैश्वदेव वह यज्ञ है, जिसमें सम्पूर्ण विश्वको तृप्त करनेकी भावनासे अन्न और जलका त्याग किया जाता है। उसमें देवयज्ञ, पितृयज्ञ, भूतयज्ञ, ऋषियज्ञ और मनुष्ययज्ञ—ये पाँच प्रकारके यज्ञ हैं। मनुष्ययज्ञको ही अतिथियज्ञ कहते हैं। यज्ञका अर्थ है सेवा। दूसरोंके हितकी दृष्टिसे हम जो कुछ भी करते हैं, वह सब यज्ञ है। यज्ञ त्यागकी आधारशिलापर ही सुप्रतिष्ठित है। यह यज्ञ भी भगवान‍्का ही स्वरूप है। इस प्रकार यज्ञरूपी क्रियामें भी हिंदूधर्म भगवद्दृष्टि सिखाता है।

हिंदूधर्म बतलाता है—यज्ञ-शेष अन्न अमृत है, इसके भोजनसे परमात्माकी प्राप्ति होती है। सबको देकर पीछे तुम खाओ। दूसरोंकी प्यास बुझाकर स्वयं पानी पीओ। दूसरोंको रहनेके लिये स्थान और आसन देकर स्वयं अपनी चिन्ता करो। तात्पर्य यह कि सदा दूसरोंको सुखी बनानेकी चेष्टा करो। जो स्वार्थी है, जो केवल अपने पेटकी चिन्ता करता है और अपने लिये भोजन बनाता—कमाता-खाता है, वह पापका भागी होता है।

यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै:।

भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥

दूसरोंको देकर भी यह अभिमान मत रखो कि तुम उनका उपकार करते हो। तुम तो उनकी ही वस्तु उन्हें दे रहे हो। वह सब तुमसे पानेका उन्हें अधिकार है। यदि तुम नहीं देते हो तो चोर हो—‘स्तेन एव स:।’ दूसरोंका हक पचानेका दु:साहस करनेवाले वे मनुष्य सारी आयु पापका ही अर्जन करते हैं, उनका जीवन व्यर्थ है—

अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥

इसी भावनासे अनुप्राणित होकर भारतीय गृहस्थ अतिथिसेवाके लिये सदा उत्सुक रहते थे। वे प्रतिदिन दोपहरतक अतिथिकी बाट जोहते थे। कोई मेरे घरपर आ जाय, मैं भोजन आदिके द्वारा उसकी सेवा करके तब स्वयं अन्न ग्रहण करूँगा। श्रुतिके शब्दोंमें यही भावना इस प्रकार व्यक्त की गयी है—

बहु देयं च नोऽस्तु। अतिथींश्च लभेमहि। याचितारश्च न: सन्तु। मा च याचिष्म कञ्चन।

‘मेरे पास देनेके लिये बहुत सामान हो। मैं सदा बहुत-से अतिथियोंकी सेवाका अवसर पाऊँ। मेरे पास माँगनेवाले आयें, किंतु मैं कहीं न माँगूँ।’

इस प्रकार प्रार्थना की जाती थी। जब सभी एक-दूसरेको देना चाहेंगे, सभी सबको सुखी बनानेकी इच्छा रखेंगे, तो कौन दु:खी रहेगा?

सम्पूर्ण मानव-समाजको सुखी बनानेकी इच्छासे ही भगवान‍्द्वारा वर्णाश्रम-व्यवस्थाका निर्माण हुआ है। चार वर्ण—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। ब्राह्मण अपनी जीविकाका भार दूसरोंपर न डालकर फल-मूल आदिसे ही निर्वाह करता था, परंतु त्याग-तपस्याद्वारा ऐसे सद्ज्ञानका अर्जन करता था, जिसके द्वारा समस्त मानव-समाजके कल्याणमार्गका दर्शन हो सके। ऋषि-महर्षियोंने आजीवन तपस्या करके समाजहितके विधान ही तैयार किये, जो सत्य और सनातन हैं, उन आदेशोंपर चलनेवाला कभी दु:खी नहीं हो सकता। क्षत्रियको समाजका रक्षक बनाया गया। उसकी परम्पराने समाजको भयसे बचानेका ही व्रत लिया। इसी तरहकी उसे शिक्षा-दीक्षा मिली और जाति-परम्परासे उसमें पौरुषका ही अधिक विकास हुआ।

वैश्यने कृषि, गोरक्षा और वाणिज्यके द्वारा सम्पूर्ण समाजके लिये अन्न और धनका संग्रह किया तथा शूद्रने शिल्पकलाके द्वारा समाजकी सेवा अपनायी। ये सभी कर्म उन्हींकी परम्परामें प्रचलित और विकसित होते रहे। एक-दूसरेने परस्परके कर्मको छीनने या अपनानेका प्रयास नहीं किया।

वैश्यने यज्ञद्वारा दक्षिणाके रूपमें ब्राह्मणको अन्न पहुँचाया। रक्षाका कर देकर क्षत्रियको अन्न-धनसे सम्पन्न बनाया और शूद्रको उसके शिल्पका मूल्य देकर उसकी भी जीविका चलायी। इस प्रकार चारों वर्णोंका जीवन सम्पूर्ण समाजके हितके लिये ही रहा। सब अपने वर्ण और कर्मकी शुद्धिके लिये यत्नशील थे, अत: वर्णसंकरता एवं कर्मसंकरता उनमें नहीं आने पाती थी। इसीलिये उनमें न छोटे-बड़ेकी भावना थी, न वर्ग-संघर्ष था।

शासनप्रणालीमें राजतन्त्रको ही महत्त्व दिया गया, जिसका सुविकसित रूप राम-राज्य है—जहाँ इतनी अच्छी व्यवस्था थी कि कभी अकाल नहीं पड़ता था, खेती नहीं मारी जाती थी। वृक्षोंमें फूल और फल अधिक होते थे। गायें खूब दूध देती थीं। किसीको रोग नहीं, व्याधि नहीं। सब पूरी आयुतक जीवित रहते थे। उस राज्यमें कोई स्त्री विधवा नहीं। कोई अनाथ नहीं। सारा राष्ट्र एक कुटुम्ब था। राजा केवल घरके मालिक, ट्रस्टी या पंचकी भाँति व्यवस्थापकमात्र था। राजा प्रजाकी सारी चिन्ताको दूर करनेका प्रयास करता और प्रजा राजाके बलको बढ़ाती थी। मानो सभी एक पिताके पुत्र हों। राजा राज्यके संरक्षणकी शिक्षा पाता और प्रजा अपने उद्योग एवं अपने व्यवसायमें पटुता प्राप्त करती। सभी सुखी थे। सभी उन्नतिशील थे। शासनमें सुयोग्य व्यक्ति ले लिये जाते थे। कोई होड़ नहीं, कोई चुनावकी लड़ाई नहीं। शासन प्रजाके समर्थनपर ही टिक पाता था। प्रजाकी इच्छाके सामने राजा इतना नतमस्तक था कि अपने पिता, पुत्र, भाई अथवा पत्नीको भी त्याग देनेमें आनाकानी नहीं कर सकता था।

आजके साम्यवाद और समाजवाद जिन उद्देश्यों अथवा सुखोंको लानेका प्रयास कर रहे हैं, उनमेंसे कौन-सा सुख या उद्देश्य प्राचीन संस्कृतिद्वारा सिद्ध नहीं होता? उलटे आजके साम्यवादमें जो राग-द्वेष, संघर्ष और हिंसा आदि दोष हैं, वे प्राचीन हिंदू-संस्कृतिमें देखनेको नहीं मिलेंगे।

आदर्शका पालन नहीं होनेसे समाजमें बुराइयाँ आती हैं। प्राचीन हिंदू-संस्कृतिकी अवहेलनासे ही समाजमें नाना प्रकारके दोष आ गये। वे दोष प्राचीन व्यवस्थाकी देन नहीं, हमारी अपनी उपेक्षा और अकर्मण्यतासे ही आये हैं। आजका साम्यवाद भी एक आदर्श है। पर इसका आदर्श स्वरूप भी वैसा शुद्ध नहीं है, जैसा हमारी हिंदू-संस्कृतिके साम्यवादका है। हमारा धर्म धारणात्मक है, ध्वंसात्मक नहीं। धारण नाम है रक्षाका। यदि संसारकी रक्षा अभीष्ट है तो हिंदू-धर्मका ही आश्रय लेना चाहिये। जिससे लोक-परलोक दोनोंकी उन्नति हो, वही धर्मका आदर्श रूप है।

‘यतोऽभ्युदयनि:श्रेयससिद्धि: स धर्म:।’

हमारे हिंदू-धर्मके सभी सिद्धान्त इसी तुलापर तौलकर निश्चित किये गये हैं। अत: इन्हींसे जगत‍्में शान्ति, सुव्यवस्था एवं कल्याणकी प्राप्ति सम्भव है।

संसार जानता है, इतिहास साक्षी है, हिंदुओंने कभी स्वार्थ या लोभवश किन्हीं अन्य धर्मावलम्बियोंपर आक्रमण नहीं किया; क्योंकि ये सबमें आत्मदृष्टि रखते हैं। जब इनके ही धर्म और संस्कृतिको कुचलनेका कभी प्रयास हुआ, तभी इन्होंने विपक्षीका सामना करनेके लिये शस्त्र ग्रहण किया। हिंदू मानते हैं, आत्मा अजर-अमर है। अत: वे मौतसे नहीं डरते। शरीरके त्यागसे उन्हें कष्ट नहीं होता; क्योंकि वह रहनेवाला नहीं है। इसलिये हिंदूका शौर्य कभी लुप्त नहीं होता। विपक्षीकी ललकारका वे स्वागत करते हैं। उनके सामने युद्ध स्वत: उपस्थित हो जाय तो वे उत्सव मनाते हैं। वे धर्मके लिये किसीको भी मारते नहीं, परंतु धर्मरक्षाके लिये स्वयं मरना अपने लिये कल्याणकर समझते हैं—‘स्वधर्मे निधनं श्रेय:।’ संसारमें ऐसी कोई संस्कृति नहीं, जो हिंदू-संस्कृतिसे श्रेष्ठ मानी जा सके। शेष प्रभुकृपा।