सौन्दर्य-लालसा

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। आप लिखते हैं—‘बहुत चेष्टा करनेपर भी मेरे मनकी सौन्दर्य-लालसा नहीं मिटती। मैंने बहुत हठ किया, निग्रह करनेकी बड़ी-बड़ी कोशिशें कीं; परंतु मनकी लालसा चाहे थोड़े समयके लिये दब जाय, पर उसका समूल नाश नहीं होता। इसलिये अब मुझे क्या करना चाहिये, इसके उत्तरमें निवेदन है कि आप अपनी लालसाको दबाइये मत। उसे खूब बढ़ने दीजिये; परंतु उसे लगानेकी चेष्टा कीजिये परम सुन्दरतम पदार्थमें। जो सौन्दर्यका परम अपरिमित निधि है, जिस सौन्दर्य-समुद्रके एक नन्हें-से कणको पाकर प्रकृति अभिमानके मारे फूल रही है और नित्य नये-नये असंख्य रूप धर-धरकर प्रकट होती और विश्वको विमुग्ध करती रहती है—आकाशका अप्रतिम सौन्दर्य, शीतल-मन्द-सुगन्धवायुका सुख-स्पर्श-सौन्दर्य, अग्नि-जल-पृथ्वीका विचित्र सौन्दर्य, अनन्त विचित्र पुष्पोंके विविध वर्ण और सौरभका सौन्दर्य, विभिन्न पक्षियोंके रंग-बिरंगे सुखकर स्वरूप और उनकी मधुर काकलीका सौन्दर्य, बालकोंकी हृदयहारिणी माधुरी, ललनाओंका ललित लावण्य तथा माता-पत्नी-मित्र आदिका मधुर स्नेह-सौन्दर्य—ये सभी एक साथ मिलकर भी जिस सौन्दर्य-सुधासागरके एक क्षुद्र सीकरकी भी समता नहीं कर सकते, उस सौन्दर्यराशिको खोजिये। उसीके दर्शनकी लालसा जगाइये। सारे अंगोंमें जगाइये। आपकी बुद्धि, आपका चित्त-मन, आपकी सारी इन्द्रियाँ, आपके शरीरके समस्त अंग-अवयव; आपका रोम-रोम उसके सुषमा-सौन्दर्यके लिये व्याकुल हो उठे। बस, यह कीजिये। फिर देखिये, आपकी सौन्दर्य-लालसा आपको किस चिन्मय दिव्य सौन्दर्य-साम्राज्यमें ले जाती है। अहा! यदि आपको एक बार उसकी जरा-सी झाँकी भी हो गयी तो आप निहाल हो जाइयेगा। फिर सौन्दर्य-लालसा मिटानी नहीं होगी। वह अमर हो जायगी और इतनी बढ़ेगी—इतनी बढ़ेगी कि मुक्ति-सुखको भी खाकर स्वयं जीती-जागती बनी रहेगी और आप फिर उस सौन्दर्य-समुद्रमें नित्य डूबते-उतराते रहेंगे। वह ऐसा सौन्दर्य है कि जिसे दिन-रात अनन्त कालतक अविरत देखते रहनेपर भी तृप्ति नहीं होती। दर्शनकी प्यास कभी मिटती ही नहीं। ‘अँखियाँ हरिदर्शनकी प्यासी’ ही बनी रहती हैं। प्यासके बुझानेकी तो कल्पना ही नहीं, वरं ईंधनयुक्त घृतकी आहुतिसे बढ़ती हुई अग्निकी भाँति उत्तरोत्तर बढ़ती हुई वह अनन्तकी ओर अग्रसर होती रहती है। पर यह प्यास—यह दर्शनकी बढ़ी हुई लालसा दर्शनसे भी अधिक सुखदायिनी होती है।

यह वह सौन्दर्य है जिसे देखकर मुनियोंके मरे हुए मनोंमें भी जीवनका संचार हो जाता है। जनक-सरीखे ज्ञानशिरोमणिके नेत्र निर्निमेष एकटकी लगाकर देखते-देखते अघाते नहीं और अश्रुधाराका अर्घ्य चढ़ानेके लिये उतावले हो जाते हैं, उनके अंग पुलकित हो जाते हैं और जनकजी बरबस ब्रह्मसुखका त्याग करके कहने लगते हैं—

सहज बिराग रूप मन मोरा।

थकित होत जिमि चंद चकोरा॥

इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा।

बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥

श्रीवृषभानुनन्दिनी श्रीश्रीराधिकाजी कहती हैं—

नवाम्बुदलसद्युतिर्नवतडिन्मनोज्ञाम्बर:

सुचित्रमुरलीस्फुरच्छरदमन्दचन्द्रानन:।

मयूरदलभूषित: सुभगतारहारप्रभ:

स मे मदनमोहन: सखि तनोति नेत्रस्पृहाम्॥

‘सखी! नव जलधरकी अपेक्षा जिनकी सुन्दर कान्ति है, नवीन विद्युत्-मालासे भी बढ़कर जिनका मनोज्ञ पीताम्बर है, जो चित्र-विचित्र सुन्दर मुरलीके द्वारा सुशोभित हैं, जिनका वदनचन्द्र निर्मल शारदीय पूर्ण चन्द्रमाकी अपेक्षा भी समुज्ज्वल है, जो मयूरपिच्छसे सुभूषित हैं और जिनके गलेमें नक्षत्रमाला (मुक्तामणिमाला) चमक रही है, वे मदनमोहन मेरे नेत्रोंकी दर्शन-स्पृहा बढ़ा रहे हैं।’

नेत्रोंकी ही क्यों—प्रत्येक इन्द्रियकी दर्शन-स्पृहा बढ़ रही है। सभी अंग उनके मधुर मिलनकी उत्कट आकांक्षासे आतुर हैं। बार-बार मिलनेपर भी वियोगकी—विरहकी ही अनुभूति होती है। वे फिर कहती हैं—

नदज्जलदनि:स्वन: श्रवणकर्षिसत्सिञ्जित:

सनर्मरससूचकाक्षरपदार्थभङ्गयुक्तिक:।

रमादिकवराङ्गनाहृदयहारिवंशीकल:

स मे मदनमोहन: सखि तनोति कर्णस्पृहाम्॥

‘सखी! जिनकी कण्ठध्वनि मेघके सदृश सुगम्भीर है, जिनके आभूषणोंकी झनकार-ध्वनि कर्णको आकर्षित करती है, जिनके परिहास-वचनोंमें विविध भावभंगिंमाओंका उदय होता रहता है और जिनकी मुरलीध्वनिके द्वारा लक्ष्मी आदि देवियोंका हृदय हरण होता रहता है, वे मदनमोहन मेरे कानोंकी श्रवणस्पृहाको बढ़ा रहे हैं।’

कुरङ्गमदजिद्वपु:परिमलोर्मिकृष्टाङ्गन:

स्वकाङ्गनलिनाष्टके शशियुताब्जगन्धप्रथ:।

मदेन्दुवरचन्दनागुरुसुगन्धिचर्चार्चित:

स मे मदनमोहन: सखि तनोति नासास्पृहाम्॥

‘सखी! जिनके मृगमदविजयी श्रीअंगकी सौरभतरंगोंसे अंगनागण वशीभूत हो जाती हैं, जो अपने देहरूप अष्टकमल (दो चरणकमल, दो करकमल, दो नेत्रकमल, एक नाभिकमल और एक मुखकमल)- के द्वारा कर्पूरयुक्त कमलकी सुगन्धका विस्तार कर रहे हैं और जो कस्तूरी, कर्पूर, उत्कृष्ट चन्दन, अगुरु आदि द्रव्योंके द्वारा निर्मित अंगरागसे अंग विलेपन किये हुए हैं, वे मदनमोहन मेरी नासिकाकी सुगन्ध-स्पृहाको बढ़ा रहे हैं।’

हरिन्मणिकपाटिकाप्रततहारिवक्ष:स्थल:

स्मरार्त्ततरुणीमन:कलुषहन्तृदोरर्गल:।

सुधांशुहरिचन्दनोत्पलसिताभ्रशीताङ्गक:

स मे मदनमोहन: सखि तनोति वक्ष:स्पृहाम्॥

‘सखी! जिनका विशाल वक्ष:स्थल इन्द्रनीलमणिके कपाटके सदृश मनोहर है, जिनके अर्गलासदृश बाहुयुगल प्रेम-पीड़ित तरुणिसमुदायके मानस-क्लेशको नाश करनेमें समर्थ हैं और जिनका अंग चन्द्रमा, हरि-चन्दन, कमल और कर्पूरके सदृश सुशीतल है, वे मदनमोहन मेरे वक्ष:स्थलकी स्पर्श-स्पृहाको बढ़ा रहे हैं।’

व्रजातुलकुलाङ्गनेतररसालितृष्णाहर-

प्रदीव्यदधरामृत: सुकृतिलभ्यफेलालव:।

सुधाजिदहिवल्लिकासुदलवीटिकाचर्वित:

स मे मदनमोहन: सखि तनोति जिह्वास्पृहाम्॥

‘सखी! जिनकी सुमधुर अधरसुधा उपमारहित व्रजकुलांगनाओं- के इतर रससमूहकी स्पृहाका अपहरण कर रही है, जो महान् पुण्यराशि होनेपर ही प्राप्त की जा सकती है और जिनकी चर्वित ताम्बूलकी बीड़ी अमृतको भी पराजित करती है, वे मदनमोहन मेरी जिह्वाकी रस-स्पृहाको बढ़ा रहे हैं।’

बालरूपमाधुरीके रसिक श्रीलीलाशुकजी पथिकोंको सावधान करते हुए कहते हैं—

मा यात पान्था: पथि भीमरथ्या

दिगम्बर: कोऽपि तमालनील:।

विन्यस्तहस्तोऽपि नितम्बबिम्बे

धूत: समाकर्षति चित्तवित्तम्॥

‘अरे पथिको! उस पथसे मत जाना, वह गली बड़ी ही भयानक है। वहाँ अपने नितम्बबिम्बपर हाथ रखे जो तमालके सदृश नीलवर्ण बालक खड़ा है, वह केवल देखनेमें ही अवधूत है। वास्तवमें तो वह अपने समीप होकर जानेवाले किसी भी पथिकका चित्तरूपी धन चुराये बिना नहीं रहता।’

पण्डितराज जगन्नाथ विषयविमुग्ध मनको सावधान करते हैं—

रे चेत: कथयामि ते हितमिदं

वृन्दावने चारयन्

वृन्दं कोऽपि गवां नवाम्बुदनिभो

बन्धुर्न कार्यस्त्वया।

सौन्दर्यामृतमुद्‍‍गिरद्भिरभित:

सम्मोह्य मन्दस्मितै-

रेष त्वां तव वल्लभांश्च विषया-

नाशु क्षयं नेष्यति॥

‘रे चित्त! मैं तेरे हितके लिये कहता हूँ। तू वृन्दावनमें गायोंको चरानेवाले नवीन श्याममेघके समान कान्तिवाले किसीको अपना बन्धु मत बना लेना। वह सौन्दर्यसुधा बरसानेवाली अपनी मन्द मुसकानसे तुझे मोहित करके तेरे प्रिय विषयोंको भी तुरंत नष्ट कर डालेगा।’

इस रूपमाधुरीका जिसने पान किया, वही इस रसको जानता है। दूसरोंको क्या पता?

कहते हैं कि मुसलमान भक्त रसखान किसी स्त्रीपर आसक्त थे, पर वह बहुत मानिनी थी; बारम्बार इनका तिरस्कार किया करती थी। एक बार इन्होंने कहीं श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन आनन्दकन्द मदनमोहन भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रका मनोहर चित्र देख लिया और उसी क्षणसे उनपर मोहित हो गये। लोगोंसे पूछा—‘यह साँवरी सूरतवाला मेरा चित्तचोर कहाँ रहता है और इसका क्या नाम है?’ बताया गया यह श्रीवृन्दावनधाममें रहता है और इसका नाम है ‘रसखान’। बस, वह उसी समय उन्मत्त-से होकर वृन्दावन पहुँच गये और उत्कट एवं अनन्य दर्शन-लालसाके फलस्वरूप गो-गोप-गोपीपरिवेष्टित निखिल सौन्दर्य-माधुर्य-रस-सुधा-सार-सर्वस्व परमानन्दघन व्रजचन्द्रके मन्मथ-मन्मथ रूपके दर्शन पाकर सदाके लिये उन्हींपर न्योछावर हो गये। वे कहते हैं—

मोहन छबि रसखानि लखि,

अब दृग अपने नाहिं।

ऐंचे आवत धनुष-से,

छूटे सर-से जाहिं॥

या छबि पै रसखानि अब

वारौं कोटि मनोज।

जाकी उपमा कबिन नहिं

पाई, रहे सु खोज॥

मोहन सुंदर स्यामको

देख्यो रूप अपार।

हिय-जिय-नैननिमें बस्यो

वह ब्रजराजकुमार॥

मो मन-मानिक लै गयो,

चितै चोर नँद-नंद।

अब बेमन मैं का करूँ

परी फेरके फंद॥

रसखान स्वयं तो रसखानिके रससौन्दर्यपर मोहित थे ही। वे उस अनिवार्य मोहिनीकी महिमा गाते हुए पुकार-पुकारकर समस्त व्रजजनोंको सावधान कर रहे हैं—

कानन दै अँगुरी रहिबो

जबहीं मुरलीधुनि मंद बजैहै।

मोहिनी तानन सों रसखानि

अटा चढ़ि गो-धन गैहै तो गैहै॥

टेरि कहौं सिगरे ब्रजलोगनि

काल्हि कोऊ कितनो समुझैहै।

माइ री वा मुखकी मुसुकानि

सम्हारि न जैहै न जैहै न जैहै॥

बस, उस मदनमोहन श्यामसुन्दरके सौन्दर्य-माधुर्यकी लालसा हृदयमें जगाइये और कृतार्थ हो जाइये।

काम, क्रोध, लोभ, अभिमानादि जितने भी दुर्गुण हैं, छूटने बड़े कठिन हैं और इन्हें छोड़नेके फेरमें पड़कर जीवन गँवानेकी आवश्यकता भी नहीं है। इन सबके विषयको बदल दीजिये। देवर्षि नारदजीने कहा है—

तदर्पिताखिलाचार: सन् कामक्रोधाभिमानादिकं तस्मिन्नेव करणीयम्।

जब सब कुछ उन्हें सौंप दिया तो फिर काम-क्रोधादि किसको देने जायँ? असलमें जैसे गंगाजीके निर्मल प्रवाहमें पड़कर गंदे नालेका पानी भी गंगाजल हो जाता है, वैसे ही काम-क्रोधादि दुर्गुण भी भगवान‍्से सम्बन्धित होकर, ब्रह्म-संस्पर्श पाकर भक्तिस्वरूप या स्वयं भगवत्-स्वरूप अतएव परम उपादेय बन जाते हैं।

इसीलिये भक्तगण मुक्तिका तिरस्कार कर जन्म-जन्ममें नित्य दासत्वकी कामना करते हैं। इसीसे प्रेमीजन प्राणवल्लभ प्रियतम श्यामसुन्दरपर प्रेमकोप तथा मान किया करते हैं और इसीसे भक्तोंका भक्ति-लोभ कभी मिटता ही नहीं। ये काम, क्रोध, लोभादि फिर भक्तके जीवनोपयोगी मधुर साधन बन जाते हैं। इनको वह कभी छोड़ना नहीं चाहता। यह भी एक मधुर और दिव्य कला है, जो सीखनेयोग्य है। शेष भगवत्कृपा।